Heavy school bags danger to kids: स्कूल जाना बच्चों के पैरेंट्स के लिए खुशी का मौका होता है लेकिन आजकल उनके कंधों पर लदा भारी बैग उनकी सेहत का दुश्मन बन गया है. 1 अप्रैल से स्कूलों का नया सेशन शुरू होने जा रहा है और ऐसे में कॉपी-किताब की दुकानों पर भीड़ लगी हुई है ताकि बच्चों के लिए जरूरतानुसार कोर्स (पाठ्यक्रम) खरीद सकें. लेकिन यदि देखा जाए तो आजकल के बच्चों का बचपन किताबों के बोझ तले दबता जा रहा है क्योंकि छोटे-छोटे बच्चे अपने कंधों पर 12 से 15 किलो तक का भारी-भरकम बैग लादकर ले जाते हैं.
बच्चों की मेंटल ग्रोथ के साथ-साथ ये समय उनकी फिजिकल ग्रोथ का भी होता है. ऐसे में उनके स्कूल बैग का भारी वजन उनकी कोमल हड्डियों और विकसित हो रही रीढ़ के लिए एक गंभीर खतरा हो सकता है. इस बारे में डॉक्टर्स और एक्सपर्ट का क्या कहना है, इस बारे में भी जान लीजिए.
रिसर्च बताती है कि स्कूल बैग का वजन बच्चे के शरीर के 10-15 प्रतिशत से ज्यादा होने पर पीठ दर्द और पोस्चर की समस्या बढ़ जाती है. नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में पब्लिश्ड स्टडी में पाया गया था कि 52 प्रतिशत बच्चों को भारी बैग से लोअर बैक पेन होता है जो आगे क्रॉनिक बन सकता है. भारत में भी सर्वे दिखाते हैं कि 88 प्रतिशत बच्चे अपने वजन का आधा बोझ ढोते हैं, जिससे रीढ़ विकृत या टेढ़ी हो सकती है. साथ ही इतना भविष्य में स्लिप डिस्क और स्कोलियोसिस जैसी गंभीर बीमारियों की वजह बन सकता है.
बचपन वह उम्र होती है जब बच्चों की हड्डियां और मांसपेशियां पूरी तरह सख्त नहीं होतीं. डॉक्टर्स का मानना है कि 5 से 15 साल की उम्र 'ग्रोथ फेज' होती है. इस दौरान रीढ़ की हड्डी लचीली होती है. जब बच्चा अपनी क्षमता से अधिक वजन उठाकर चलता है, तो उसका शरीर संतुलन बनाने के लिए आगे की ओर झुक जाता है. लगातार ऐसा करने से रीढ़ की प्राकृतिक बनावट यानी 'स्पाइनल कर्वेचर' बदलने लगता है.

दिल्ली के अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल के डॉ. निपुण बजाज ने Aajtak.in को बताया, छोटे बच्चों के स्कूल बैग का वजन एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन चुका है. ग्रोथ पीरियड में इतना बोझ हड्डियों और मसल्स को कमजोर कर सकता है, पीठ दर्द से लेकर स्लिप डिस्क तक का खतरा है.
'आजकल बैग का वजन 12 से 15 किलो या उससे अधिक भी पहुंच रहा है. बचपन में हड्डियां और रीढ़ तेजी से विकसित हो रही होती हैं. रोजाना इतना वजन उठाने से शरीर का सही पोस्चर प्रभावित होता है. बच्चा आगे झुककर चलने लगता है, जिससे रीढ़ की हड्डी पर दबाव बढ़ता है. इससे आगे चलकर लोअर बैक पेन, गर्दन दर्द और कंधों में जकड़न आम हो जाती है.'
'अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो भविष्य में स्लिप डिस्क और स्कोलियोसिस (रीढ़ की हड्डी का टेढ़ा होना) जैसी गंभीर ऑर्थोपेडिक समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.'
पीडियाट्रिशियन डॉ. प्रदीप राठौड़ का कहना है कि बच्चे जो भारी बैग ढोते हैं उससे उनकी लंबाई की ग्रोथ रुक सकती है और स्कोलियोसिस का जोखिम बढ़ता है. ऑर्थो सर्जन डॉ. हिमांशु त्यागी ने बताया कि 40 प्रतिशत बच्चों को गर्दन-पीठ दर्द होता है जो उनकी पढ़ाई और खेल को प्रभावित करता है.
कामिनेनी अस्पताल के ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. श्रीकांत वर्मा राचेरला ने द हिंदू को बताया था, 'अक्सर हमें लगता है कि भारी बैग से सिर्फ पीठ दुखती है लेकिन असली 'कमजोर कड़ी' बच्चे के कंधे होते हैं. बैग का पूरा भार कंधों पर आता है जिससे शरीर का पोस्चर और चलने का तरीका पूरी तरह बदल जाता है. बचपन में हड्डियां विकसित हो रही होती हैं, इसलिए अत्यधिक वजन के कारण रीढ़ की हड्डी में स्थायी टेढ़ापन या विकृति आने का जोखिम बढ़ जाता है.
डॉ. राचेरला चेतावनी देते हुए कहा था, 'भारी बोझ के चलते रीढ़ के निचले हिस्से यानी लम्बर डिस्क की ऊंचाई और उसके झुकाव में बदलाव आ सकता है जिससे असहनीय पीठ दर्द की समस्या शुरू हो जाती है. सबसे डराने वाली बात यह है कि जिन बच्चों या किशोरों को स्कूल के दिनों में यह दर्द शुरू होता है, उनके वयस्क होने पर भी इस पुरानी बीमारी से जूझने की पूरी आशंका बनी रहती है.
एक रिसर्च का हवाला देते हुए वे बताते हैं कि यदि बैग एक कंधे वाला है तो उसका वजन शरीर के भार के 10 प्रतिशत से कम होना चाहिए और दो स्ट्रैप वाले बैग की स्थिति में भी यह किसी भी सूरत में बच्चे के कुल वजन के 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए.
उदाहरण के लिए, यदि बच्चे का वजन 30 किलो है, तो उसके बैग का वजन 3 किलो से ज्यादा नहीं होना चाहिए। लेकिन हकीकत में यह 15 किलो तक पहुंच रहा है.
डॉ. बजाज ने अभिभावकों और स्कूलों के लिए कुछ जरूरी सलाह दी हैं. उन्होंने कहा है कि बैग का वजन बच्चे के वजन के 10% से ज्यादा न हो. बैग को हमेशा दोनों कंधों पर लटकाएं, एक कंधे पर टांगने से रीढ़ एक तरफ झुक सकती है. स्कूलों को भारी किताबों के बजाय डिजिटल लर्निंग या लॉकर सिस्टम को बढ़ावा देना चाहिए. ये भी देखें कि बैग में केवल जरूरी किताबें और पानी की बोतल ही हो.
गलत तरीके से और जरूरत से ज्यादा वजन उठाना बच्चों को ताउम्र के लिए बैक पेन का मरीज बना सकता है. इसलिए स्कूलों में लॉकर और डिजिटल किताबें अपनाएं. पैरेन्ट्स उनसे एक्सरसाइज कराएं और बैग से अनावश्यक सामान हटवाएं.