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डिजिटल प्रचार: BJP, कांग्रेस, सपा से बसपा तक... किसकी कितनी तैयारी, कौन पड़ेगा भारी?

कोरोना वायरस की पिछली दो लहरों के कारण देश-दुनिया में तकनीक के क्षेत्र में तेजी से बदलाव देखने को मिले हैं. लॉकडाउन के कारण 'वर्क फ्रॉम होम' कल्चर ने कंपनियों को डिजिटली मजूबत होने को मजबूर किया. अब तीसरी लहर देश में राजनीतिक पार्टियों की परीक्षा ले रही है. ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव में 15 जनवरी तक अचानक वर्चुअल प्लेटफॉर्म पर प्रचार के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.

मायावती, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, योगी आदित्यनाथ मायावती, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, योगी आदित्यनाथ
स्टोरी हाइलाइट्स
  • देश के पांच राज्यों में सात चरणों में चुनाव होंगे
  • कोरोना संक्रमण के चलते चुनावी रैलियों पर रोक
  • राजनीतिक दलों को डिजिटल प्रचार करना होगा

उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों का बिगुल बीते शनिवार को ही बज गया, जब चुनाव आयोग ने तारीखों का ऐलान किया. 10 फरवरी से सात चरणों में से पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. लेकिन कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए आयोग ने 15 जनवरी तक रैलियों पर रोक लगा दी है और सिर्फ वर्चुअल प्रचार की अनुमति दी है. ऐसे में यह जानना दिलचस्प होगा कि पार्टियां डिजिटल प्रचार के लिए कितनी तैयार हैं और इस मामले में कौन आगे दिख रहा है. 

दरअसल, कोरोना के बढ़ते मामले को देखते हुए पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव पर असमंजस की स्थिति बनी हुई थी. तब चुनाव आयोग की टीम ने उत्तर प्रदेश का दौरा किया और सभी पार्टियों ने एकसुर में समय पर चुनाव कराने का अनुरोध किया. तब उन्हें बिल्कुल एहसास नहीं था कि आगे क्या होने वाला है. इसके बाद चुनाव आयोग ने फैसला लिया कि समय पर ही चुनाव होंगे. इस बीच, कोरोना का कहर बढ़ता ही गया. बीते शनिवार 8 जनवरी को चुनाव आयोग ने पांच राज्यों में चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया. 

चुनावा आयोग ने ऐलान करते समय इस बात पर जोर दिया कि पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव सख्त प्रोटोकॉल के तहत कराए जाएंगे. सबसे बड़ी बात कि आयोग ने कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए 15 जनवरी तक रोड शो, जुलूस और रैलियों पर रोक लगा दी और तब तक सिर्फ वर्चुअल प्रचार की अनुमति दी. ऐसे में पार्टियों की ओर से इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आने लगीं. सबसे पहले समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने चिंता चताई फिर असदुद्दीन ओवैसी ने भी अपना विरोध जताया. 

AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने अपना विरोध जताते हुए कहा कि नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि यूपी में हर 100 में से सिर्फ 39 लोगों के पास इंटरनेट होता है. NSS की रिपोर्ट का भी हवाला देते हुए ओवैसी ने कहा कि सिर्फ चार प्रतिशत घरों में कंप्यूटर की सुविधा है. ये भी दावा किया कि यूपी में 50 प्रतिशत महिलाओं ने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं किया. इस सब के अलावा AIMIM चीफ ने जोर देकर कहा कि सीमित लोगों के पास ही मोबाइल की सुविधा उपलब्ध है, ऐसे में डिजिटल प्रचार एक चुनौती बन सकता है. 

