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क्या गाजा पट्टी की आड़ में UN को किनारे करने की तैयारी में हैं Trump, क्यों 'पीस बोर्ड' पर मचा बवाल?

पिछले साल के आखिरी महीनों में डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा में चल रही हमास और इजरायल की जंग को खत्म करने के लिए प्लान दिया. बीस-सूत्रीय योजना में बोर्ड ऑफ पीस बनाने का भी प्रस्ताव था. ये बोर्ड गाजा पट्टी को दोबारा बसाने और वहां सरकार बनाने पर काम करेगा. इसकी स्थायी सदस्यता के लिए मोटी रकम चुकानी होगी, वो भी नकद में.

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ट्रंप प्रस्तावित गाजा पीस बोर्ड में स्थायी सदस्यों के अलावा तीन साल के लिए अस्थायी मेंबर भी होंगे. (Photo- AP)
ट्रंप प्रस्तावित गाजा पीस बोर्ड में स्थायी सदस्यों के अलावा तीन साल के लिए अस्थायी मेंबर भी होंगे. (Photo- AP)

आतंकी संगठन हमास ने दो साल पहले इजरायली सीमा पर अटैक करते हुए हजारों जानें ले लीं और सैकड़ों लोगों को बंधक बना लिया. इजरायल ने भी पलटवार किया. इस दौरान गाजा पट्टी लड़ाई का मैदान बनी रही. युद्ध में अस्सी फीसदी इलाका तबाह हो गया. पिछले साल डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता में जंग रुकी और अब ट्रंप के कहने पर एक बोर्ड ऑफ पीस बन रहा है. गाजा की दोबारा बसाहट पर काम करने वाले इस बोर्ड में भारत को भी सदस्यता का न्योता मिला है, लेकिन दिलचस्प ये है कि इसकी परमानेंट मेंबरशिप के लिए एक बिलियन डॉलर यानी लगभग आठ हजार करोड़ रुपए देने होंगे.

यहां कई सवाल आते हैं

- बोर्ड ऑफ पीस क्या है और कैसे काम करेगा. 

- क्या बोर्ड सरकार बनने के बाद भी गाजा पर नजर रखेगा. 

- क्या इसके सदस्य देश अपनी सेनाएं गाजा पट्टी में रखेंगे.

- इसकी परमानेंट मेंबरशिप के क्या मायने हैं और क्यों इसके लिए अच्छी-खासी रकम देनी होगी.

अक्तूबर 2023 में हमास और इजरायल के बीच शुरू हुई जंग पूरे दो साल तक चलती रही. इस दौरान गाजा पट्टी में अस्पताल, स्कूल से लेकर रिहायशी इमारतें भी खत्म हो गईं.  दावा है कि गाजा में अस्सी फीसदी इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हो चुका. यूनाइटेड नेशन्स का कहना है कि गाजा में इतना मलबा जमा हो चुका, जो साफ होने में ही सात साल ले लेगा. गाजा का हर नागरिक लगभग 30 टन मलबे से घिरा हुआ है. सैटेलाइट इमेज में भी गाजा की तबाही साफ दिखती है, जिसके मुताबिक 81% गाजा पट्टी खत्म हो चुकी. 

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gaza strip (Photo- AP)

समस्या यहीं खत्म नहीं होती. गाजा में हमास अब भी एक्टिव है. साथ ही नई दिक्कत सिर उठा चुकी. माना जा रहा है कि हमास को नई सरकार में जगह नहीं मिलेगी. तो उस खाली जगह को भरने के लिए बाकी मिलिटेंट समूह सक्रिय हो चुके हैं. सबको सत्ता चाहिए लेकिन तजुर्बा किसी के पास नहीं. ऐसे में गाजा में चुनाव और स्थिर सरकार लाना अपने में बड़ी चुनौती होगी. 

मलबे को हटाकर नए सिरे से इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना होगा. इसमें भी कई साल लग जाएंगे. साथ ही ये बात भी है कि गाजा के पास तो पैसों का कोई स्त्रोत नहीं. तब उसकी बसाहट के लिए आर्थिक मदद कहां से मिलेगी? ट्रंप ने 20 सूत्रीय प्लान देते हुए अमीर पड़ोसियों का जिक्र किया था, लेकिन अब तक गाजा पट्टी के किसी अमीर पड़ोसी ने खुलकर नहीं कहा कि वो गाजा में बसाहट पर पूंजी लगाएगा. 

यहीं पर आता है बोर्ड ऑफ पीस. ट्रंप के प्रस्ताव में साफ है कि यह बोर्ड वहां शांति और स्थिरता आने पर काम करेगा. साथ ही ये इशारा भी है, कि बोर्ड का काम यहीं खत्म नहीं होगा, बल्कि वो आगे भी दुनिया में शांति पर काम करता रहेगा. यह एक इंटरनेशनल बॉडी होगी, जो यूनाइटेड नेशन्स की तर्ज पर काम करेगी. बोर्ड का चार्टर भी यही कहता है. चार्टर का मसौदा सुझाव देता है कि बोर्ड की भूमिका गाजा के बाहर भी रह सकती है. 

