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अंग्रेजों ने उजाड़े कोठे, फिल्मों को मिली पहली महिला संगीतकार, संजय दत्त से कनेक्शन

हिंदुस्तानी संगीत और नृत्य की विरासत को सहेज कर रखने वाले तवायफ कल्चर का ब्रिटिश राज में पूरा नक्शा बिगड़ गया. मगर अपना जलवा खोते कोठों ने भारत में पैर जमा रहे फिल्म बिजनेस को भरपूर टैलेंट दिया. ऐसे ही एक कोठे से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को मिली थी अपनी पहली फीमेल म्यूजिक डायरेक्टर और प्रोड्यूसर- जद्दनबाई.

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जद्दन बाई, नरगिस, संजय दत्त
जद्दन बाई, नरगिस, संजय दत्त

संजय लीला भंसाली की वेब सीरीज 'हीरामंडी' जबसे रिलीज हुई है, तबसे 'तवायफ' शब्द का जिक्र आप कई बार पढ़/सुन चुके होंगे. आजादी की जंग लड़ते हिंदुस्तान में, अपने कोठों के लिए मशहूर लाहौर के हीरामंडी बाजार की ये कहानी, नेटफ्लिक्स पर दर्शकों को खूब इम्प्रेस कर रही है. ये शो आने के बाद फिर से बहसें शुरू हैं कि 'तवायफ' शब्द कितना अच्छा है और कितना बुरा?

इस अच्छे-बुरे की बहस से दूर भी एक चीज है, जो तवायफों का असली इतिहास है. हिंदुस्तानी संगीत और नृत्य की विरासत को सहेज कर रखने वाले तवायफ कल्चर का ब्रिटिश राज में पूरा नक्शा बिगड़ गया. मगर अपना जलवा खोते कोठों ने भारत में पैर जमा रहे फिल्म बिजनेस को भरपूर टैलेंट दिया. ऐसे ही एक कोठे से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को मिली थी अपनी पहली फीमेल म्यूजिक डायरेक्टर और प्रोड्यूसर- जद्दनबाई. 

ब्रिटिश राज, तवायफों की दुर्गति और जद्दनबाई 
1892 में जद्दनबाई का जन्म इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के एक कोठे पर ही पैदा हुई थीं. उन्होंने सबसे पहले अपनी मां, दलीपाबाई से ठुमरी सीखीं. उन्होंने कलकत्ता (अब कोलकाता) में श्रीमंत गणपत राव और जयपुर घराने के उस्ताद मोईनुद्दीन खान से क्लासिकल संगीत सीखा. और अपनी बेहतरीन गायकी की वजह से अपनी मां से भी मशहूर तवायफ बनीं. 

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जद्दन बाई

यहां ये याद रखना बहुत जरूरी है कि 'तवायफ' और 'कोठे' का मतलब यहां सेक्स वर्क से नहीं है. हालांकि, जद्दनबाई का दौर, कोठों पर ढलते सूरज का दौर था. इंडिया टुडे से बातचीत में ऑथर और स्कॉलर वीना तलवार ओल्डेनबर्ग बताती हैं कि अपने दौर की तवायफें ही पढ़ी लिखी महिलाएं थीं. वो युवा नवाबों और एलीट क्लास के लड़कों को तहजीब, शायरी, क्लासिकल संगीत और नृत्य सिखाती थीं. 

लेकिन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को दबाने में कामयाब हो चुके अंग्रेजों जब लखनऊ, आगरा, दिल्ली और लाहौर जैसे शहरों में अपने पांव जमाने में कामयाब हुए तो कोठों और तवायफों के भी बुरे दिन शुरू हो गए. उनके दौलतमंद कद्रदान और नवाब बचे नहीं. अंग्रेजों ने कोठों को टारगेट करना शुरू कर दिया क्योंकि ये क्रांतिकारियों यहां मीटिंग करते, छिपते और यहां से उन्हें मदद भी मिल जाती थी. 

तवायफों को अंग्रेजों ने 'नाचने वाली' यानी 'नॉच गर्ल्स' कहकर रिजेक्ट करना शुरू किया और 1890 के दशक तक ब्रिटिश सरकार ने ऑफिशियली सभी 'नॉच गर्ल्स' को 'प्रॉस्टिट्यूट' घोषित कर दिया. पैसे वालों और रईसों के बिना, कोठे, जो कभी संगीत और नृत्य के जीवंत केंद्र थे, धीरे-धीरे बदनाम होते गए. जो कभी शाही रुतबे वाली तवायफें थीं, उन्हें अब अपनी जिंदगी चलाने के लिए नए रास्ते तलाशने थे. सिलसिलेवार तरीके से खत्म होता तवायफ कल्चर,नई सदी की शुरुआत में आखिरी सांसे लेने लगा था. 1920 से 1940 के दशकों में सेट भंसाली की 'हीरामंडी' भी इसी ढलते दौर की कहानी है.