दरअसल, चुनाव आयोग द्वारा रैलियों पर प्रतिबंध को लेकर शायद ही कोई पार्टी तैयार थी. उत्तर प्रदेश में अब तक के प्रचार अभियान की बात करें तो बीजेपी और समाजवादी पार्टी इसमें आगे दिख रही है. लेकिन बहुजन समाजवादी पार्टी समेत अन्य छोटी पार्टियां प्रचार के लिए अभी जोर लगाने की तैयारी ही कर रही थी कि रैलियों पर रोक का ऐलान चुनाव आयोग ने कर दिया. अब हम इस बात पर गौर करते हैं कि किस पार्टी की कितनी तैयारी है और कौन आगे है.

बीजेपी मार सकती है बाजी!

बीजेपी के अलावा शायद ही कोई भी पार्टी इस बात के लिए तैयार थी कि उन्हें वर्चुअल या डिजिटल रैली पर आना होगा. अब तक उत्तर प्रदेश में बीजेपी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की करीब दर्जन भर सभाएं हो चुकी हैं. इसके अलावा बीजेपी की पूरे प्रदेश में लगभग सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में जन विश्वास यात्रा हो चुकी है. 

आजतक के खास कार्यक्रम 'पंचायत आजतक लखनऊ' में इस पर प्रतिक्रिया देते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि आपदा के समय ही रास्ता भी निकलता है. जो कहते थे कि वे वेल इक्यूप्ड हैं, वो समझें. आयोग का जो आदेश होगा हम उसके अनुरूप उतरेंगे.

इसके अलावा यह बात भी साफ है कि वर्चुअल प्रचार में वही पार्टी आगे निकलेगी जिनके कार्यकर्ता डिजिटली ज्यादा लोगों के साथ जुड़े हैं यानि डिजिटली इक्यूप्ड है. ऐसे में जाहिर है कि बीजेपी सबसे आगे नजर आ रही है, क्योंकि इनके कार्यकर्ता, पदाधिकारी वाट्सऐप से जुड़े हैं और इनकी जूम मीटिंग होती रही है. हालांकि यह नहीं कहा जा सकता है कि बीजेपी वर्चुअल रैलियों के मामले में गांव-गांव तक पहुंच जाएगी. लेकिन, संसाधनों के हिसाब से वह काफी मजबूत है. 

समाजवादी पार्टी की कैसी तैयारी?

बीजेपी के बाद समाजवादी पार्टी ही है जो अब तक प्रचार में दूसरे नंबर पर दिख रही है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव अपने रथ को लेकर प्रदेश के कई इलाकों में प्रचार अभियान पूरा कर चुके हैं. सपा भी पिछले कुछ समय से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मेहनत कर रही है और बीजेपी के बाद वही आगे निकलते दिख रही है. लेकिन अखिलेश ने सबसे पहले वर्चुअल रैली पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ''बीजेपी के लोग डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कब्जा जमाए हुए हैं. जिन पार्टी के पास संसाधन नहीं हैं वो वर्चुअल रैली कैसे करेंगे. जो छोटी पार्टियां हैं उन्हें कैसे स्पेस मिलेगा. इनके लिए चुनाव आयोग को कुछ करना चाहिए.''

'पंचायत आजतक लखनऊ' के कार्यक्रम में बोलते हुए अखिलेश ने कहा, ''सभी पार्टियों को मीडिया में बराबर का स्पेस दिया जाय, किसी पार्टी का व्यूअर है तो समाजवादी पार्टी का. हम इक्यूप्ड हैं. आयोग क्षेत्रिय दलों के बारे में सोचे. इनकी मदद कौन करेगा. वो जनता के बीच कैसे जाएंगे. नए और छोटे दलों की बात जनता तक कैसे पहुंचेगी. लोकतंत्र मजबूत तभी होगा जब छोटे दल अपनी बात रख पाएंगे. समाजवादी पार्टी के पास कार्यकर्ता हैं, वो साइकिल से जाएंगे और लोगों का दरवाजा खटखटाएंगे.''

