scorecardresearch
 

मणिपुर के कर्फ्यू में शूट, पड़ोस के बच्चे बने एक्टर... लक्ष्मीप्रिया देवी ने ऐसे बनाई इतिहास रचने वाली फिल्म 'बूंग'!

मणिपुरी फिल्म 'बूंग' ने BAFTA जीतकर इतिहास रच दिया. लक्ष्मीप्रिया देवी की ये सेंसिटिव कहानी मणिपुर की जिजीविषा को दुनिया तक पहुंचा चुकी है. मगर ये फिल्म कैसे बनी, ये अपने आप में एक दिलचस्प कहानी है. इस फिल्म का शूट मणिपुर वायलेंस के साए में पूरा हुआ था.

Advertisement
X
इतिहास रचने वाली फिल्म 'बूंग' के बनने की कहानी बहुत दिलचस्प है (Photo: Instagram/@lp_devi)
इतिहास रचने वाली फिल्म 'बूंग' के बनने की कहानी बहुत दिलचस्प है (Photo: Instagram/@lp_devi)

मणिपुरी फिल्म 'बूंग' की टीम ने हाल ही में जब BAFTA (ब्रिटिश एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलिविजन) अवॉर्ड की ट्रॉफी उठाई, तो एक इतिहास भी लिखा गया. दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित सिनेमा अवॉर्ड्स में से एक BAFTA के 77 सालों के इतिहास में पहली बार इंडियन प्रोडक्शन में बनी एक फिल्म ने ये अवॉर्ड जीता है. 'बूंग' को यहां बेस्ट चिल्ड्रेन्स एंड फैमिली फिल्म का अवॉर्ड मिला. ये फिल्म लक्ष्मीप्रिया देवी ने डायरेक्ट की है, जिनकी ये पहली फीचर फिल्म है.

इससे पहले उन्होंने आमिर खान की 'पीके' और फरहान अख्तर की 'लक्ष्य' जैसी फिल्मों पर बतौर एडी काम जरूर किया है. मगर कई इंटरव्यूज में लक्ष्मीप्रिया ने बताया है कि वो कभी डायरेक्शन में कदम नहीं रखना चाहती थीं. लेकिन 'बूंग' के पर्दे तक उतरने का सफर बताता है कि लक्ष्मीप्रिया के अंदर एक सेंसिटिव फिल्म हमेशा से सांस ले रही थी, बस उसे पर्दे तक आने के लिए एक पुश की जरूरत थी.

मणिपुर के रंग में कैसे रंगी 'बूंग'
'बूंग' एक बच्चे का नाम है, जिसका पिता कस्बे से बाहर नौकरी करता था और एक दिन अचानक गायब हो गया. तबसे वो और उसकी मां उसकी कमी के साथ जिंदगी जी रहे हैं.

'बूंग' की कहानी लक्ष्मीप्रिया देवी की पर्सनल लाइफ से इंस्पायर है (Photo: Instagram/@lp_devi)

लक्ष्मीप्रिया देवी ने दिल्ली में पढ़ाई-लिखाई की और करियर मुंबई में बनाया. लेकिन जब अपने पिता के निधन के बाद उन्होंने मणिपुर में लंबा समय बिताया, तो बहुत सारी चीजें फिर से उनके जेहन में ताजा हो गईं. सिनेमा एक्सप्रेस के साथ एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि जैसे फिल्म में बूंग के पिता गायब हुए, ऐसे ही उनके घर में भी किसी पूर्वज के रहस्यमयी तरीके से गायब होने की कहानी चलती है. फिल्म में लोकल और बाहरी किरदारों की दोस्ती का आइडिया उनकी अपनी लाइफ से ही आता है. उन्होंने फिल्म में जातीय संघर्ष और पॉलिटिक्स को भी बड़ी सेंसिटिविटी के साथ दिखाया है.

Advertisement

'जो भी मेजॉरिटी में होता है वो माइनॉरिटी का मजाक बनाता है' ये लक्ष्मीप्रिया का अनुभव रहा है. उन्होंने दिल्ली में नॉर्थईस्ट के लोगों का मजाक बनते देखा और मणिपुर में अपनी बंगाली दोस्त का. जब वो 'बूंग' लिख रही थीं, तो उन्होंने ये सब अनुभव कहानी में उड़ेल दिए. 'बूंग वो किताब है जो मैं अपनी बुरी अंग्रेजी की वजह से नहीं लिख पाई' लक्ष्मीप्रिया ने अपने एक स्टेटमेंट में कहा था. और उन्होंने अपनी फिल्म मणिपुरी लोगों की जिजीविषा को डेडिकेट की है.

क्यों चुना गया बच्चे का किरदार?
लक्ष्मीप्रिया की कहानी के शेड्स बहुत गहरे और मैच्योर एंगल वाले हैं, तो फिर लीड किरदार में एक बच्चा क्यों? 'जब मैं मास कम्युनिकेशन पढ़ रही थी, तो हमारे एक टीचर ने एड्स जैसे सब्जेक्ट को कठपुतली के खेल को टूल बनाकर डील करना सिखाया था. यहीं से हमने सीखा कि एक एडल्ट के मुकाबले एक कठपुतली से सीखना ज्यादा आसान है' उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया है.

