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हॉस्पिटल्स से निकला सीवेज कैसे कर रहा एंटीबायोटिक्स रेजिस्टेंस बैक्टीरिया में बढ़ोतरी, हैदराबाद में हुई स्टडी

हाल ही में हुई एक स्टडी में सामने आया है कि हैदराबाद में अस्पतालों से निकलने वाले सीवेज में मौजूद एंटीबायोटिक के अंश नालों और वहां के मूसी नदी में एंटीबायोटिक्स रेजिस्टेंस बैक्टीरिया को तेजी से बढ़ा रहे हैं. ये बैक्टीरिया आम दवाओं के असर को कम कर देते हैं, जिससे आम लोगों की सेहत के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है.

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हॉस्पिटल्स सीवेज से बढ रहा एंटीबायोटिक्स रेजिस्टेंस बैक्टीरिया (Photo- Getty Image)
हॉस्पिटल्स सीवेज से बढ रहा एंटीबायोटिक्स रेजिस्टेंस बैक्टीरिया (Photo- Getty Image)

हैदराबाद में अस्पतालों से निकलने वाला सीवेज अब लोगों की सेहत के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है. यह सीवेज नालों और पानी के दूसरे सोर्स में मिलकर आखिरकार मूसी नदी तक पहुंच जाता है. यह समस्या सिर्फ गंदगी तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे लोगों की सेहत पर असर डाल रही है. हालांकि अस्पतालों के कचरे को ट्रीट करने के लिए कुछ काम हुआ है, लेकिन हाल की स्टडी में सामने आया है कि अस्पतालों से निकलने वाला पानी अब भी पूरी तरह साफ नहीं किया जा रहा है. इसमें भारी मात्रा में एंटीबायोटिक दवाओं के अंश पाए जा रहे हैं, जो पब्लिक हेल्थ के लिए खतरनाक हैं.

स्टडी में क्या पाया गया?
हैदराबाद और बेंगलुरु के रिसर्चर्स की एक स्टडी में पाया गया कि बड़े मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पतालों के दो किलोमीटर के दायरे में मौजूद नालों में ऐसे बैक्टीरिया ज्यादा पाए गए, जो एंटीबायोटिक दवाओं पर असर नहीं दिखाते.

पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अस्पताल ऐसे स्थान होते हैं जहां सबसे ताकतवर एंटीबायोटिक दवाएं इस्तेमाल की जाती हैं. जब अस्पतालों का बिना साफ किया हुआ पानी, जैसे फर्श धोने या लॉन्ड्री का पानी, नालों में जाता है तो उसमें मौजूद दवाओं की थोड़ी-थोड़ी मात्रा बैक्टीरिया को मारने के बजाय उन्हें और मजबूत बना देती है. इससे बैक्टीरिया खुद को बचाने की क्षमता विकसित कर लेते हैं.

यह स्टडी Centre for Cellular and Molecular Biology और TIGS Bengaluru द्वारा की गई. इसमें 17 जगहों से पानी के सैंपल लिए गए, जिनमें खुले नाले, मूसी नदी के कुछ हिस्से और बड़े अस्पतालों के पास के नाले शामिल थे.

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रिसर्च में पाया गया कि इन नालों के पानी में मौजूद बैक्टीरिया आम एंटीबायोटिक जैसे एजिथ्रोमाइसिन और टेट्रासाइक्लिन पर असर नहीं दिखा रहे थे. अस्पतालों के पास के नालों में ऐसे जीनों की संख्या ज्यादा पाई गई जो दवाओं के असर को कम कर देते हैं.

रिसर्चर्स ने लगभग 89 तरह के ऐसे बैक्टीरिया पहचाने जो लगातार बदल रहे हैं और आगे चलकर और खतरनाक हो सकते हैं. इनमें से कई बैक्टीरिया यूटीआई, निमोनिया और पेट के इंफेक्शन जैसी बीमारियां फैलाते हैं.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि हैदराबाद जैसे बड़े शहरों की ड्रेनेज सिस्टम अब बैक्टीरिया के लिए सुरक्षित ठिकाना बनती जा रही है. अगर हालात ऐसे ही रहे, तो आम इंफेक्शन का इलाज भी भविष्य में मुश्किल हो सकता है. इसलिए अब बेहतर और सख्त सीवेज मैनेजमेंट सिस्टम की सख्त जरूरत है.

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