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Qala Review: संगीत और सस्पेंस से भरी है कला, बाबिल खान-तृप्ति डिमरी ने किया कमाल

कला को डायरेक्टर अन्विता दत्त ने बनाया है. अन्विता ने एक चित्रकार और संगीतकार के रूप में ये फिल्म बनाई है. फिल्म आजादी के बाद के भारत की है. इसमें उस जमाने की संगीत की दुनिया दिखाई गई है, जब इंडस्ट्री कलकत्ता में हुआ करती थी. तृप्ति डिमरी, बाबिल खान की इस फिल्म का रिव्यू पढ़िए.

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बाबिल खान, तृप्ति डिमरी
बाबिल खान, तृप्ति डिमरी
फिल्म: कला
3/5
  • कलाकार : तृप्ति डिमरी, बाबिल खान, स्वस्तिका मुखर्जी, समीर कोचर, वरुण ग्रोवर
  • निर्देशक : अन्विता दत्त 

जो लोग सिनेमाघर में फिल्में नहीं देख पा रहे हैं उनके लिए अब ओटीटी चैनल्स एक नया विकल्प बन गया है. मेकर्स ने भी अपनी फिल्मों को सिनेमा से अलग हट के ओटीटी पर रिलीज करना शुरू कर दिया है. ऐसी ही एक फिल्म आज नेटफ्लिक्स पर आई है, जिसका नाम है कला (Qala).

कला को डायरेक्टर अन्विता दत्त ने बनाया है. अन्विता ने एक चित्रकार और संगीतकार के रूप में ये फिल्म बनाई है. कला के मुख्य किरदार लता मंगेशकर, के एल सहगल, नूरजहां जैसी सितारों से प्रभावित है. कश्मीर की वादियां और मुंबई में सेट्स के साथ 40 के दशक के ग्रामोफोन म्यूजिक और फिल्म इंडस्ट्री की पॉलिटिक्स को इसमें दिखाया गया है. इंसान सबसे भाग सकता है लेकिन अपने आप से नहीं और कैसे अपना पाप खुद को ही सजा देता है ये इस फिल्म का सार है. यही बात ये फिल्म... संगीत... पात्र और चलचित्रों के माध्यम से कहती है.

जानते है इस हफ्ते नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई फिल्म कला में दिखाई गईं कुछ खास बातें - 

अभिनय और कलाकार 

तृप्ति डिमरी ने बुलबुल के बाद एक और शानदार परफॉरमेंस दी है. फ़िल्म की कहानी शुरू से अंत से तृप्ति के किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है. दिवंगत अभिनेता इरफान खान के बेटे बाबिल खान ने इस फिल्म से अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा है. फिल्म में बाबिल का रोल काफी छोटा लेकिन अहम है. अपने अभिनय ने उन्होंने छाप छोड़ी है. फिल्म में एक और अहम रोल बंगाली फिल्मों की अभिनेत्री स्वातिका मुखर्जी का है. मशहूर लेखक और कॉमेडियन वरुण ग्रोवर भी मजबूत किरदार निभाया है.

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कहानी 

फिल्म आजादी के बाद के भारत की है. इसमें उस जमाने की संगीत की दुनिया दिखाई गई है, जब इंडस्ट्री कलकत्ता में हुआ करती थी. किस्सा है 40 के दशक की फिल्मों की सफल गायिका कला का है, जो अपने अतीत से जूझ रही है. कला की कामयाबी के पीछे है उसका एक काला सच है, जो उसकी गाने की कला पर काले साये की तरह मंडराता है. साथ ही कहानी हिमाचल में कला के बचपन की भी चलती है, जहां उसकी मां उर्मिला उसकी संगीत गुरु है. लेकिन उर्मिला, कला को गायिका के रूप में नहीं देखती. बचपन से ही कला अपनी मां की संगीत कला को पाने की कोशिश करती है, लेकिन मां को उसकी कला पर विश्वास नहीं. 

ऐसे में उनके घर में आता है जगन, जो अनाथ है लेकिन गाने की कला में पारंगत है. उर्मिला, जगन को गायक बनाने में जुट जाती है और कला फिर से कुंठीत हो जाती है. उर्मिला, जगन को कलकत्ता के मशहूर संगीतकार से मिलाने ले जाती है. लेकिन वहां जगन की तबीयत अचानक खराब हो जाती है और फिर धीरे-धीरे कहानी भयंकर ट्विस्ट लेती है. ये क्या ट्विस्ट है, कला की कहानी कहां खत्म होती है? जगन के साथ क्या हुआ? ये सब फिल्म में देखने वाली बातें हैं. 

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फिल्म की मुख्य बातें 

फिल्म में कश्मीर की वादियों को दिखाया गया है. बर्फ फिल्म को अलग रंग देती है. फिल्म का चित्रांकन बहुत खूबसूरत है. संगीत, फिल्म कला की कहानी का किरदार है और हर तरह के गाने इसको आगे बढ़ाते हैं. सभी कलाकारों का लुक और अंदाज बेहद सहज और 40 के दशक के अनुकूल है.

फिल्म में कलकत्ता का हावड़ा ब्रिज बनते हुए बैकग्राउंड में दिखना और म्यूजिक की रिकॉर्डिंग के सुनहरे पल सभी देखना काफी बढ़िया लगता है. फिल्म की नायिका कला को सब दीदी कहते है जो लगता है लता मंगेशकर से प्रेरित है. बाबिल का किरदार के एल सहगल से प्रेरित लगता है. इसकी गति धीमी है, जिसकी वजह से आप कभी-कभी बोझिल हो जाते हैं. लेकिन ये अपनी कहानी और पात्रों के अभिनय से आपको बांधे रखती है. तृप्ति और बाबिल का प्रेम फिल्म की मुख्य कहानी में कहीं दब गया, लेकिन दोनों कलाकारों का अपनी आंखों से अभिनय आपके दिल में जगह करता है.

क्यों देखें फिल्म?

कुल मिलाकर कला एक आम बॉलीवुड मसाला फिल्म से हटकर कुछ अलग कहने की कोशिश है. भारतीय सिनेमा में हमेशा कला पर आर्ट फिल्में और मसाला फिल्म एक साथ पसंद की जाती रही है. बस फर्क ये है कि आजकल ओटीटी पर इस तरह की फिल्मों को देखने का एक झरोखा मिल गया है, जो पिछले कुछ समय से फिल्म फेस्टिवल और क्रिटिक्स को मिलता था. जिसे कला और संगीत पर आधारित सीरियस सिनेमा पसंद है उन्हें ये फिल्म जरूर पसंद आएगी.

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