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कोलंबिया ग्रामोफोन कंपनी के साथ गजलें रिकॉर्ड कर चुकीं जद्दनबाई, तबतक अपने गाने के लिए बहुत पॉपुलर हो चुकी थीं. कभी रामपुर, बीकानेर, ग्वालियर और जोधपुर रियासतों की शाही महफिलों में परफॉर्म कर चुकीं जद्दनबाई ने एक्टिंग शुरू कर दी. 1933 में आई फिल्म 'राजा गोपीचंद' में उन्होंने लीड किरदार की मां का रोल किया. जद्दनबाई ने 'इंसान या शैतान', 'प्रेम परीक्षा' और 'सेवा सदन' फिल्मों में भी काम किया. और फिर उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में वो काम किया, जो उनसे पहले किसी महिला ने नहीं किया था.

हिंदी की पहली फीमेल फिल्म प्रोड्यूसर और सिनेमा की विरासत 
फिल्मों में एक्टिंग कर रहीं जद्दनबाई ने 'संगीत फिल्म्स' नाम से अपना प्रोडक्शन हाउस शुरू कर दिया. वो हिंदी फिल्मों की पहली महिला फिल्म प्रोड्यूसर थीं और उनकी कंपनी ने पहली फिल्म बनाई 'तलाश-ए-हक'. उन्होंने फिल्म में एक्टिंग तो की ही, साथ में इसका म्यूजिक भी कम्पोज किया. और इसके साथ ही वो हिंदी फिल्मों की पहली फीमेल म्यूजिक कंपोजर भी बन गईं. 

हिंदी की लेजेंड एक्ट्रेस नरगिस का नाम तो आपने सुना ही होगा. भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए नॉमिनेट हुई पहली फिल्म 'मदर इंडिया' की एक्ट्रेस नरगिस, इन्हीं जद्दनबाई की बेटी थीं. बतौर प्रोड्यूसर जद्दनबाई ने अपनी पहली ही फिल्म 'तलाश-ए-हक' में अपनी बेटी नरगिस को चाइल्ड एक्टर के रूप में इंट्रोड्यूस किया. 

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नरगिस

जद्दनबाई ने तीन शादियां की थीं. गुजराती बिजनेसमैन नरोत्तमदास खत्री ने उनसे शादी के बाद इस्लाम अपनाया और उन्हें एक बेटा हुआ जिसका नाम अख्तर हुसैन रखा गया. अख्तर आगे चलकर फिल्म प्रोड्यूसर बने. अपने साथ हारमोनियम बजाने वाले उस्ताद इरशाद मीर खान से जद्दनबाई ने दूसरी शादी की, जिससे उनके दूसरे बेटे अनवर हुसैन का जन्म हुआ. अनवर ने कई पुरानी यादगार फिल्मों जैसे दिलीप कुमार की 'गंगा जमना' में नेगेटिव रोल निभाए. उन्हें नेगेटिव किरदारों में बहुत पसंद भी किया गया. अनवर के बेटी जहीदा ने भी एक्टिंग की और देव आनंद-संजीव कुमार की फिल्मों 'अनोखी रात'. 'गैम्बलर' और 'प्रेम पुजारी' में काम किया. 

जद्दनबाई की तीसरी शादी रईस पंजाबी मोहनचंद उत्तमचंद त्यागी से की, जिन्होंने शादी के बाद इस्लाम अपनाया. इसी शादी से नरगिस का जन्म हुआ था. अपने दौर में नरगिस इंडस्ट्री की सबसे पॉपुलर लीडिंग एक्ट्रेसेज में से एक रहीं. 80s में उनके बेटे संजय दत्त ने इंडस्ट्री में कदम रखा और आजतक उनका नाम फैन्स में एक एक्साइटमेंट जगा देता है. 

1936 में जद्दनबाई ने अपने प्रोडक्शन में एक फिल्म लिखी, डायरेक्ट की और उसमें म्यूजिक भी दिया- 'मैडम फैशन'. इस फिल्म में उन्होंने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट सुरैया को इंट्रोड्यूस किया, जिन्हें आज इंडियन फिल्मों की सबसे बेहतरीन और महान एक्ट्रेसेज में गिना जाता है. 

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सुरैया (क्रेडिट: विकीपीडिया)

पिछले सौ साल में भले 'तवायफ' शब्द के मायने पूरी तरह बदल चुके हों, मगर जद्दनबाई जैसी शख्सियतों की कहानियां बताती हैं कि उनकी जिंदगी सिर्फ इस एक शब्द तक सीमित नहीं थी. उनमें हुनर कूट-कूट के भरा हुआ था और अगर उनके जरिए इंडस्ट्री में आए हुए नाम देखें तो ये भी पता चलता है कि उनके पास हुनर को पहचानने-तराशने वाली नजरें भी थीं.

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