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तापसी पन्नू की ‘अस्सी’ ने दूर किया फिल्मों का ये पुराना रोग, पर क्या जनता इस इलाज के लिए रेडी है?

तापसी पन्नू की ‘अस्सी’ सिर्फ रेप केस पर बना सोशल ड्रामा नहीं है. ये विजिलांटे जस्टिस और फिल्मी हीरोइज्म पर गहरी चोट भी है. हैदराबाद रेप केस से लेकर ‘सिम्बा’ तक में दिखे विजिलांटे जस्टिस पर ये फिल्म सवाल उठाती है— क्या गोली ही न्याय है? या समाज को आईना दिखाने की जरूरत है?

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तापसी की 'अस्सी' विजिलांटे जस्टिस पर एक जरूरी बहस छेड़ती है (Photo: ITGD)
तापसी की 'अस्सी' विजिलांटे जस्टिस पर एक जरूरी बहस छेड़ती है (Photo: ITGD)

तापसी पन्नू की फिल्म ‘अस्सी’ में एक विजिलांटे स्टाइल हीरो कैरेक्टर की अचानक एंट्री बहुत सरप्राइज करने वाली थी. अगर आपने फिल्म नहीं देखी है तो संभलकर आगे बढ़ें. आगे कहानी के थोड़े-मोड़े स्पॉइलर हैं. एक भयानक रेप का मामला कोर्ट में आगे नहीं बढ़ पा रहा. सबूत मिल नहीं रहे, सैंपल मैच नहीं हो रहे, गवाह भरोसेमंद नहीं हैं. अचानक से एक किरदार छतरी के भरोसे कैमरों को अवॉइड करता हुआ आता है और एक आरोपी की हत्या कर देता है. रेप पीड़िता के लिए न्याय की बाट देख रहे लोग 'अम्ब्रेला मैन' की जय-जयकार करने लगते हैं.

एक पल के लिए 'अस्सी' का ये सबप्लॉट कहानी से ध्यान काटने लगता है, डिस्टर्ब करता है. लेकिन फिर डायरेक्टर अनुभव सिन्हा अपना कमाल दिखाते हैं और फिल्म इस तरह के 'विजिलांटे जस्टिस' पर बात करना शुरू करती है. जब फिल्म खत्म होती है तब एहसास होता है कि इस एक किरदार के जरिए 'अस्सी' ने पॉपुलर सिनेमा की कितनी बड़ी गलती ठीक करने की कोशिश की है. एक ऐसी गलती जो फिल्म से निकलकर रियल लाइफ घटनाओं तक भी पहुंच चुकी है.

जब सिनेमा की गलती का उदाहरण बनी रियल घटना
बात 2019 की है. हैदराबाद में एक 26 साल की वेटरनरी डॉक्टर लड़की के रेप और हत्या से देशभर में आक्रोश फैला था. जनता पीड़िता के लिए न्याय की मांग कर रही थी. घटना 27 नवंबर को हुई थी और 29 तारीख को चारों आरोपी पुलिस हिरासत में थे. 1 दिसंबर को तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने मामले के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का आदेश दे दिया.

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आज ये तारीखें देखकर लगता है कि एक्शन तो काफी तेज हुआ. मगर उस वक्त जनता को ये तेजी नहीं, अपने आक्रोश का जवाब चाहिए था. वो आक्रोश जो 2012 के निर्भया कांड के बाद से ही हर नए रेप केस के साथ थोड़ा और बढ़ जाता है. अचानक 6 दिसंबर की सुबह खबर आई कि हैदराबाद रेप केस के चारों आरोपियों को पुलिस ने मार गिराया है.

बताया गया कि पुलिस आरोपियों को वारदात की जगह ले जाकर घटना का सीन रीक्रिएट कर रही थी कि चारों ने भागने की कोशिश की. पुलिस को जवाबी कार्रवाई में गोलियां चलानी पड़ीं और चारों मारे गए. ये कहानी थोड़ी फिल्मी थी, लोग अंदाजा लगा पा रहे थे कि क्या हुआ है. बाद में सुप्रीम कोर्ट की बनाई एक कमेटी ने यही पाया कि ये 'एनकाउंटर' स्टेज किया गया था. लेकिन उससे पहले आरोपियों की हत्या के दिन सोशल मीडिया एक अलग उल्लास में था.

तेलंगाना पुलिस की जय-जयकार होने लगी थी. साइबराबाद के पुलिस कमिश्नर की फोटो के साथ सोशल मीडिया पर एक यूजर ने लिखा― ‘रियल लाइफ सिम्बा. उन जानवरों को मारने के लिए शुक्रिया’. ऐसे कई पोस्ट में लोग रणवीर सिंह की फिल्म 'सिम्बा' को याद कर रहे थे, जिसमें ऐसा ही कुछ हुआ था.

