दूसरे विश्व युद्ध के ऐन बाद खूब धूमधाम से संयुक्त राष्ट्र यानी यूनाइटेड नेशन्स की नींव रखी गई. उम्मीद थी कि इसकी अलग-अलग शाखाएं युद्ध के जख्मों पर मरहम रखेंगी और आगे भी यही संस्था शांति बनाए रख सकेगी. यूएन शुरुआत में बेहद कद्दावर बॉडी मानी भी जाती थी लेकिन वक्त के साथ इसकी ताकत कम होती दिख रही है. यहां तक कि हाल के सालों में लगातार अपील के बाद भी कई देश जंग में मुब्तिला हैं और कई मनमानी कर रहे हैं. इस बीच ये बात भी उठ रही है कि या तो यूएन को रिफॉर्म चाहिए, या फिर नया विकल्प.
कब और किस मकसद के साथ बना यूएन
यूएन की औपचारिक शुरुआत अक्टूबर 1945 को हुई. दुनिया ने दो बड़े और तबाही भरे युद्ध देख लिए थे, खासकर दूसरा विश्व युद्ध जिसमें करोड़ों लोग मारे गए. देशों को लगा कि अगर आपसी बातचीत और नियमों का साझा मंच नहीं बना, तो दुनिया के खत्म होते देर नहीं लगेगी. देशों के बीच आपसी विवाद सुलझाने, युद्ध रोकने, मानवाधिकार पर काम, शरणार्थियों की मदद जैसे कई इरादों के साथ यह मंच बना, जिसमें दुनिया के लगभग सारे देश सदस्य हैं.
इसकी कई शाखाएं हैं, जिनके हिस्से अलग-अलग काम है, जैसे कोई संस्था युद्ध रोकने या करने पर काम करती है, तो कोई भूख, गरीबी पर. शांति लाने का जिम्मा यूएनएससी के पास है.
क्यों यूएन पर उठ रहे सवाल
इसकी वजह लगातार चल रहे युद्ध और किसी देश की, दूसरे पर एकाएक हुई कार्रवाई है. यूएन चार्टर के मुताबिक किसी भी देश की तरफ से ताकत का इस्तेमाल तभी जायज माना जाता है जब उसे यूएनएससी की मंजूरी मिली हो. यह बात चार्टर के आर्टिकल 42 में लिखी है.
दूसरा हाल यह होता है जब कोई देश अपनी रक्षा में कार्रवाई कर रहा हो. यानी अगर उस पर हमला हुआ है या तुरंत खतरा है, तब वह बिना मंजूरी के जवाबी कदम उठा सकता है. इसके अलावा किसी देश का यूं ही दूसरे देश पर हमला करना अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ माना जाता है. लेकिन ऐसा लगातार हो रहा है, और यूएनएससी असहाय है.

ऐसा इसलिए हो रहा है कि यूएनएससी के पांच स्थायी सदस्यों को वीटो पावर मिली हुई है. चार एक साथ हों, और पांचवां खिलाफ वोट कर दे तो चारों एकमत वोट बेकार हो जाते हैं. यूएनएससी में यही हो रहा है. अमेरिका, रूस और चीन लगातार एक-दूसरे के खिलाफ अड़ंगा लगा रहे हैं. यानी यूएन का हाल उस घर की तरह हो चुका, जहां जॉइंट फैमिली दिखती तो है लेकिन रसोई बंट चुकी और तलवारें हर वक्त खिंची रहती हैं.
तो क्या यूएन रिफॉर्म इसे ठीक कर सकता है
यूएन रिफॉर्म का मतलब है संयुक्त राष्ट्र के ढांचे और काम करने के तौर-तरीकों में बदलाव ताकि वह ज्यादा असरदार बन सके. ये नए जमाने के हिसाब से खुद को ढालने की तरह है ताकि नई दुनिया में फिट बैठ सकें. रिफॉर्म की मांग करने वाले उम्मीद जताते हैं कि बदलाव से छोटे देशों की आवाज भी सुनी जाएगी और सब कुछ एकतरफा नहीं रहेगा.
रिफॉर्म में किस तरह की मांगें हैं
- यूएनएससी में सुधार की बात लंबे समय से होती रही क्योंकि मौजूदा स्थायी सदस्य साल 1945 की दुनिया को दिखाते हैं, न कि 2026 की.
- भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान जैसे देशों को स्थायी सदस्य बनाने की बात लंबे समय से उठ रही है ताकि ग्लोबल रिप्रेजेंटेशन हो सके.
- वीटो पावर पर रोक या उसके इस्तेमाल को सीमित किया जाए ताकि लोग केकड़ों की तरह एक-दूसरे को गिराते ही न रहें.
- बड़ी कुदरती आपदा या नरसंहार जैसे मामलों में वीटो बिल्कुल न हो, बल्कि तुरंत मदद मिले.
- यूएनएससी के कामकाज में पारदर्शिता हो ताकि बाकी देश भी उसका काम समझ सकें.

क्या यूएन में सुधार की गुंजाइश है
इसमें किसी भी तरह का रिफॉर्म आसान नहीं क्योंकि इसकी प्रक्रिया खुद यूएन चार्टर में तय की गई है. यूएन में सुधार की पहल यूएन जनरल असेंबली से होती है, जहां सभी सदस्य देश वोट करेंगे. बहुमत हो भी जाए तो भी प्रस्ताव पास होना आसान नहीं. असली शक्ति यूएनएससी के पास है. यूएनएससी में पांच स्थायी सदस्य- अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस हैं, जिनमें आपस में ही खींचतान है. यही सबसे बड़ी अड़चन है.
क्या वैकल्पिक स्ट्रक्चर दिख रहा है
बदलाव मुमकिन न होता देखकर यूएन के समानांतर ढांचा खड़ा करने की बात होने लगी है. दरअसल साल 1945 की दुनिया, जब यूएन बना था और अब की दुनिया में जमीन-आसमान का फर्क है, लेकिन यूएन का स्ट्रक्चर अब भी पुराना है. इसमें जिम्मेदार पद बड़े देशों के हिस्से हैं, जबकि विकासशील देश अस्थायी सदस्य बनकर ही रह जाते हैं. यूएन एक तरह से बच्चे का लिबास है, जिसे वयस्क को पहनाया जा रहा है. ऐसे में विकल्पों की भी चर्चा है, जो स्थानीय या एक समान सोच वाले देशों का ग्रुप हो और स्थानीय मामले आपस में ही सुलझा लिए जाएं.
- रूस और चीन अक्सर कहते रहे हैं कि यूएन वेस्ट खासकर अमेरिका के असर में काम करता है, इसलिए वे समानांतर मंचों को मजबूत करने की बात करते हैं.
- ब्रिक्स देश यानी ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका यूएन को पूरी तरह छोड़ने की नहीं, लेकिन उसके बाहर भी मजबूत विकल्प खड़े करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.
- ग्लोबल साउथ यानी एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देश मानते हैं कि यूएन उनकी आवाज नहीं सुनता, इसलिए वे क्षेत्रीय संगठनों पर भरोसा करने लगे हैं.