अमेरिका ने हाल में अपनी डाइटरी गाइडलाइन्स में बड़े बदलाव किए. ट्रंप प्रशासन ने इसमें प्रोटीन, डेयरी और कुछ खास तरह के फैट पर जोर दिया, जबकि चीनी और प्रोसेस्ड खाने पर कंट्रोल की बात की. अनाज तक को खाने की प्राथमिकता से हटा दिया गया है. माना जा रहा है कि बढ़ते स्वास्थ्य संकट को देखते हुए ये फैसला लिया गया. दरअसल, अमेरिका में मोटापे सहित कई दिक्कतें तेजी से बढ़ रही हैं. यहां तक कि इसका असर हेल्थकेयर सिस्टम पर पड़ा.
अपने ही सिस्टम से उठा भरोसा
वेस्ट हेल्थ और गैलप सेंटर ऑन हेल्थकेयर के सर्वे में निकलकर आया कि 47 फीसदी अमेरिकी अपने ही हेल्थकेयर में मेजर समस्याएं पाते हैं, जबकि 23 फीसदी लोग सोचते हैं कि सिस्टम गंभीर संकट में है. सर्वे में यह भी दिखा कि 29 फीसदी आबादी के लिए सबसे बड़ी समस्या इलाज करवाना है.
यूरोप, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया में जहां इलाज को बुनियादी हक माना जाता है, वहीं अमेरिका में यह काफी हद तक लोगों की कमाई और बीमा पर निर्भर करता है. इलाज इतना महंगा है कि बीमा होने के बाद भी लोग डॉक्टर के पास जाने से डरते हैं. एंबुलेंस बुलाना, ओपीडी में जाना या क्रॉनिक बीमारी बड़ा खर्च मांगती है. यही वजह है कि लोग इलाज टालते हैं, जिससे बीमारी बढ़ती जाती है.
किस तरह की स्वास्थ्य समस्याएं
मोटापा अब बेहद गंभीर और सिस्टम-लेवल की समस्या बन चुका. वहां करीब 40 फीसदी से ज़्यादा वयस्क मोटापे की श्रेणी में आते हैं. इसे पब्लिक हेल्थ क्राइसिस की तरह देखा जा रहा है. इसी के साथ कई और बीमारियां जैसे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट डिजीज, स्ट्रोक, मानसिक तनाव और कुछ तरह के कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. नशे की समस्या यहां आम हो चुकी, जिसे ट्रंप नार्कोटेररिज्म भी बता रहे हैं.

सेहत का असर कैसे देश की ओवरऑल ताकत पर
खराब सेहत किसी भी देश के लिए सीधा बोझ होती है, लेकिन अमेरिका जैसे सुपरपावर के लिए ये और डरावना है. जब ज्यादा आबादी बीमार होगी तो सरकार, कंपनियों और परिवार पर खर्च का दबाव और बढ़ेगा. वर्कफोर्स पर भी इसका असर होगा. मरीज या तो छुट्टियां लेगा या फिर काम पर आए तो वैसी उत्पादकता नहीं दे सकेगा. सुपरपावर की ताकत सिर्फ मिलिट्री नहीं, उसकी कामकाजी आबादी भी होती है.
तीसरा असर सैन्य ताकत पर पड़ता है. अमेरिका में बड़ी संख्या में युवा मोटापे और फिटनेस की कमी की वजह से सेना में भर्ती के लिए अयोग्य साबित हो जाते हैं. यह फिलहाल तो नहीं, लेकिन आगे चलकर मुश्किल ला सकता है.
चौथा असर राजनीतिक और सामाजिक असंतोष है. जब इलाज महंगा हो, बीमारियां बढ़ें और सिस्टम राहत न दे पाए, तो गुस्सा और पोलराइजेशन बढ़ता है. ज्यादा और लंबे समय तक बीमारी से जूझती आबादी देश की ताकत कम कर सकती है. ये वैसा ही है, जैसे किसी परिवार में एक गंभीर बीमारी के आने पर पूरी व्यवस्था ढह जाए.
इसी संकट को दूर करने के लिए हेल्थ और एग्रीकल्चर विभाग ने मिलकर नई गाइडलाइन बनाई. इसमें 30 मिलियन बच्चों के लिए स्कूल मील भी रिवाइस होगा. अमेरिका साल 2011 में फूड पिरामिड को छोड़ चुका था और माईप्लेट मॉडल अपना लिया था. लेकिन अब दोबारा पुरानी राह पर लौटा जा रहा है.