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gaza rescue camps (Photo- AP)

बोर्ड ऑफ पीस कैसे काम करेगा, फिलहाल ये साफ नहीं. लेकिन दो अलग-अलग बोर्ड्स की अब तक घोषणा हो चुकी. एक फाउंडिंग एग्जीक्यूटिव बोर्ड होगा. इसमें फिलहाल सात सदस्य हैं और हर सदस्य की अलग योग्यता है, जैसे कोई डिप्लोमेसी में दखल रखता है, तो कोई इंफ्रास्ट्रक्चर में. दूसरा गाजा एग्जीक्यूटिव बोर्ड है. ये सीधे गाजा में जमीनी स्तर पर काम करेगा. 

बोर्ड ऑफ पीस में अलग-अलग देशों के लीडर होंगे. इसके लिए ही कई देशों के नेताओं को न्योता भेजा जा रहा है. ट्रंप ने खुद इसके बारे में कहा कि ये अब तक का सबसे मजबूत बोर्ड होगा, जो शांति और उन्नति पर काम करेगा. यानी इसकी लाइन संयुक्त राष्ट्र से मिलती-जुलती है. फिलहाल ट्रंप यूएन की अलग-अलग शाखाओं से जिस तरह से हाथ खींच रहे हैं, उसमें ये कयास भी लग रहे हैं कि अमेरिका गाजा के बहाने संयुक्त राष्ट्र का विकल्प तैयार कर रहा है. 

मुश्किल ये है कि यह यूएस सेंट्रिक होगा. वैसे बोर्ड का ढांचा यूएन से काफी अलग है. इसमें सदस्यता के लिए आर्थिक शर्तें है और भारी रकम देने वाले देशों को ज्यादा ताकत और स्थायी अधिकार मिलने की बात कही गई है. संयुक्त राष्ट्र में सभी देशों को बराबरी से बोलने और वोट देने का अधिकार मिला हुआ है, सिवाय यूएनएससी के स्थाय़ी सदस्यों को छोड़कर. 

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चार्टर के मसौदे में फैसले लेने की प्रक्रिया भी अलग दिखती है. UN में जहां आम सहमति और सार्वभौमिक भागीदारी पर जोर होता है, वहीं इस बोर्ड में ज्यादा पैसा देने वाले देशों को ज्यादा प्रभाव मिलने का संकेत है. यही वजह है कि इसे UN सुरक्षा परिषद या महासभा जैसा लोकतांत्रिक ढांचा नहीं माना जा रहा.

gaza Hamas militants search for the remains of Israeli hostage (Photo- AP)

हालांकि अभी तक आधिकारिक तौर पर यह साफ नहीं है कि ट्रंप का यह बोर्ड UN की जगह लेने के लिए बनाया गया है. लेकिन कई देशों और विश्लेषकों का कहना है कि यह पहल UN की नाकामी को आधार बनाकर अमेरिका के नेतृत्व में एक वैकल्पिक व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश जैसी जरूर लगती है.

गाजा के नाम पर बनाए जा रहे बोर्ड के लिए भारत समेत कई देशों को आमंत्रण भेजा जा चुका कि वे उसकी सदस्यता लें. अगर कोई देश अपने पहले साल में 1 बिलियन डॉलर का योगदान देता है, तो वह चार्टर के लागू होने के बाद स्थायी सदस्य के रूप में अपनी सीट बनाए रख सकता है. इन पैसों का क्या होगा, ये भी स्पष्ट नहीं, लेकिन माना जा रहा है कि यह बोर्ड के ऑपरेशन में खर्च होंगे. साथ ही यह भी संकेत नहीं मिलता कि स्थायी मेंबर किस तरह से गाजा पर नजर रखेंगे, क्या इसके लिए उनकी सेनाएं वहां तैनात हो सकती हैं, या फिर यूएस के जरिए वे वहां मौजूदगी रखेंगे!

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बोर्ड के बाकी सदस्य अस्थायी होंगे और हर तीन साल में बदलते रहेंगे. अगर ट्रंप चाहें तो उनकी सदस्यता आगे भी बढ़ सकती है. अस्थायी सदस्य भी गाजा में अहम फैसलों पर अपना मत दे सकेंगे, जैसे मानवीय मदद पहुंचाना और आर्थिक मजबूती देना. हालांकि फीस चुकाने वाले देश गाजा के बाद भी बने रहेंगे और युद्ध या आपदा-प्रभावित हिस्सों पर काम करेंगे. 

गाजा पर काम हो रहा है तो क्या गाजा या फिलिस्तीन से कोई कमेटी नहीं होगी?

इस काफी विवादित सवाल का भी जवाब आ चुका. वाइट हाउस ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि लोकल स्तर पर नेशनल कमेटी फॉर  एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ गाजा की तैयारी हो चुकी. इसमें फिलिस्तीनी अथॉरिटी से लोग शामिल होंगे, जिनके पास वेस्ट बैंक को चलाने का अनुभव है. कल्चरली और सोशली ये बॉडी गाजा के ज्यादा करीब है, और पश्चिमी देशों की बजाए ज्यादा बेहतर तरीके से उसके लिए काम कर सकती है. 

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