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तमिलनाडु का वो शैव भक्ति आंदोलन, जिसने बौद्ध-जैन प्रभाव से तमिलों को उबारा

तमिलनाडु के इतिहास में जैन और बौद्ध दर्शन का गहरा प्रभाव था, लेकिन ये दर्शन जीवन में उत्साह और रंग की कमी के कारण नीरस हो गए थे. इस खालीपन को भरने के लिए नयनमार और आलवार संतों ने भक्ति आंदोलन की शुरुआत की, जिसने शिव और विष्णु की भक्ति को आम जनता तक पहुंचाया.

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तमिलनाडु में शैव संतों की परंपरा में 63 नयनमार संतों का नाम उल्लेखनीय है
तमिलनाडु में शैव संतों की परंपरा में 63 नयनमार संतों का नाम उल्लेखनीय है

तमिलनाडु के इतिहास पर गहराई से नजर डालें तो यहां तमिल संस्कृति के अलावा दो और फिलॉस्फी का असर दिखाई देता है. यहां सदियों तक जैन और बौद्ध दर्शन का असर रहा. इन परंपराओं ने समाज को अनुशासन, साहित्य को ऊंचाई दी और सोच को गहराई दी. इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन यहां ये भी मानना पड़ेगा कि ये दर्शन नीरस और बोरिंग होते गए. जिंदगी में न कोई रंग न कोई उत्साह. सबकुछ गायब.

जैन और बौद्ध दर्शन से नीरस जीवन
जैन और बौद्ध परंपरा असली सच को जानने का दावा तो करती थीं लेकिन दुनिया से दूरी और भारी-भरकम त्याग और उपदेश वाली शर्तों पर. ये सब किताबी अधिक था और प्रैक्टिकल नहीं था. इंसान सिर्फ मोक्ष नहीं चाहता, वह जीना भी चाहता है और इसमें तमाम इंसानी भावनाएं उसकी जरूरत हैं. ऐसे में तमिल समाज के भीतर एक खालीपन पैदा हो गया था. जिसे शून्य कहा गया और यह शून्य किसी उपदेश या फिलॉसफी से नहीं जाने वाला था, इसके लिए चाहिए थी भावना. यहीं से तमिलों के लिए सीन में 'नयनमार और आलवार' परंपरा की एंट्री होती है. नयनमार जो कि शैव थे और आलवार यानी भगवान विष्णु के भजन गाने वाले संत.

नयनमार संतों की परंपरा
नयनमार संत कोई दार्शनिक नहीं थे. वह मठाधीश और मठों में रहने वाले विद्वान भी नहीं थे. ये तो गली-मोहल्लों में घूमने वाले, मंदिरों में गाने वाले, आम लोगों की भाषा में ईश्वर से बात करने वाले लोग थे. उन्होंने तमिल समाज को बताया कि ईश्वर से डरने की नहीं, उसे प्यार करने की ज़रूरत है. यहीं से शुरू होता है 'भक्ति आंदोलन' एक ऐसा आंदोलन जिसने तमिल जीवन को फिर से रंग, संगीत और आनंद से भर दिया.

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पहले बात शैव आंदोलन की, यानी भक्ति परंपरा को वो आंदोलन जिसमें शिव महादेव ईष्ट देवता के रूप में उभरकर आते हैं.

क्या है शैव परंपरा की सबसे बड़ी ताकत?
शैव परंपरा की सबसे बड़ी ताकत यही थी कि तमिलों के लिए वह उनकी अपनी तमिल भूमि की परंपरा थी. जबकि उनका मानना था कि जैन और बौद्ध परंपरा उत्तर भारत से आई थी. यानी वैसी ही बाहरी भावना जो उन्हें द्रविड़ शब्द के साथ महसूस होती थी. हालांकि जैन और बौद्ध ने तमिल भाषा अपनाई, खुद को ढाला, लेकिन उनकी जड़ें बाहर थीं. शैव परंपरा के साथ ऐसा नहीं था.

संगम साहित्य में जिस 'मुतलवन' यानी 'आदि कर्ता' का जिक्र मिलता है, जो नृत्य करता है, सृष्टि को चलाता है, वह कोई और नहीं बल्कि शिव की ही शुरुआती छवि है. मतलब साफ है नयनमार कोई नया भगवान लेकर नहीं आए, उन्होंने उसी पुराने, जाने-पहचाने शिव को फिर से लोगों के दिलों में उतार दिया. अगर कहें तो यह संन्यास के सॉफ्टवेयर से दिल के हार्डवेयर की वापसी थी. दर्शन के कठिन सिद्धांत को सरल और आसान भाषा में समझाने की कवायद थी. एक तरह से जीवन के लिए नया री-स्टार्ट था, जिसे शैव परंपरा के नाम से जाना गया.

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तमिल परंपरा में कार्तिकेय या मुरुगन
तमिल भाषा का सबसे पुराना ग्रंथ 'तोल्काप्पियम' भी कहता है कि, पहाड़ी इलाकों यानी 'कुरिंजी' के देवता हैं मुरुगन, जिन्हें हम उत्तर भारतीय कार्तिकेय के नाम से जानते हैं. इन्हीं कार्तिकेय को तमिल लाल रंग यानी शुभता के रंग के रूप में भी देखते हैं. लाल रंग योद्धा का भी प्रतीक है और लाल रंग को यौवन की ऊर्जा से भी जोड़ा जाता  है. तमिलों ने इन्हीं मुरुगन या कार्तिकेय को बाद में शिव का पुत्र माना, जबकि उत्तर भारतीय कहानियों में वह शिव के बेटे हैं ही और इसमें कोई विवाद नहीं है.

Time Tide And Tamil
संत अप्पर, जो जैन परंपरा से शैव परंपरा में शामिल हुए

छठी से नौवीं शताब्दी के बीच करीब '63 नयनमार संत' सामने आए. ये सभी अलग-अलग पृष्ठभूमि से थे, कोई ब्राह्मण, कोई शूद्र, कोई व्यापारी, कोई महिला.

संदेश साफ था, शिव को जाति नहीं दिखती, उन्हें सिर्फ भक्ति दिखती है. इन संतों की सबसे बड़ी रणनीति थी भाषा. उन्होंने संस्कृत के भारी-भरकम श्लोक नहीं चुने. उन्होंने सीधी, सरल तमिल में गाना शुरू किया. वे मंदिर-मंदिर घूमते, शिव की महिमा गाते. लोग सुनते, जुड़ते, गुनगुनाने लगते. यह किसी किताब या पौराणिक ग्रंथ से नहीं, बल्कि हृदय से भाव से निकली भक्ति थी.

नयनार संतों के तीन स्तंभ
अब इसी परंपरा मे और गहराई से देखें तो तमिलों ने इसे तीन स्तंभों के तौर पर पहचाना. पहले थे अप्पर, दूसरे थे संबंदर और तीसरे थे सुंदरर. अप्पर इस परंपरा के बड़े संत रहे हैं. वह डर के खिलाफ आस्था रखने वाले थे. उनकी आस्था में ईश्वर से किसी तरह का डर नहीं बल्कि प्रेम दिखता था. अप्पर को 'तिरुनावुक्करसर' कहा जाता है. खास बात है कि पहले ये जैन संन्यासी थे, बाद में वे शैव बन गए. यह बात जैन प्रभाव वाले राजा महेंद्रवर्मन को नागवार गुज़री.

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लोककथाओं में है कि, संत अप्पर को चूने की भट्ठी में डाला गया, जहर दिया गया, हाथी से कुचलवाया गया, पत्थर से बांधकर समुद्र में फेंका गया, लेकिन हर बार वे बच निकले और हर बार शिव के भजन गाते हुए मस्त रहे. ये कहानी आपको उत्तर भारत में प्रचलित भगवान विष्णु और उनके बाल भक्त प्रह्लाद से मिलती-जुलती लग रही होगी. तमिलों ने भी इसी तर्ज पर शिव की भक्ति की. नयनमार संतों के जरिए शैव परंपरा ऐसे ही आगे बढ़ी..

संत अप्पर का का एक भाव बहुत मशहूर है 'हम किसी के गुलाम नहीं, हमें मौत से भी डर नहीं.' यह राजनीति नहीं थी यह आत्मा की आजादी की बात थी.

इसी कड़ी में अगले संत हैं तिरुज्ञानसंबंदर. जिन्हें आज संत संबंदर नाम से जाना जाता है. वह तीन साल की उम्र में संत बन गए और तमिल लोककथाओं में है कि माता पार्वती ने खुद उन्हें दूध पिलाया था. उन्हें जैन संतों के विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन वह खुद जैन तपस्वियों से बहस नहीं करते थे. वे गाते थे और उनकी कविता में छिपे भाव ही बहस को जीत लेते  थे.

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संत तिरुज्ञानसंबंदर, जिन्हें शैव परंपरा का बाल संत माना जाता है

मदुरै जैसे शहर, जो जैन प्रभाव में थे वहां फिर से शिव भक्ति लौटी. संबंदर की ही भक्ति से मुरुगन में तमिल समाज की भक्ति और आस्था बड़े पैमाने पर बढ़ी, जिन्होंने उनको पौराणिक देवता से रक्षक, लोकदेवता या समाज के जीवित देवता में बदल दिया. अब आते हैं तीसरे संत सुंदरर पर. ये पहले दोनों से बहुत अलग थे. वे संन्यासी नहीं बने और न ही उन्होंने दुनिया या सांसारिक भोग-भावना का त्याग किया. उन्होंने शिव को ही मित्र बना लिया.

