बॉलीवुड के फेमस स्क्रीन राइटर सलीम खान लीलावती अस्पताल में एडमिट हैं. इस बीच उनके परिवार, उनके काम और उनके अचीवमेंट्स की भी चर्चा हो चली है. सलीम के बच्चों के बारे में तो सब जानते हैं, पर उनके पिता कौन थे. और क्या करते थे? इसका जिक्र कम होता है. तो चलिए हम आपको बताते हैं.
ब्रिटिश सरकार से जुड़े थे सलीम के पिता
सलीम खान का जन्म मध्य प्रदेश के इंदौर में साल 1935 में हुआ था. उन्होंने होलकर साइंस कॉलेज से पढ़ाई की. वो महज 9 साल के थे जब उनकी मां सिद्दीका बानो खान का ट्यूबरक्लोसिस से देहांत हो गया था. जब सलीम 14 साल के थे तब उनके सिर से पिता का साया उठ गया था.
सलीम के पिता अब्दुल रशीद खान ने इंडियन इम्पीरियल पुलिस जॉइन की थी. वो तरक्की करते हुए डीआईजी, इंदौर के पद तक पहुंचे थे. ब्रिटिश भारत के दौर में ये किसी भारतीय के लिए पुलिस विभाग में मिलने वाला सबसे ऊंचा पद माना जाता था.
जानकारी के मुताबिक, सलीम खान ने बताया है कि उनके दादा-परदादा अलाकोजई पश्तून थे. जो 1800 के दशक के बीच में अफगानिस्तान से भारत आए थे. कहा जाता है कि वो ब्रिटिश भारतीय सेना की कैवेलरी (घुड़सवार सेना) में सेवा करते थे.
हालांकि लेखक जासिम खान ने अपनी किताब 'बीइंग सलमान' में लिखा है कि उनके पूर्वज यूसुफजई पश्तूनों की अकुजई उप-जनजाति से थे. ये लोग उस समय के ब्रिटिश भारत के नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रांत (आज का खैबर पख्तूनख्वा, पाकिस्तान) के स्वात वैली के मलाकंद इलाके से थे. बताया जाता है कि खान परिवार सरकारी नौकरियों की तलाश में रहता था और बाद में आकर इंदौर में बस गया.
क्रिकेट ने बचाई सलीम की पढ़ाई
रिपोर्ट्स के मुताबिक, सलीम पढ़ाई में खास अच्छे नहीं हुआ करते थे. माता-पिता के जाने के बाद बड़े भाईयों ने उन्हें संभाला. पिता की छोड़ी संपत्ति ने उनकी परवरिश में मदद की. इस वजह से उनके पास तब एक कार भी हुआ करती थी. सलीम खेलकूद में बेहद अच्छे थे, खासकर क्रिकेट में. कॉलेज के स्टार क्रिकेटर होने की वजह से उन्हें ग्रेजुएशन के बाद मास्टर डिग्री में दाखिला लेने की अनुमति भी मिल गई थी. वो एक ट्रेन्ड पायलट भी हैं.
इन्हीं सालों में उनका रुझान फिल्मों की ओर बढ़ा. उनके कॉलेज के साथी अक्सर उनसे कहते थे कि उनकी शानदार पर्सनैलिटी है. अच्छे लुक्स की वजह से उन्हें फिल्मों में किस्मत आजमानी चाहिए. उन्हें फिल्म स्टार बनने की कोशिश करनी चाहिए.
सलीम ने किया भी ऐसा ही, वो इंदौर का घर छोड़कर मुंबई आ गए और अमरनाथ की बारात फिल्म में सपोर्टिंग रोल से अपनी करियर के शुरुआत की. इसके लिए उन्हें 400 रुपये बतौर सैलरी मिली थी. तकरीबन 25 फिल्मों में काम करने के बाद 1969 में उन्होंने दो भाई की कहानी लिखी. इसके बाद तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.