डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड को पाने के लिए सारा जोर लगाए हुए हैं. इसके लिए वे अपने पुराने साथी यूरोप तक से भिड़ने को तैयार हैं. तर्क है कि ग्रीनलैंड अगर अमेरिका के हिस्से न आया तो रूस और चीन उसपर कब्जा कर लेंगे और सीधा असर यूएस की नेशनल सिक्योरिटी पर होगा. लंबे-चौड़े द्वीपीय देश ग्रीनलैंड पर अमेरिका की नजरें पहले से रहीं. कई दशक पहले उसने यहां एक खुफिया मिशन शुरू किया था, जिसे रिसर्च के नाम पर ढांपे रखा था.
कुछ इस तरह से शुरू हुई थी कहानी
मई 1959 की एक सुबह अमेरिकी सेना के कुछ अफसर ग्रीनलैंड की जमीन को देख रहे थे. उनके सामने दूर-दूर तक फैली हुई बर्फ थी. सैन्य अधिकारी यहां बर्फ के नीचे बनने वाले मिलिट्री ठिकाने के लिए जगह नाप रहे थे. इस इन्सटॉलेशन का नाम रखा गया, कैंप सेंचुरी. सबको बताया गया कि यह परमाणु ऊर्जा से चलने वाला आर्कटिक रिसर्च सेंटर है, जहां बर्फीले मौसम पर स्टडी होगी. लेकिन सच्चाई कुछ और थी.
असल में यह ठिकाना शीत युद्ध के दौरान एक सीक्रेट योजना का हिस्सा था. इसके तहत बर्फ के नीचे सुरंगों का जाल और मिसाइल रखने के ठिकाने बनाने थे. इन सुरंगों को रेल जैसी गाड़ियों से जोड़ा जाना था. इस पूरी योजना को ऑपरेशन आइसवर्म कहा गया था. यह खुफिया चीज थी, जिसे कैंप सेंचुरी रिसर्च सेंटर की आड़ में रखा गया.
अलग मकसद के साथ चल रहा था काम
इसका उद्देश्य था बर्फ के नीचे सुरंगों और मिसाइल ठिकानों का जाल बनाना. इन सुरंगों में परमाणु मिसाइलें छिपाई जानी थीं, जिन्हें अलग-अलग स्थानों पर इधर-उधर घुमाया जा सकता था, ताकि दुश्मन देश अंदाजा न लगा सके कि असली हथियार कहां हैं. दरअसल वो कोल्ड वॉर का समय था. रूस (तब सोवियत संघ) और अमेरिका दोनों एक-दूसरे से आगे जाने के तरीके खोज रहे थे. दोनों के पास परमाणु हथियार थे और आशंका थी कि कभी भी हमला हो सकता है. अमेरिका ऐसी जगह ढूंढ रहा था, जहां वह अपने परमाणु हथियार छिपाकर, सुरक्षित और चुपचाप रख सके.

ग्रीनलैंड इसके लिए आदर्श लगा. यह सोवियत संघ के काफी पास था, आबादी बेहद कम थी और ऊपर से मोटी बर्फ की चादर थी, जिसे अमेरिका ने प्राकृतिक ढाल माना. पूरा प्लान उत्तरी ग्रीनलैंड के करीब 52 हजार वर्ग मील इलाके में फैला हुआ था. डेनमार्क की सरकार को बताया गया था कि कैंप सेंचुरी एक वैज्ञानिक और रिसर्च प्रोजेक्ट है. इसी आधार पर अमेरिका को वहां काम करने की इजाज़त मिली.
जोर-शोर से चलने लगा काम
बर्फ के नीचे सुरंगें और मिसाइल ठिकाने बनाने का काम गोपनीय तरीके से शुरू किया गया. सबसे पहले अमेरिकी सेना ने कैंप सेंचुरी को एक रिसर्च स्टेशन के रूप में तैयार किया. भारी मशीनें, आर्कटिक वाहन और खास कटिंग टूल्स बर्फ पर लाए गए. बर्फ को काटकर अंदर लंबी-लंबी सुरंगें बनाई गईं, जिनकी दीवारों को बर्फ और स्टील से सहारा दिया गया था. टनल्स के भीतर बिजली-पानी और रहने का बंदोबस्त हुआ. कैंप को चलाने के लिए छोटा परमाणु रिएक्टर लगाया गया. लेकिन छह सालों के भीतर सारा तामझाम समेटना पड़ा.