क्या है खाने का पारंपरिक और रिवाइज्ड मॉडल
फ्लिप्ड फूड पिरामिड दरअसल खाने को समझाने का एक मॉडल था, जिसमें पारंपरिक फूड पिरामिड को उल्टा सोचकर देखा गया था. ट्रैडिशनल फूड पिरामिड में नीचे ब्रेड, चावल, पास्ता जैसे कार्बोहाइड्रेट दिखाए जाते थे. ऊपर सब्ज़ियां, फल, प्रोटीन और सबसे ऊपर फैट होता था. इससे मैसेज गया कि पेट भरने के लिए अनाज सबसे जरूरी है. फ्लिप्ड फूड पिरामिड ने यह सोच पलट दी. इसमें कहा गया कि सबसे ज्यादा जगह सब्ज़ियों और फलों को मिलनी चाहिए. उसके बाद प्रोटीन जैसे दाल, अंडा, मछली, मांस हों. फिर अनाज और चीनी आएं. फैट बहुत कम लें.
मतलब यह कि प्लेट का बड़ा हिस्सा रंग-बिरंगी सब्जियों से भरा हो, न कि रोटी-चावल से.
लेकिन लगभग पंद्रह साल पहले अमेरिका ने पिरामिड मॉडल ही छोड़ दिया. लोगों को ये मॉडल समझ नहीं आता था और वो उनकी रुटीन की पसंद से जुड़ नहीं रहा था. उसकी जगह माईप्लेट आया, जिसमें थाली को चार हिस्सों में दिखाया गया. आधी थाली में फल-सब्जी, बाकी में प्रोटीन और अनाज.
सरकार ने इसे स्कूलों, सरकारी कैंटीन, न्यूट्रिशन प्रोग्राम और पब्लिक कैंपेन के जरिये घर-घर तक पहुंचाना चाहा. स्कूलों में इसका असर साफ दिखा. लंच में प्लेट का आधा हिस्सा फल-सब्ज़ी रखने का नियम जोड़ा गया. घरों में भी इसका असर पड़ा, लेकिन सीमित.

माईप्लेट मॉडल मोटापा रोकने में असरदार साबित नहीं हुआ. इसमें फल-सब्जी तो थे लेकिन यह नहीं था कि अनाज में सफेद ब्रेड और प्रोसेस्ड कार्ब्स लेना कितना खराब है. नतीजा ये हुआ कि ओबेसिटी बढ़ते हुए हेल्थ क्राइसिस तक पहुंच गई. अब यूएस प्रशासन एक बार फिर पुराने मॉडल की तरफ जाने के लिए गाइडलाइन निकाल रहा है.
कुपोषण और भुखमरी भी नहीं है कम
अमेरिका विरोधाभासों का देश है. एक तरफ यहां खाने की बर्बादी है, मोटापा, वहीं दूसरी तरफ खाने की तंगी से जूझ रही आबादी भी है. यूएस इसे फूड इनसिक्योरिटी कहता है. मतलब ऐसे लोग जो यह तय नहीं कर पाते कि उन्हें अगले समय या अगले दिन खाना मिलेगा या नहीं. करोड़ों परिवार ऐसे हैं जिनके पास महीने के आखिर में खाने के पैसे नहीं बचते. बच्चों, बुजुर्गों और अकेले रहने वाले लोगों में यह समस्या ज्यादा है.
इसे संभालने के लिए वहां सूप किचन और फूड बैंक चल रहे हैं. पूरे देश में हजारों सूप किचन हैं और साठ हजार से ज्यादा फूड पैंट्री और मील प्रोग्राम हैं. ये चर्च, एनजीओ, कम्युनिटी सेंटर और वॉलंटियर्स चलाते हैं. यहां लोगों को मुफ्त सूप, ब्रेड, पैकेज्ड फूड या पका हुआ खाना भी मिलता है.
कई शहरों में लोग रोज लाइन में लगकर खाना लेते हैं. न्यूयॉर्क, लॉस एंजेलिस और शिकागो जैसे अमीर शहरों में भी सूप किचन सुबह से रात तक चलते हैं. महंगाई, हेल्थकेयर खर्च और किराया इतना ज्यादा है कि नौकरी करने वाले लोग भी कभी-कभी मुफ्त खाने पर मजबूर हो जाते हैं.
यही सब देखते हुए हेल्थ सेक्रेटरी रॉबर्ट एफ कैनेडी ने बुधवार को वाइट हाउस में नई गाइडलाइन पर बात की. माना जा रहा है कि अमेरिका सेहत के बहाने ही बैक टू रूट्स हो सकता है.