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विजिलांटे जस्टिस और फिल्मी हीरोइज्म
रणवीर सिंह की सबसे बड़ी हिट्स में से एक 'सिम्बा' के अंत में पुलिस ऑफिसर हीरो ने पीड़िता को ऐसे ही 'न्याय' दिलाया था. इस टिपिकल मसाला एंटरटेनर में रणवीर के काम को तो बहुत तारीफ मिली थी. मगर कहानी में 'न्याय' का ये एंगल बहुत लोगों को नहीं पचा था. मीटू मूवमेंट के बीच रेप कल्चर और महिलाओं के साथ यौन अपराधों पर छिड़ी गंभीर बहस के बीच आई 'सिम्बा' को तगड़ी आलोचना झेलनी पड़ी थी.

लोग हाइलाइट करने लगे कि कैसे इस तरह के 'न्याय' से महिलाओं की सुरक्षा का असली मुद्दा पीछे छूट जाता है. रेप की सोच को बढ़ावा देने वाले माहौल की बात पीछे छूट जाती है. क्योंकि बात करना उतना कूल नहीं है, जितना कूल एक्शन करना है. यौन अपराधों को जड़ से खत्म करने का माहौल बनाना उतना आसान नहीं है, जितना आसान है महिलाओं की रक्षा करने वाला हीरो खड़ा करना. रेप की सोच को खत्म करने वाला, सिस्टम की आंखें खोलने वाला 'न्याय' मुश्किल है. लेकिन आरोपी को गोली मारकर, हीरोइज्म का जश्न मनाकर वापस अपने-अपने रूटीन काम में लग जाना आसान है.

ऐसा नहीं है कि पहले फिल्मों ने रेप केस में विजिलांटे जस्टिस को प्रमोट नहीं किया. 'गर्व' (2004) में पुलिस ऑफिसर बने सलमान खान ने अपनी बहन को ऐसे ही न्याय दिलाया था. 'काबिल' (2017) में ऋतिक ने अपनी पत्नी का बदला ऐसे ही लिया था. 'मॉम' (2017) में श्रीदेवी ने अपनी बेटी और 'अज्जी' में एक दादी ने अपनी पोती पर सेक्शुअल असॉल्ट के बदले 'न्याय' ऐसे ही हासिल किया था.

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इन फिल्मों से कई दशकों पहले 80s में भी 'जख्मी औरत' (1988), 'मेरा जवाब' (1985) और 'प्रतिघात' (1987) जैसी फिल्मों ने ऐसे ही 'न्याय' को प्रमोट किया. क्रिटिक्स और बुद्धिजीवी वर्ग ने इस विजिलांटे जस्टिस की आलोचनाएं भी कीं मगर फिल्मों में ये एंगल बदस्तूर चलता रहा. रेप जैसे घिनौने अपराध के खिलाफ न्याय का मतलब फिल्मी हीरोइज्म में खोजा जाता रहा. लेकिन इस हीरोइज्म और विजिलांटे जस्टिस की समस्याओं पर बात करने की जहमत फिल्मों ने नहीं उठाई.

वजह वही थी— बात करना एक्शन करने से ज्यादा मुश्किल है. फिल्म के बोरिंग हो जाने का खतरा है और पता नहीं लोग टिकट के लिए पैसे खर्च करके बड़े पर्दे पर कड़वी रियलिटी देखना चाहेंगे या नहीं. मगर अनुभव सिन्हा की 'अस्सी' ने ये रिस्क लिया है. ये फिल्म एक महिला के साथ रेप के तमाम पहलुओं को इतने एंगल से दिखाती है कि ये समाज को आईना दिखाने जैसा हो जाता है. कैसे विजिलांटे जस्टिस रियल मामले से पूरा ध्यान हटा देता है, इस बात को 'अस्सी' बहुत दमदार और एंगेजिंग तरीके से दिखाती है. और एक ऐसी फिल्मी गलती को ठीक करती है, जिसकी शिकायत पिछले कुछ सालों में लोगों ने खूब की है.

'अस्सी' सिर्फ थिएटर में नहीं खत्म होती. आपके साथ आपके घर तक चली आती है और आपकी सोच को कुलबुलाती रहती है. मगर सवाल यही है कि एक्शन की बजाय डिस्कशन चुनने का जो रिस्क फिल्म ले रही है, दर्शक वो रिस्क लेना चाहेंगे? क्या जनता बड़े पर्दे पर एक कड़वी सच्चाई का सामना करना चाहेगी? जवाब अब जनता को देना है.

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