शीत युद्ध के दौर को बताते हुए एक उपन्यास आया था- द माउस दैड रोर्ड. इसमें एक छोटे-से यूरोपीय देश ने अमेरिका पर हमला कर दिया था. वो जानता था कि हार पक्की है, लेकिन उसे यह भी पता था कि इसके बाद यूएस उसके यहां मानवीय और आर्थिक मदद की बौछार कर देगा. कुछ यही स्थिति अभी यूरोप की दिख रही है. उसने ग्रीनलैंड लेने की अमेरिकी जिद के खिलाफ वहां अपने तीन दर्जन सैनिक भेज दिए.
वेनेजुएला में सत्ता हिलाने के बाद ट्रंप प्रशासन का टारगेट ग्रीनलैंड है. यह देश उसे हर हाल में चाहिए. डेनमार्क के अधीन अर्ध स्वायत्त तौर पर काम करते देश को अमेरिका अपनी नेशनल सिक्योरिटी से जोड़ रहा है.
दरअसल यह आर्कटिक देश यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच बसा हुआ है. इसी वजह से इसकी रणनीतिक अहमियत बढ़ जाती है. डेनमार्क इसपर राजनीतिक कंट्रोल रखता है, लेकिन अमेरिका और कनाडा हमेशा इसमें रुचि रखते रहे. अब ट्रंप ने सीधे ग्रीनलैंड को खरीदने और अपना स्टेट बनाने की बात कह डाली.
ग्रीनलैंड वैसे तो बेहद छोटी आबादी वाला देश है, जिसके पास आर्थिक संसाधन भी अपने नहीं. डेनमार्क ही उसे मदद देता है. ऐसे में चतुराई तो ये भी थी कि दोनों देश यूएस का प्रस्ताव मान लें, लेकिन ये हुआ नहीं. न तो ग्रीनलैंडर्स को खुद पर अमेरिकी ठप्पा चाहिए, न ही डेनमार्क अपनी ताकत कम करना चाहता था. दोनों ने कई महीनों में कई बार खुले तौर पर मना किया कि उन्हें अमेरिका से लेना-देना नहीं. अब ट्रंप नाराज हैं. वे कह रहे हैं कि अगर सीधे न मानें तो अमेरिकी मिलिट्री हमला करते हुए उसपर कब्जा कर लेगी.

यहीं तस्वीर में आता है यूरोप. यूरोपीय संघ मानता है कि ट्रंप को जबर्दस्ती नहीं करनी चाहिए. ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन है और डेनमार्क यूरोप का अहम देश है. अगर कोई ताकतवर देश दबाव बनाकर किसी और की जमीन लेना चाहे, तो इससे अंतरराष्ट्रीय नियम कमजोर पड़ जाएंगे. यूरोप को डर है कि अगर ऐसा उदाहरण बना, तो आगे चलकर कोई भी बड़ा देश दूसरों की जमीन पर नजर डाल सकता है.
दूसरी बड़ी वजह आर्कटिक इलाका है. ग्रीनलैंड इस ठंडे इलाके में बहुत अहम जगह पर है. यहां से समुद्री रास्तों, तेल, गैस और दूसरी खनिज संपदा पर नजर रखी जा सकती है. यूरोप नहीं चाहता कि आर्कटिक में सिर्फ अमेरिका की पकड़ मजबूत हो. इससे रूस और चीन के साथ टेंशन बढ़ सकती है, जिसका असर अमेरिका पर बाद में होगा, लेकिन यूरोप पर पहले दिखेगा.
तीसरी बात नाटो से जुड़ी है. अमेरिका और डेनमार्क दोनों नाटो के सदस्य हैं. अमेरिका ही अपने साथी देश की जमीन पर दावा करे, तो नाटो के अंदर भरोसा टूटेगा.
ट्रंप से तमाम असहमति के बाद भी यूरोप एक कदम आगे आकर, चार कदम पीछे हो जाता है. असल में अभी रूस और यूक्रेन मामला फंसा हुआ है. यूक्रेन एक तरह से यूरोप नाम के घर की बाहरी दीवार है. इसे तोड़कर मॉस्को भीतर आया तो कमरों तक पहुंचते देर नहीं लगेगी. यही वजह है कि यूरोप अमेरिका को नाराज नहीं करना चाहता. लेकिन साथ ही वो डेनमार्क और ग्रीनलैंड का साथ भी देना चाहता है. ऐसे में प्रतीकात्मक तौर पर उसने तीन दर्जन सैनिक भेजे. ये किसी हाल में यूएस की छोटी टुकड़ी के भी आगे टिक नहीं सकते, लेकिन कम से कम नाराजगी जताई तो जा सकती है.

इरादा जो भी रहा हो, वह कामयाब नहीं हुआ. ट्रंप को अपने ही पुराने मित्रों को परेशान करने में आनंद आता दिख रहा है. फरवरी से उन्होंने सैनिक भेजने वाले तमाम देशों पर टैक्स बढ़ाने की बात कर दी. साथ ही जून से टैक्स बढ़कर 25 फीसदी हो जाएगा और तब तक रहेगा, जब तक उनकी सरकार ग्रीनलैंड खरीदने को लेकर कोई सौदा नहीं कर लेती.
पिछले साल के यूरोप-अमेरिका ट्रेड डील में भी यूरोप को अपने सामान पर 15 फीसदी टैक्स देना पड़ा था. इससे एक चीज साफ हो चुकी कि ईयू ने बीते दशकों में खुद को अमेरिका के कंधे पर पूरी तरह से टिका रखा था. अब जब ट्रंप प्रशासन कंधे खींच रहा है तो उसके पास ढहने के अलावा कम ही विकल्प हैं.
तो क्या इतना बड़ा यूरोप पूरी तरह असहाय हो चुका
यूरोप, खासकर ईयू के पास कई रास्ते हैं, लेकिन इसमें सैन्य बल आजमाना शामिल नहीं. मसलन, यूरोपीय संघ और नाटो के सदस्य देश एकजुट होकर ट्रंप के दबाव का विरोध कर रहे हैं. उन्होंने कहा है कि टैरिफ और धमकियां दोस्तों के बीच ठीक नहीं और डेनमार्क-ग्रीनलैंड के फैसले का सम्मान होना चाहिए.
वो ट्रंप को ग्रीनलैंड के मुद्दे पर रोकने के लिए आर्थिक दबाव भी डाल सकता है. अगर अमेरिका टैरिफ और धमकियों की भाषा बोले, तो यूरोप भी उसी तरह जवाब दे. जैसे वो भी टैक्स बढ़ा दे या अमेरिकी कंपनियों को अपने यहां से हटाने लगे. जैसे तो तैसा का अंदाज ईयू को शुरुआत में भले अजीब लगे, लेकिन अमेरिका पर इसका असर हो सकता है. खासकर तब, जबकि ग्लोबल पावर के तौर पर उसकी पहचान कमजोर पड़ती दिख रही है, वो अपने पक्के साथी को खोना नहीं चाहेगा.
अमेरिका अकेले दुनिया नहीं चला सकता. यूक्रेन युद्ध, चीन से मुकाबला और मिडिल-ईस्ट की परेशानियों में उसे यूरोप का साथ चाहिए. अगर यूरोप खुलकर विरोध में आ गया, तो अमेरिका कई मोर्चों पर अकेला पड़ सकता है. इसलिए दबाव और बयानबाजी के बाद भी अमेरिका समझौते की राह चुन सकता है अगर यूरोप अपनी बात से न डिगे.