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कांग्रेस को मुस्लिम सम्मेलन से क्या यूपी चुनाव में मिलेगा सियासी फायदा? 

यूपी में सपा-बसपा-बीजेपी सूबे में ब्राह्मण और ओबीसी जातियों को साधने में जुटी हैं तो कांग्रेस की नजर मुस्लिम समुदाय के वोटों पर है. कांग्रेस में मुस्लिम वोटों को अपने पाले में लाने के लिए सोमवार को लखनऊ में अल्पसंख्यक सम्मेलन किया जा रहा है, जिसे 'परिवर्तन संकल्प महासम्मेलन' का नाम दिया गया है. 

यूपी में मुसलमानों की पहली पसंद कौन पार्टी बनेगी यूपी में मुसलमानों की पहली पसंद कौन पार्टी बनेगी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • उत्तर प्रदेश में कांग्रेस मुस्लिम सम्मलेन करने में जुटी
  • यूपी की 20 फीसदी मुसलमानों किसके साथ जाएगा
  • मुसलमान सपा छोड़कर कांग्रेस के साथ क्यों जाएंगे

उत्तर प्रदेश में तीन दशकों से सत्ता बाहर कांग्रेस अपनी सियासी जमीन तलाश में तमाम तरह का राजनीतिक प्रयोग में जुटी है. सपा-बसपा-बीजेपी सूबे में ब्राह्मण और ओबीसी जातियों को साधने में जुटी हैं तो कांग्रेस की नजर मुस्लिम समुदाय के वोटों पर है. कांग्रेस में मुस्लिम वोटों को अपने पाले में लाने के लिए सोमवार को लखनऊ में अल्पसंख्यक सम्मेलन किया जा रहा है, जिसे 'परिवर्तन संकल्प महासम्मेलन' का नाम दिया गया है. 

कांग्रेस ने अल्पसंख्यक सम्मेलन के जरिए चुनावी अभियान शुरू कर रही है. कांग्रेस अन्य दलों खास कर सपा से बढ़त बनाने में लगी है. सूबे में सपा, बसपा और भाजपा ने अभी तक कोई अल्पसंख्यक सम्मेलन नहीं किया है. एक तरह से सपा के कोर वोटर समझे जाने वाले मुस्लिम मतदाताओं को कांग्रेस अपने पाले में लाने की कोशिश है. ऐसे में क्या यूपी के मुसलमानों का दिल कांग्रेस के लिए 2022 के चुनाव में पसीजेगा?  

यूपी में मुस्लिमों वोटों को लेकर सपा और कांग्रेस के बीच शह-मात का खेल चल रहा है और सूबे का मुसलमानों खामोशी के साथ बैठा चुनाव का एंतजार कर रहा है. सूबे में प्रियंका गांधी  सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन के दौरान से अल्पसंख्यकों के साथ खुल कर खड़े होने को कांग्रेस मुसलमानों के बीच भुनाने की कोशिश करती दिख रही है. वहीं, अखिलेश यादव ने पिछले दिनों सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन में दर्ज किए गए मुकदमे हटाने की बात कही थी तो अब कांग्रेस ने मुकदमे हटाने के साथ ही मुआवजा देने का भी ऐलान कर दिया है. 

बसपा-सपा ने मुस्लिमों वोटों को दम पर सरकार बनाया

कांग्रेस के अल्पसंख्यक कमेटी के प्रदेश अध्यक्ष शाहनवाज आलम कहते हैं कि 1990 के बाद से यूपी में जितनी भी पार्टियां सत्ता में आई हैं, उन्होंने सिर्फ मुसलमानों को ठगने का काम किया. सपा और बसपा सरकार ने मुस्लिमों वोटों को दम पर सरकार बनाया, लेकिन काम मायावती ने जाटव समुदाय का किया तो अखिलेश यादव ने यादव समाज किया. मुसलमानों को मुद्दों पर सपा और बसपा बोलने को भी तैयार नहीं है, ऐसे में कांग्रेस ही एकलौती पार्टी है, जो मुसलमानों के हक और अधिकार के लिए लड़ रही है. 

