आशा भोंसले की बात करते हुए, लता मंगेशकर का जिक्र ना हो ये असंभव है. दोनों सगी बहनें, पिता से एकसाथ म्यूजिक की ट्रेनिंग. दोनों की आवाजों में इतनी समानता कि कई बार लोग लता के गानों को आशा का, और इसका उल्टा समझ बैठते हैं. दोनों की गायकी और जीवन में ही नहीं, मृत्यु में भी चौंकाने वाली समानताएं— हाल ही में आशा ने 92 की उम्र में मुंबई के ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में इस संसार से विदा ली. 4 साल पहले इसी हॉस्पिटल में लता ने भी अपनी अंतिम सांस ली थी. उनकी उम्र भी तब 92 साल थी.
जब दो बहनों में इतनी समानताएं हों तो, बचपन से ही तुलनाएं भी होनी ही थीं. इतनी समानताओं के बावजूद दोनों ने सिनेमा में अपनी अलग-अलग म्यूज़िकल विरासत बनाई. आशा और लता, दोनों ने जनता से जमकर प्यार और इंडस्ट्री से सम्मान कमाया. इसलिए दोनों के फैन्स में अक्सर ये भी चर्चा छिड़ी रहती रही कि दोनों में ज्यादा ग्रेट कौन था? लेकिन इन दो आइकॉन्स से प्यार करने का रस इस तुलना में नहीं, बल्कि इस सवाल में छुपा है कि गायकी में आशा कैसे लता से अलग थीं?
लता की छांव में बढ़ीं आशा
आशा ने जब 1948 में हिंदी फिल्मों में कदम रखा, लता को उसी साल उनका पहला बड़ा हिट गाना मिला था— दिल मेरा तोड़ा मुझे कहीं का न छोड़ा (मजबूर, 1948). उस दौर की पॉपुलर फीमेल सिंगर्स की आवाज में थोड़ा सा नाक से गाने वाला टोन कॉमन था. शमशाद बेगम, नूर जहां, जोहराबाई अंबालेवाली की आवाजों में ये बहुत कॉमन था. 'मेलोडी क्वीन' कही गईं सुरैया या गीत दत्त की आवाजों में ये टोन कम था. आशा की आवाज अलग तरह की थी— पतली, ट्रेनिंग से सधी हुई और ऊंचे स्केल को भी सूट करने वाली.
मगर आशा के आने से पहले इसी क्वालिटी की आवाज के साथ उनकी बड़ी बहन लता पॉपुलर होने लगी थीं. ऐसे में आशा को पहले उन म्यूजिक डायरेक्टर्स ने काम दिया जिन्हें लता या गीता नहीं मिल पाती थीं. लेकिन आशा ने इन मौकों को बहुत पॉजिटिव तरीके से लिया और गानों को सिर्फ गायकी के लेवल पर नहीं, उनके मूड के लेवल से डील किया. लता और आशा में एक फर्क पर्सनल कैरेक्टर का भी था.
लता ज्यादा गंभीर और काम के प्रति बिल्कुल प्रोफेशनल अंदाज वाली थीं. वो गानों को गायकी के नियमों को निभाते हुए गाती थीं, उनमें परफेक्शन तलाशती थीं. आशा शुरू से थोड़ी चुलबुली थीं और एक्सपेरिमेंट करने में उन्हें कोई ऐतराज नहीं था. इसलिए वो गानों के मूड पर ज्यादा ध्यान देती थीं. वेस्टर्न म्यूजिक के साथ एक्सपेरिमेंट करने के मामले में आशा ने लता से ज्यादा दिलचस्पी दिखाई और एक ऐसा अंदाज डेवलप किया जो हिंदी सिनेमा में बहुत मॉडर्न था.
आशा के इसी अंदाज ने उन्हें लता से अलग पहचान दिलाई. इसका बेहतरीन उदाहरण मनोज कुमार की फिल्म 'वो कौन थी' (1964) है. मदन मोहन ने इस फिल्म के एल्बम में इमोशनल गहराई और ठहराव भरे गाने 'लग जा गले' के लिए लता मंगेशकर की आवाज यूज की. इसी एल्बम में शरारत और रोमांटिक अदाबाजी से भरा गाना 'शोख नजर की बिजलियां' आशा से गवाया गया.
शरारत, अल्हड़पन और अदाबाजी की आवाज थीं आशा
1960-70 के दशक में जब आर डी बर्मन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल या कल्याणजी आनंदजी जैसे कंपोजर्स ने वेस्टर्न स्टाइल के साथ जमकर एक्सपेरिमेंट किए, तो आशा की डिमांड और बढ़ी. इसका एक सबूत हेलेन के साथ आशा के 'ओ मेरी जां मैंने कहा' या 'ये मेरा दिल' जैसे गाने हैं. आशा को गाने का मूड निभाना आता था इसलिए वो वैंप किरदारों या डांस नंबर्स में भी पॉपुलर हुईं.
लता की चॉइस ऐसे गानों की तरफ ज्यादा झुकी लगती थी, जो लीड एक्ट्रेस पर फिल्माए जाने थे. लता ने भी बाद में ये चीजें ट्राई कीं और हेलेन के लिए 'कांटा लगा' या 'आ जाने जां' जैसे गाने गाए. लता ने भी ये गाने निभा तो लिए, मगर आपको इनमें आशा जैसी मस्ती, अल्हड़पन, अदाबाजी या शरारत नहीं मिलेगी. इन क्वालिटीज ने आशा को सिर्फ अलग पहचान ही नहीं दी, उनका करियर भी लंबा किया. गानों में अपने अंदाज से खेलने वाली आशा ने 2000s में, 65 से ज्यादा उम्र में 'शरारा शरारा' गा लिया.
2005 में उन्होंने स्नेहा उल्लाल के गाने 'लकी लिप्स' को आवाज दी तो लोग हैरान रह गए. ऑलमोस्ट 70 साल की आशा, एक कॉलेज गर्ल के रोमांटिक इमोशन्स की आवाज बन सकती थीं— यही उनकी सबसे बड़ी खूबी थी. यही बात उन्हें लता से सबसे ज्यादा अलग बनाती थी, जिन्हें ऐसे किरदार की आवाज बनाने का खयाल भी किसी कंपोजर को नहीं आएगा! यही वजह थी कि मिलती-जुलती आवाज होने के बावजूद आशा और लता ने दोनों ने हजारों-हजार गाने एक ही इंडस्ट्री में गा डाले. और दोनों की म्यूज़िकल विरासत बहुत अलग और रिच है.