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जमीन से जुड़ी फिल्‍म है 'अल्लाह के बंदे'

एक सवाल उठता है इस फिल्म को देखते हुएः इसमें ऐसा नया क्या है, जो धारावी (सुधीर मिश्र), स्लमडॉग मिलियनेयर (डैनी बॉएल) और सिटी आव गोल्ड (महेश मांजरेकर) में नहीं है? इस लिहाज से फारूक कबीर की इस फिल्म को गौर से देखना होगा.

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फिल्म: अल्लाह के बंदे
निर्देशकः फारूक कबीर
कलाकारः शरमन जोशी, फारुक कबीर, नसीरुद्दीन शाह, अंजना सुखानी

एक सवाल उठता है इस फिल्म को देखते हुएः इसमें ऐसा नया क्या है, जो धारावी (सुधीर मिश्र), स्लमडॉग मिलियनेयर (डैनी बॉएल) और सिटी आव गोल्ड (महेश मांजरेकर) में नहीं है? इस लिहाज से फारूक कबीर की इस फिल्म को गौर से देखना होगा. निर्देशन और अभिनय दोनों में यह उनका पहला कदम है, जो फिल्म में भी दिखता है.

''हिंदुस्तान की सबसे गंदी और सबसे अमीर जगह'' मुंबई की धारावी के धुंधले जीवन को उन्होंने एक ताजा नजरिए से देखा है. शुरू में ही चिपका मारिया मांटेसरी का एक बोध वाक्य इसमें बच्चों की तालीम की बात होने की तरफ इशारा कर देता है. भूलभुलैया नाम की बस्ती पर ''टोटल कंट्रोल'' की कोशिश में हैं याकूब (फारूक) और विजय (शरमन). इस शेड की दूसरी फिल्मों की तरह इसमें भी सुलेमान, नानासाहेब और बॉस जैसे किरदारों से उनका मुकाबला है. नजर है चरस, कोकीन, हथियारों के बेहिसाब बाजार पर.{mospagebreak}

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परदे पर धारावी के बीसियों जगहों के प्रामाणिक दृश्य और साउंडट्रैक में धांय-धांय का 'संगीत' है. नया पहलू जुड़ता है एक चित्रकार छात्र विट्ठल के बंदूक उठा लेने और उसे बचाने को अध्यापक अश्विनी (अतुल कुलकर्णी) के कूद पड़ने से. इस फिल्म में जज्‍बा ज्‍यादा है, जान कम. बहुत कुछ पुराना और प्रत्याशित है. एक अराजक-सी जिंदगी जीते बड़े हुए याकूब के रोल में खुद फारूक में उत्तेजना ज्‍यादा है. कई दूसरे भी अपने किरदारों के कॉन्फ्लिक्ट को अभिनय में नहीं दिखा पाते.

इस श्रेणी की ताजा फिल्मों में इस लिहाज से सिटी ऑव गोल्ड ही एक मानक बैठती है. अंकुश, प्रतिघात, तेजाब सरीखी सामाजिक-राजनैतिक आक्रोश की कामयाब फिल्में बनाने वाले एन. चंद्रा ने हाल ही एक जगह कहा था कि नए फिल्मकारों में जज्‍बा बहुत है पर फिल्म को कह पाने के शिल्प में अभी वे कच्चे हैं. सीखने के नजरिए से फारूक के लिए काम की हो सकती है यह लाइन.

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