ऊपर से उन्हें हमेशा से बच्चों की कहानियां कहना ज्यादा अच्छा लगता है. बड़ों को लगता है कि बच्चों को कुछ याद नहीं रहता. लेकिन इसका प्रभाव उन पर बहुत गहरा पड़ता है, ये मानने की वजह से ही लक्ष्मीप्रिया ने बच्चे को कहानी का लीड किरदार बनाया. बच्चों का ये संसार उतारने के लिए उनका कास्टिंग प्रोसेस भी बहुत अनोखा रहा.

Advertisement

पड़ोसियों और रिश्तेदारों के बच्चों को किया कास्ट
'बूंग' में केवल 5 किरदार हैं, जो प्रोफेशनल एक्टर्स ने निभाए हैं. बाकी सब नए लोग हैं. लक्ष्मीप्रिया आते-जाते गलियों में खेल रहे बच्चों से एक्टिंग करने को पूछ लेती थीं. रिश्तेदारों के जरिए उन्होंने बच्चों को खोजा और उनके ऑडिशन लिए. लीड रोल के लिए वो एक ऐसा बच्चा खोज रही थीं, जिसके चेहरे से ही शैतानी टपकती हो.

लक्ष्मीप्रिया ने पड़ोसी और रिश्तेदारों की मदद से जुटाए फिल्म के लिए बच्चे (Photo: Instagram/@lp_devi)

ऑडिशन में उन्हें गुगुन किपगेन मिले, जिन्हें देखते ही उन्होंने लीड रोल के लिए फाइनल कर लिया. गुगुन बहुत कॉन्फिडेंट थे और लक्ष्मीप्रिया को ये बात पसंद थी कि वो उनसे कन्वर्सेशन कर सकती थीं. मगर 'बूंग' का शूट अपनी तरह की मुश्किलें लेकर आया था.

मणिपुर में हिंसा के साए में शूट हुई 'बूंग'
'बूंग' 2023 में शूट हुई थी और इसका शूट मणिपुर में कन्फ्लिक्ट शुरू होने से ठीक एक हफ्ता पहले पूरा हुआ. उनकी फिल्म में एक दिलचस्प विडंबना थी. उनका लीड किरदार बूंग कुकी कम्युनिटी से आता है और इसे प्ले कर रहे गुगुन मैतेई समुदाय से हैं. मणिपुर की हिंसा में इन दोनों समुदायों के आपसी विवाद का बहुत बड़ा रोल है. लक्ष्मीप्रिया ने एक इंटरव्यू में कहा कि ये सब देखते हुए उन्हें ऐसा लग रहा था, जैसे वो बंटवारे के किस्सों में सुनती आई थीं.

Advertisement

कभी-कभी उन्होंने कर्फ्यू के बीच भी शूट किया. फिल्म में जब उन्होंने दोनों बच्चों के पोस्ट ऑफिस तक जाने का सीन शूट किया, तो सड़क खाली थी. कर्फ्यू के बीच हो रही एक शादी में जाकर लक्ष्मीप्रिया ने लोगों से पूछा कि क्या वो सीन में बैकग्राउंड एक्टर्स का काम करेंगे. लेकिन लोगों ने मना कर दिया. बंद पड़े फिल्म थिएटर्स में सीन शूट किए गए. बॉर्डर के जिस कस्बे मोरे में 'बूंग' की टीम ठहरी थी, वो मणिपुर हिंसा का केंद्र रहा और घोस्ट-टाउन बन गया. 'बूंग' उस कस्बे का आखिरी डॉक्युमेंटेशन है, जिसमें वो वैसा दिख रहा है जैसा हिंसा से पहले होता था.

लक्ष्मीप्रिया को ऐसे मिला बड़े प्रोडक्शन का साथ
फिल्म इंडस्ट्री में काम कर रहीं लक्ष्मीप्रिया ने कहानी लिखी और इसके प्रोडक्शन बजट का आइडिया लेने के लिए अपने दोस्त विकेश भूटानी को भेज दी. एक्सेल के लिए काम कर चुके विकेश अपनी कंपनी चॉकबोर्ड शुरू कर चुके हैं. विकेश ने खुद इस कहानी का साथ दिया और प्रोड्यूसर्स में से एक हैं. उनके साथ ही लक्ष्मीप्रिया फरहान अख्तर की कंपनी तक ये सोचकर पहुंचीं कि वो पता नहीं मणिपुरी फिल्म प्रोड्यूस करने के लिए मानेंगे या नहीं. लेकिन एक्सेल एंटरटेनमेंट ने हां कर दी.

रिलीज के लिए स्क्रीन्स की लड़ाई
2024 में टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में 'बूंग' का पहला प्रीमियर हुआ था. तभी से इसे लगातार तारीफें मिल रही थीं. मगर थिएटर्स तक आने में इसे और एक साल लगा. इंडियन थिएटर्स में सितंबर 2025 में रिलीज हुई थी. वो भी तब, जब फरहान अख्तर की एक्सेल एंटरटेनमेंट जैसी कंपनी इसके साथ थी.

Advertisement

इंटरनेशनल सिनेमा के एक बड़े मंच पर भारत का नाम ऊंचा करने वाली 'बूंग' आज ओटीटी पर भी अवेलेबल नहीं है. ये केवल दुखद ही नहीं है, इससे ये भी पता चलता है कि इंडिया में हम दमदार फिल्मों को सम्मान देने, संभालने और सहेजने में कितने ढीले हैं. शुक्र है कि हमारे पास लक्ष्मीप्रिया देवी जैसे फिल्ममेकर्स हैं, जो ऐसी कहानियों को बड़े पर्दे तक पहुंचा रहे हैं.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement