लंबे समय से खिंचता चले जाने की वजह से रूस-यूक्रेन युद्ध पर बात भले कम हो चुकी, लेकिन ये त्रासदी काफी बड़ी है. लगातार जमीनी और हवाई हमलों के बीच यूक्रेन के बॉर्डर से लोग लगातार सुरक्षित देशों की तरफ जाने लगे. शुरुआत में वे पोलैंड की तरफ जा रहे थे, लेकिन भीड़ बढ़ने पर वहां भी अस्वीकार्यता दिखने लगी. इस बीच माइग्रेशन होता रहा. इस विस्थापन की तुलना दूसरे विश्व युद्ध से हो रही है.
माइग्रेशन पर डेटा क्या कहते हैं
रूस-यूक्रेन जंग ने यूक्रेन को उस डरावने दौर में धकेल दिया है, जिसे यूरोप ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद कभी नहीं देखा. फरवरी 2022 में जैसे ही रूसी हमले शुरू हुए, यूक्रेन के शहरों में सायरन गूंजने लगे, बम गिरने लगे और लोगों के पास सिर्फ एक ही रास्ता बचा- बच निकलना. जो कल तक सामान्य जिंदगी जी रहे थे, वे एक झटके में शरणार्थी बन गए. यूक्रेन की कुल आबादी करीब 4.1 से 4.2 करोड़ मानी जाती थी. इस हिसाब से देखें तो करीब 1 करोड़ लोग विस्थापित हो चुके हैं. यानी लगभग हर चार में से एक यूक्रेनी को अपना घर छोड़ना पड़ा है.
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यूरोप से करीब 3 से 4 करोड़ लोग विस्थापित हुए थे. ये पलायन कई सालों में धीरे-धीरे हुआ था, क्योंकि दूसरा विश्व युद्ध लगभग सात साल तक चला. इसके मुकाबले यूक्रेन युद्ध में बहुत कम समय में हालात इतने भयावह हो चुके कि करीब एक तिहाई आबादी घर छोड़ने को मजबूर हो गई. लाखों लोग यूक्रेन के अंदर ही भटक रहे हैं, जबकि बड़ी संख्या में लोग जान बचाकर दूसरे देशों में पहुंच चुके हैं. दूसरे विश्व युद्ध में जो विस्थापन सालों में हुआ था, वही यूक्रेन में कुछ ही महीनों में हो गया.
यूनाइटेड नेशन्स हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजी (यूएनएचसीआर) के अनुसार, 53 लाख पूरे यूरोप में फैले हुए हैं. वहीं लाखों लोग देश के भीतर ही लगातार विस्थापित हो रहे हैं. जिन इलाकों में बमबारी और गोलीबारी तेज है, वहां लोग बेसमेंट, मेट्रो स्टेशनों और अंडरग्राउंड शेल्टर में रह रहे हैं.

देश के अंदर भी हो रहा माइग्रेशन
जो लोग शहर छोड़ चुके हैं, वे देश के सुरक्षित माने जाने वाले हिस्सों में बनाए गए अस्थायी कैंपों में रह रहे हैं. कीव के अंदर हजारों राहत शिविर और शरण स्थल बनाए गए हैं. स्कूलों, खेल स्टेडियमों, सामुदायिक भवनों और खाली फैक्ट्रियों को कैंप में बदला गया है. इन जगहों पर लोगों को बुनियादी सुविधाएं जैसे खाने का सामान, कंबल, दवाइयां और इलाज दिया जा रहा है, लेकिन आबादी ज्यादा होने की वजह से कमी बनी हुई है.
यूनिसेफ के अनुसार, कीव में सर्दियों में तापमान माइनस 18 तक जा रहा है. इस बीच बिजली कटौती हो रही है, जिससे हीटिंग सिस्टम बेकार हो चुका. ठंड से बचने के लिए लोग अलग-अलग तरीके आजमा रहे हैं, जैसे खिड़कियों की दरारों में सॉफ्ट टॉयज की स्टफिंग, या आग जलाना. ब्लैकआउट की स्थिति में रोशनी बंद करनी होती है, ऐसे में स्थिति और खराब हो जाती है. ठंड और पोषण की कमी का सबसे ज्यादा असर पांच साल या कम उम्र के बच्चों पर दिख रहा है.