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शिवतत्व में मित्रता का भाव देखना
शिव को बिल्कुल अपने जैसा समझा. उन्होंने देवत्व की दिव्यता वाली भावना से परे जाकर देवता में भी इंसान को खोज लिया. वे शिव से मित्र की तरह बात करते थे. उनकी शिव भक्ति में शिकायत, नाराजगी और मजाक सभी एक साथ शामिल था. उन्होंने दिखाया कि भक्ति का मतलब जीवन छोड़ना नहीं, जीवन के साथ ईश्वर को जोड़ना है.

सुंदरर के इस दर्शन से उत्तर भारतीय भी रिलेट कर पाएंगे क्योंकि अधिकांश गृहस्थ इसी रूप में शिव की पूजा करते हैं. वह शिव को बड़े ही सरल रूप में अपनाते हैं और उन्हें प्यार से बाबा कहते हैं. संत सुंदरर की परंपरा आज के गृहस्थ के लिए सबसे प्रासंगिक हैं.

इन तीन संतों की चर्चा के बाद अब आते हैं, उस रहस्यवादी गहराई और डराने वाली सुंदरता पर जो शिवत्व का मूल है. नयनमार संतों में ही एक संत हुए हैं तिरुमूलर, जिन्होंने बताया कि प्रेम ही शिव है. इसी भावना और विचार को गहराई देने के लिए उन्होंने प्रसिद्ध तमिल ग्रंथ 'तिरुमंत्रम्' रचा, जिसमें 3000 कविताओं में शैव दर्शन का सार है. इन कविताओं में योग भी है, तंत्र भी और भक्ति भी, यानी तीनों का संगम है.

उनका सबसे प्रसिद्ध वाक्य 'अन्बे शिवम्' यानी प्रेम ही शिव है. उन्होंने कहा, अगर आप प्रेम और ईश्वर को अलग मानते हैं, तो आप ईश्वर को नहीं समझ पा रहे हैं. इसी कड़ी में कारैक्काल अम्मैयार का भी नाम लेना चाहिए. वह महिला संत जिन्होंने भक्ति की भयावह सुंदरता को अपनाया. यानी वह सत्य, जिसे हम सत्यम, शिवम, सुंदरम् कहते हैं.

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वह सत्य जो चिता की भस्म और श्मसान की आग के रूप में दिखाई देता है. कारैक्काल अम्मैयार ने ईश्वर से सुंदरता नहीं बल्कि कंकाल-सा 'सुंदर' शरीर मांगा, ताकि शरीर की बाहरी सुंदरता का आकर्षण हटे और फिर सच्ची भक्ति पैदा हो. यानी इसमें बात वही जैन दर्शन वाली थी, लेकिन सीधी-सादी कविता में यह बात इतनी आसानी से कही गई थी कि वह भक्ति की एक परंपरा बन गई.

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संत सुंदरर, जिन्होंने महादेव शिव को मित्र के रूप में स्थापित किया

श्मशान में गाने वाली नयनार संत
कारैक्काल अम्मैयार वो हिम्मती संत थीं, जो श्मशान में गाती थीं, उनकी कविताएं डराती भी हैं लेकिन अपने आकर्षण में खींचती भी हैं. तमिल कविताओं में लिखा मिलता है कि शिव ने खुद उन्हें 'अम्मा' कहा था और यह यह भक्ति की चरम अवस्था थी. जहां भगवान खुद अपने भक्त का मुरीद हो जाता है.

बाद में नंबी आंडार नंबी ने इन सब रचनाओं को '12 तिरुमुरै' में एक साथ किया. कहने का मतलब ये है कि नयनमार संतों की परंपराओं ने सिर्फ मंदिरों में भीड़ नहीं बढ़ाई, बल्कि उन्होंने तमिल परंपरा को फिर से सजीव और रंगीन बना दिया था. जहां पहले खामोशी थी, वहां अब घंटे, ढोल बजने लगे और इनकी थाप पर एक से बढ़कर एक भजन मंदिर की चौखट से बाहर निकलकर परंपरा में शामिल हो गए.

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जैन-बौद्ध दौर की शून्यता अब उत्सव में बदल चुकी थी और इस तरह तमिलों के लिए एक महान सांस्कृतिक पुनर्जागरण शुरू हुआ. शैव भक्ति आंदोलन ने तमिल समाज को उसकी जड़ें लौटाईं, भक्ति को आम आदमी तक पहुंचाया और तमिल भाषा को फिर से ईश्वर की भाषा बना दिया. 

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