शाहनवाज आलम कहते हैं कि मुस्लिम समाज को एकजुट करने के लिए कांग्रेस सम्मेलन आयोजित कर रही है. इसके बाद हम यूपी भर में ऐसे ही सम्मेलन करेंगे और हम मुसलमानों से बात करके उनके मुद्दों को भी अपने घोषणा पत्र में शामिल करने का काम भी शुरू कर दिया है. कांग्रेस मुसलमानों के गरीब और पिछड़े तबके पर खास फोकस कर रही है. ऐसे ही लोगों को कांग्रेस ने संगठन में शामिल किया है. 

कांग्रेस ने बुनकर और क़ुरैशी समाज पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया है. क़ुरैशी पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुनकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में कई सीटों को प्रभावित करते हैं. कांग्रेस की कोशिश मुसलमानों को एक सामूहिक वोटर के बजाए उसके अंदर की जातिगत समीकरणों को साधने की हैय इससे न सिर्फ ध्रुवीकरण की कम गुंजाइश होगी बल्कि सपा के खिलाफ भी पिछड़े मुसलमानों में नाराजगी बढ़ सकती है. 

2014 के बाद से मुस्लिम वोट अप्रसांगिक हो गया

यूपी की वरिष्ठ पत्रकार सैय्यद कासिम कहते हैं कि यूपी में 2014 के बाद से मुस्लिम वोट अप्रसांगिक हो गया है. सूबे में सभी पार्टियां मुसलमानों को वोट तो लेना चाहती हैं, लेकिन मुसलमानों की कोई बात नहीं करना चाहता है. मुस्लिम समुदाय पूरी तरह से खामोश अख्तियार किए हुए है. ऐसे में कांग्रेस ने मुस्लिम सम्मेलन कर एक आगाज किया है, जो सपा के लिए चिंता बढ़ाने वाला है. यूपी मुस्लिम सपा का परंपरागत वोटर माना जाता है. ऐसे में कांग्रेस की मुसलमानों के बीच सक्रियता सपा के लिए बेचैनी बढ़ाने वाली है. 

लखनऊ के मुस्लिम सियासत पर नजर रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक आसिफ रजा कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटर पश्चिम बंगाल के पैटर्न पर वोटिंग करेगा. यूपी में मुसलमानों को सिर्फ एक सिंगल एजेंडा बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने का है. ऐसे में कांग्रेस भले ही मुस्लिम सम्मेलन कर रही हो, पर इसका मुस्लिम राजनीति पर कोई खास सियासी असर नहीं पड़ने जा रहे हैं. यूपी में मुसलमानों ने अपना मिजाज बना लिया है और कांग्रेस को कोई फायदा नहीं मिलेगा. मुसलमान  यह बात भी समझ रहा है कि सपा के सत्ता में आने के बाद भी उसे कोई फास फायदा नहीं होने वाला है. इसके बाद भी वोट देने के मूड में है.  

दिलचस्प बात यह है कि मुसलमानों को वोट सूबे के सभी दल चाहते हैं. सपा संगठन में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ है, लेकिन 2019 के चुनाव के बाद से अखिलेश यादव ने सपा अल्पसंख्यक सभा के प्रदेश अध्यक्ष को नियुक्त नहीं कर सके हैं. यूपी में सपा अल्पसंख्यक सभा का प्रदेश अध्यक्ष तक नहीं है. बसपा में अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ ही नहीं है. यूपी में कांग्रेस और बीजेपी का अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ है. कांग्रेस नेता ने सपा नेतृत्व पर पिछड़े मुसलमानों को ठगने और पिछ्डेवाद के नाम पर सिर्फ़ एक ही जाति विशेष के लिए काम करने का आरोप लगाया. 

 

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