पोलैंड बना पहला शेल्टर और ट्रांजिट
जंग शुरू होते ही यूक्रेन से लोग पोलैंड जाने लगे. दरअसल दोनों के बीच करीब 530 किलोमीटर लंबी साझा सीमा है. मुश्किल में फंसे पड़ोसियों के लिए पोलैंड ने दरवाजे खोल दिया, जबकि इससे पहले वो रिफ्यूजियों को लेकर बेहद सख्त रहा था. लाखों लोगों बिना वीजा अलग-अलग रास्तों से वहां पहुंचे. पोलिश सरकार ने रेलवे स्टेशनों, स्कूलों और सामुदायिक भवनों को अस्थायी कैंप्स में बदल दिया. लोगों को मुफ्त इलाज, और काम करने की छूट भी मिली, भले ही अस्थायी तौर पर सही.
शुरुआती दरियादिली लेकिन फिर समस्या देने लगी. इतने बड़े पैमाने पर लोगों का आना पोलैंड की नौकरी, आवास और सामाजिक सुविधाओं पर दबाव डालने लगा. कई शहरों में किराए बढ़ गए और अस्पतालों-स्कूलों में भीड़ बढ़ने लगी. यहां तक कि नागरिक बाहरियों का विरोध भी करने लगे. इसी बीच यूएन की पहल पर दूसरे देश भी उन्हें शरण देने लगे.

और किन देशों ने दी शरण
जर्मनी में बड़ी संख्या में शरणार्थियों को रहने, काम करने की छूट मिली और सोशल सपोर्ट मिला.
चेक रिपब्लिक छोटा होने के बावजूद हजारों लोगों के लिए अस्थाई शरणगाह बना हुआ है.
रोमानिया के सीमावर्ती इलाकों में राहत कैंप और ट्रांजिट सुविधा दी गई है.
इटली और स्पेन भी परिवारों और बच्चों को संरक्षण देने के लिए आगे आए.
यही पहल अमेरिका और कनाडा जैसे देशों की तरफ से भी दिखी. अमेरिका ने एक खास वीजा इसी देश के लिए जारी किया.
किस तरह का वीजा सिस्टम
युद्ध शुरू होते ही यूरोपीय संघ ने टेंपररी प्रोटेक्शन डायरेक्टिव्स (टीपीएस) लागू किया. इसके तहत यूक्रेनियों को तुरंत यूरोप में रहने, काम करने, पढ़ाई करने और स्वास्थ्य सेवाएं लेने की इजाजत मिल गई. यह वीजा आसान तरीके से यूक्रेनी नागरिकों को एंट्री देता है ताकि लाखों लोग तेजी से सेफ देशों तक पहुंच सकें.
पोलैंड, जर्मनी, चेक रिपब्लिक, रोमानिया और हंगरी जैसे देशों ने इसे तुरंत लागू किया. इसके अलावा, कुछ देशों ने नेशनल रिफ्यूजी वीजा भी शुरू किया, जिनमें यूक्रेनियों को 1 से 3 साल तक रहने और काम करने की इजाजत दी गई.
फरवरी 2022 के बाद से करीब ढाई लाख यूक्रेनी लोग अमेरिका चले गए. उन्हें वहां टेम्पररी प्रोटेक्टेड स्टेटस या फिर यूनाइटिंग फॉर यूक्रेन (यू4यू) नाम से वीजा प्रोग्राम का फायदा मिला. यह योजना स्पॉन्सरशिप के आधार पर थी, यानी अमेरिका में रहने वाला कोई शख्स उनकी जिम्मेदारी लेता था. हालांकि पिछली जनवरी में ट्रंप प्रशासन के आने के बाद ये प्रोग्राम रुक गया. इसके बाद से हालात बदल रहे हैं. बहुत से यूक्रेनी परिवार परमिट रिन्यू नहीं करवा पा रहे.
शरणार्थियों को लेकर दिखने लगी झुंझलाहट
यूक्रेन से बड़ी संख्या में लोगों का आना उसी वक्त हो रहा है, जब सीरिया, अफगानिस्तान, सूडान और वेनेजुएला जैसे गैर-यूरोपीय मुल्कों से भी रिकॉर्ड संख्या में शरणार्थी माइग्रेट कर रहे हैं. यानी इन देशों पर सिर्फ यूक्रेन युद्ध का असर नहीं है, बल्कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे कन्फ्लिक्ट का बोझ भी एक साथ पड़ रहा है. इसी वजह से कई देश चाहते रहे कि रूस और यूक्रेन के बीच लड़ाई बंद हो जाए.