बढ़ती बीमारियों के बीच लोग अपनी सेहत का खास ख्याल रखना शुरू कर दिया है और सही लाइफस्टाइल और एक्सरसाइज को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया है. फिट होने के लिए लोग जिम जाकर घंटों एक्सरसाइज भी करते हैं और काफी वेट लॉस भी कर लेते हैं. शुरुआत में एक्सरसाइज करने पर तेजी से रिजल्ट मिलते हैं, लेकिन कुछ समय बाद वही मेहनत करने के बावजूद बदलाव रुक जाता है. ऐसा होता है कि पसीना पहले जितना ही बहता है, मेहनत भी कम नहीं होती, फिर भी वजन कम नहीं होता या बॉडी टोन नहीं होती. यह स्थिति अक्सर कंफ्यूजन पैदा करती है, लेकिन असल में यह शरीर की एक नॉर्मल प्रोसेस है.
हमारा शरीर बहुत जल्दी चीजों को अपनाने की शक्ति रखता है. जब आप पहली बार वर्कआउट शुरू करते हैं, तो हर मूवमेंट नया होता है. मसल्स पर प्रेशर पड़ता है, वे टूटते हैं और फिर मजबूत बनते हैं. लेकिन जब आप लंबे समय तक एक ही तरह की एक्सरसाइज करते रहते हैं तो शरीर उसे सीख जाता है और कम एनर्जी में वही काम करने लगता है. इसी को फिटनेस प्लेटो कहा जाता है.
समय के साथ मसल्स ज्यादा एफिशिएंट हो जाती हैं यानी पहले जो एक्सरसाइज आपको चुनौती देती थी,अब वही शरीर के लिए आसान हो जाती है. इससे कम मसल फाइबर एक्टिव होते हैं और कैलोरी बर्न भी कम होती है. बाहर से देखने पर लगता है कि आप वही मेहनत कर रहे हैं, लेकिन अंदर से असर कम हो जाता है.
हर इंसान के शरीर में 30 साल के बाद हार्मोनल बदलाव शुरू हो जाते हैं, टेस्टोस्टेरोन और ग्रोथ हार्मोन कम होने लगते हैं. जबकि स्ट्रेस हार्मोन (कॉर्टिसोल) बढ़ सकता है, इससे मसल्स बनना धीमा हो जाता है और रिकवरी में ज्यादा समय लगता है. यानी पहले जितनी मेहनत से जो रिजल्ट मिलता था, अब उससे कम मिलता है.
एक और बड़ी वजह है कंफर्ट जोन में फंसे रहना. कई लोग महीनों तक एक ही वजन, एक ही स्पीड और एक ही रेप्स करते रहते हैं. जब शरीर को नई चुनौती नहीं मिलती, तो उसे बदलने की जरूरत भी महसूस नहीं होती. यही कारण है कि प्रोग्रेस रुक जाती है.
रिकवरी भी उतनी ही जरूरी है जितनी एक्सरसाइज. नींद की कमी, स्ट्रेस और डिहाइड्रेशन सीधे आपके परफॉर्मेंस को इफेक्ट करते हैं. अगर शरीर को पूरा आराम नहीं मिलता, तो मसल्स सही तरीके से रिपेयर नहीं हो पाती है.
न्यूट्रिशन की कमी
शरीर में न्यूट्रिशन की कमी भी एक बड़ा कारण हो सकती है, कम प्रोटीन लेने से मसल्स नहीं बनतीं, और विटामिन D, B12 या आयरन की कमी से थकान बनी रहती है. कई बार रिपोर्ट्स नॉर्मल होने के बावजूद हल्की कमी भी असर डालती है.
सबसे पहला तरीका है प्रोग्रेसिव ओवरलोड अपनाना, जिसका मतलब है धीरे-धीरे वजन बढ़ाना, रेप्स बढ़ाना या एक्सरसाइज की तीव्रता बढ़ाना. हर 4 से 6 हफ्ते में अपनी वर्कआउट रूटीन बदलें. नई एक्सरसाइज ट्राई करें ताकि शरीर को नई चुनौती मिले.