ठीक सालभर पहले डोनाल्ड ट्रंप ने दोबारा राष्ट्रपति पद संभाला. ये बदलाव अमेरिका में था, लेकिन असर दूरदराज के देश ग्रीनलैंड पर दिखने लगा. डेनमार्क के अधीन काम करते देश में आजादी की मांग जोर पकड़ने लगी. महज पचपन हजार आबादी वाले इस बर्फीले मुल्क में कई संगठन बने हुए हैं, जो स्वतंत्र ग्रीनलैंड चाहते हैं. लेकिन इसका अमेरिका से क्या संबंध है?
ट्रंप प्रशासन पर आरोप लग रहे हैं कि उनकी वजह से ग्रीनलैंड में सेपरेटिस्ट मूवमेंट बढ़ी. लेकिन ट्रंप को तो ग्रीनलैंड चाहिए, फिर वे उसे स्वतंत्रता के लिए क्यों उकसाएंगे! इसे समझने के लिए एक बार रूस का उदाहरण लेते हैं.
साल 2014 में मॉ़स्को ने यूक्रेन के क्रीमिया पर कब्जा कर लिया. साथ ही करीबी इलाके जैसे डोनबास के डोनेट्स्क और लुहान्स्क में एक मुहिम छेड़ दी. अलग होकर आजाद देश बनाने की. असल में दोनों ही रूसी भाषा बोलने वाले क्षेत्र हैं. सोवियत संघ के बंटवारे के बाद कीव का हिस्सा बनने के बाद भी वे मॉस्को से दूरी नहीं बना पा रहे थे. इसी का फायदा उठाया पुतिन प्रशासन ने. उन्होंने भड़काना शुरू कर दिया कि यूक्रेन के साथ उनके अधिकार खतरे में हैं.
डोनबास में कई सेपरेटिस्ट गुट बन गए, जो यूक्रेन से अलग होना चाहते थे. रूस ने इन गुटों को हथियार, ट्रेनिंग और राजनीतिक समर्थन दिया, हालांकि लंबे समय तक उसने सीधे दखल से इनकार किया. बाद में फरवरी 2022 में रूस ने इन्हीं इलाकों को बचाने के नाम पर यूक्रेन पर हमला किया. जंग अगर पुतिन की शर्तों पर खत्म हो तो डोनबास रूस के साथ शामिल हो जाएगा, जबकि पहली मांग आजादी की थी.

यही तरीका डेनमार्क-ग्रीनलैंड-अमेरिका के लव-ट्राएंगल पर काम कर सकता है. आधिकारिक तौर पर अमेरिका यह नहीं कहता कि वह ग्रीनलैंड में आजादी या अलगाववाद की मुहिम चला रहा है. लेकिन हाल के सालों में कुछ ऐसे संकेत और बयान सामने आए, जिनकी वजह से यह सवाल उठने लगा.
सबसे बड़ी वजह अमेरिका की ग्रीनलैंड में बढ़ती दिलचस्पी है. ग्रीनलैंड रणनीतिक रूप से बहुत अहम है, क्योंकि यह आर्कटिक इलाके में है, जहां से रूस और चीन की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है. अमेरिका वहां पहले से सैन्य मौजूदगी रखता है और अब वहां अपनी जमीन और मजबूत करना चाहता है.
दूसरी वजह अमेरिका के कुछ नेताओं के बयान हैं. जब डेनमार्क और अमेरिका के रिश्तों में ग्रीनलैंड को लेकर तनाव दिखा, तब यह चर्चा तेज हुई कि अमेरिका डेनमार्क के बजाय सीधे ग्रीनलैंड की सरकार और नेताओं से बात कर रहा है. इससे यह धारणा बनी कि अमेरिका ग्रीनलैंड को स्वतंत्र फैसले लेने के लिए उकसा रहा है.
इसके अलावा ग्रीनलैंड में आजादी की मांग पहले से मौजूद है. जब अमेरिका वहां निवेश, सुरक्षा और सहयोग की बात करता है, तो कुछ लोगों को लगता है कि इससे डेनमार्क की पकड़ कमजोर हो सकती है. हालांकि यह भी सच है कि अमेरिका ने कभी खुलकर यह नहीं कहा कि वह ग्रीनलैंड को डेनमार्क से अलग देखना चाहता है.
पिछले साल से डेनमार्क की मीडिया ने अमेरिका पर आरोप लगाना शुरू किया कि वहां के कुछ लोग ग्रीनलैंड में चुपके से अलगाववाद और अपना असर बढ़ाने का अभियान चला रहे हैं, ताकि वो डेनमार्क से अलग होकर अमेरिका के करीब आ जाए.

पॉलिटिको की रिपोर्ट के मुताबिक, कम से कम तीन अमेरिकी नागरिकों को ग्रीनलैंड में ऐसे संपर्क बनाने, लोकल नेताओं और जनता से जुड़ने की कोशिश करते पाया गया. इस पर चर्चा के बाद अमेरिका ने भी एक आधिकारिक बयान दिया. इसमें कहा गया कि वह ग्रीनलैंड और डेनमार्क के मजबूत संबंधों का सम्मान करता है, लेकिन निजी तौर पर अमेरिका के लोग वहां क्या कर रहे हैं, इस पर उसने कुछ नहीं कहा. न खंडन, न स्वीकृति.
ग्रीनलैंड में जनवरी 2025 में किए गए एक सर्वे में पाया गया कि लगभग 56% लोग उस समय आजादी के पक्ष में थे. इसी सर्वे में यह भी दिखा कि लगभग 45% लोग कहते हैं कि अगर अलग होने से उनकी स्थिति बिगड़ती है, तो उन्हें यह नहीं चाहिए.
इस देश में वैसे तो पचपन हजार के आसपास आबादी है, लेकिन आजादी की मुहिम के लिए कई गुट बने हुए हैं. ये सारे ही समूह किसी न किसी तरह से राजनीति से जुड़े हैं, न कि हथियारबंद संगठन हैं.
कौन-कौन से दल आजादी के लिए सक्रिय
- इनुइट अताकातिगीत पार्टी धीरे-धीरे और योजनाबद्ध तरीके से डेनमार्क से अलग होने की समर्थक है.
- नालेरेक नाम का दल तेजी से और पूरी स्वतंत्रता चाहता रहा.
- डेमोक्रातीत पार्टी आजादी तो चाहती है लेकिन पहले अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर जोर देती है.
- सियूमुत ग्रीनलैंड की पुरानी और प्रभावशाली पार्टी है. यह भी कदम-दर-कदम स्वतंत्रता की ओर बढ़ने की समर्थक है.
अगर ग्रीनलैंड डेनमार्क से अलग होकर आजाद देश बनता है, तो सबसे बड़ी चुनौती उसका खुद टिक पाना होगा. अभी वहां की सरकार, अस्पताल, स्कूल और बाकी सेवाएं डेनमार्क की मदद से चलती हैं. अलगाव के बाद यह मदद खत्म हो सकती है, इसलिए ग्रीनलैंड को अपनी कमाई खुद बढ़ानी होगी. साथ ही सुरक्षा भी बड़ा सवाल है. ग्रीनलैंड के पास अपनी सेना नहीं. ऐसे में उसे अमेरिका या किसी और बड़े देश से सुरक्षा समझौता करना पड़ेगा.