कहां हुई थी समस्या
ऑपरेशन आइसवर्म को चलाए रखना समय के साथ बेहद खतरनाक हो गया था, क्योंकि यह योजना जमीन पर नहीं, बल्कि लगातार हिलती-डुलती बर्फ पर टिकी थी. शुरुआत में अमेरिका ने माना था कि ग्रीनलैंड की मोटी बर्फ स्थिर रहेगी, लेकिन कुछ ही सालों में साफ हो गया कि ग्लेशियर धीरे-धीरे खिसकते रहते हैं. इसका नतीजा यह हुआ कि बर्फ के नीचे बनी सुरंगें दबने लगीं, दीवारें टेढ़ी होने लगीं और मिसाइल ले जाने वाली पटरियां टूटने लगीं. अगर इस हाल में परमाणु मिसाइलें तैनात कर दी जातीं, तो हादसे का खतरा रहता.
दूसरा बड़ा खतरा था परमाणु रिएक्टर. कैंप सेंचुरी को बिजली देने वाला यह रिएक्टर बर्फ के नीचे लगाया गया था. सैनिकों को रेडिएशन का डर सताने लगा और किसी तकनीकी खराबी की स्थिति में उसे संभालना बेहद मुश्किल होता. सबसे कटे हुए और बर्फीले इलाके में कुछ भी हो तो संभालना काफी मुश्किल था.

तीसरी वजह थी राजनीतिक जोखिम. डेनमार्क की नीति परमाणु हथियारों के खिलाफ थी. अगर ऑपरेशन आइसवर्म का सच उस समय ही उजागर हो जाता, तो अमेरिका को भारी कूटनीतिक नुकसान उठाना पड़ता क्योंकि उसने धोखे से जमीन ली थी.
कैसे खुला था राज
प्रोजेक्ट आइसवर्म के बारे में दुनिया को बहुत देर से पता चला. साल 1997 में डेनमार्क की संसद ने ग्रीनलैंड में अमेरिकी गतिविधियों की जांच शुरू की. इस दौरान पुराने सरकारी दस्तावेज, सैन्य फाइलें और रिपोर्ट सामने आईं. इन्हीं कागजात में पहली बार प्रोजेक्ट आइसवर्म का नाम और उसकी असली योजना साफ-साफ लिखी मिली. इसके बाद ही बाकियों को पता लग सका कि अमेरिका रिसर्च सेंटर की आड़ में परमाणु सैन्य प्लान बना चुका था.
अब ट्रंप को क्यों चाहिए ग्रीनलैंड
अब अमेरिका को ग्रीनलैंड खुफिया परमाणु मिशन के लिए नहीं चाहिए, बल्कि इसके लिए कई और वजहें जुट चुकी हैं. क्लाइमेट चेंज की वजह से यहां की बर्फ पिघल रही है और नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं. इससे व्यापार और सैन्य मूवमेंट दोनों में फायदा हो सकता है. अमेरिका नहीं चाहता कि इस इलाके में रूस और चीन आगे निकल जाएं.
दूसरी बड़ी वजह है सुरक्षा और सेना. ग्रीनलैंड अमेरिका और यूरोप के बीच एक अहम जगह पर है. यहां पहले से अमेरिका का थुले एयर बेस है, जो मिसाइल चेतावनी सिस्टम और स्पेस निगरानी के लिए बेहद जरूरी माना जाता है. ग्रीनलैंड पर ज्यादा पकड़ होने से अमेरिका अपना डिफेंस मजबूत कर सकता है.
कुदरती संसाधनों जैसे रेयर अर्थ मिनरल्स, तेल और गैस की ग्रीनलैंड में भरमार है. यह तकनीक और भविष्य में सैन्य बढ़त दोनों के लिए जरूरी है. चीन और रूस दोनों ही देश पहले से इसपर नजर जमाए हुए हैं.