कांग्रेस का क्या प्लान

देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी भी पिछले कुछ समय से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपने आप को मजबूत करने के प्रयास में जुटी थी. हालांकि, वह भी इतना नहीं सोच सकी थी कि उत्तर प्रदेश चुनाव ऐलान के साथ ही उसे वर्चुअल माध्यम से प्रचार के लिए उतरना पड़ेगा. कांग्रेस का संगठन यूपी में दूसरे दलों के मुकाबले कमजोर है, लेकिन कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के कमान संभालने के बाद संगठन खड़ा हुआ है और कार्यकर्ताओं की टीम भी तैयार हुई है. प्रियंका गांधी ने पार्टी के लोगों से डिजिटली बातचीत शुरू कर दी है. 

हालांकि, प्रियंका गांधी ने यूपी में चुनाव ऐलान से पहले सूबे में तमाम कार्यक्रम कर माहौल बना चुकी है. लड़की हूं लड़ सकती के जरिए महिलाओं के साथ संवाद करने के कार्यक्रम से लेकर चुनावी घोषणाओं का भी ऐलान किया है. कांग्रेस के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने कहा कि कोरोना के मद्देनजर रैलियों को निरस्त करने की मांग सबसे पहले कांग्रेस ने ही की थी. अजय कुमार लल्लू ने बताया कि हमने डेढ़ लाख वाट्सएप ग्रुपों के माध्यम से तीन करोड़ लोगों को जोड़ने का काम किया है. सदस्यता अभियान के तहत प्रत्येक विधानसभा में 40-50 हजार नए लोगों को जोड़ा है. ऐसे में हमने जो टीम तैयार की है, उसके जरिए चुनाव प्रचार करेंगे.  

बसपा व अन्य छोटे दल कहां हैं?

उत्तर प्रदेश में अगर बसपा और अन्य छोटे दलों की बात करें तो वर्चुअल माध्यम से प्रचार में वो काफी पीछे नजर आ रहे हैं. उनके पास संसाधनों की कमी है. खासकर बसपा की बात करें तो सतीश चंद्र मिश्रा 2-3 महीनों से प्रचार अभियान में जुटे थे, ब्राह्मण महासभा कर रहे थे. लेकिन कहा जा रहा था कि बसपा प्रमुख मायावती 15 जनवरी, अपने जन्मदिन के मौके पर प्रचार अभियान का आगाज करेंगीं. उनके कार्यकर्ताओं को इसका इंतजार था. लेकिन इस बीच कोरोना के कारण रैलियों पर चुनाव आयोग ने प्रतिबंध लगा दिया. ऐसे में इनके कैंप में निश्चित रूप से मायूसी है. छोटे दलों के पास तो संसाधनों का बिल्कुल ही अभाव है और वो शायद ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लोगों तक पहुंच पाएंगे.

ऐसे में बीजेपी भले निश्चित रूप से वर्चुअल प्रचार और अब तक के कैंपेन में सभी पार्टियों से आगे दिख रही हो, लेकिन चुनावी रैलियों में रोक से भी उसी पर सबसे ज्यादा प्रभाव भी पड़ सकता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और जेपी नड्डा जैसे बड़े नेताओं की फिजिकल रैली न होने से बीजेपी के लिए चिंता का सबब बन सकता है. पीएम मोदी और अमित शाह को चूनावी माहौल के रुख को बदलने का माहिर माना जाता है. 

वहीं, समाजवादी पार्टी ने प्रचार में दम दिखाया है और अखिलेश यादव के विजय रथ यात्रा के दौरान जिस तरह से भीड़ जुट रही थी. उससे यूपी में सपा के पक्ष में माहौल बना रहा था, लेकिन वर्चुअली रैली में उस तरह के हवा नहीं बन सकेगी. इतना ही नहीं अखिलेश यादव ने जिन छोटे दलों के साथ गठबंधन किया है, उनके लिए चिंताए जरूर हैं. छोटे दलों की स्थिति ठीक नजर नहीं आ रही है. अब देखना दिलचस्प होगा कि 15 जनवरी तक छोटे दल कैसे अपना डिजिटल प्रचार अभियान को आगे बढ़ाते हैं.

 

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