उत्तर प्रदेश की बस्ती सदर विधानसभा सीट पर 2017 के चुनाव में पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने खाता खोला था. इससे पहले इस सीट पर कांग्रेस-बसपा का ही कब्ज़ा रहा है. समाजवादी पार्टी को भी इस सीट पर जीत नसीब नहीं हुई. स्थानीय जानकारों की मानें तो अभी कोई भी बड़ा नेता अपने पत्ते नहीं खोल रहा है.
राजनीतिक पृष्ठभूमि
बस्ती सदर विधानसभा सीट से 1952 में पहली बार विधानसभा का चुनाव हुआ था. इस सीट पर बदलाव की परंपरा रही है. काफी समय से वोट पार्टी के नाम पर तथा उनके शीर्ष नेतृत्व के नाम पर मांगे जाते रहे हैं. किसी भी नेता का इस सीट पर दबदबा नहीं रहा. विकास की दृष्टि से क्षेत्र पिछड़ा है. इस सीट का नेतृत्व कांग्रेस विधायक के तौर पर केरल से आईं दो बहनें अलमेलू अम्माल व सरस्वती अम्माल भी कर चुकी हैं, जिन्हें सोशलिस्ट मूवमेंट की देन कहा जाता था.
बस्ती सदर विधानसभा में काग्रेस सरकार के प्रथम पेट्रोलियम मंत्री पं. केशव देव मालवीय ने प्लास्टिक पर आधारित उद्योगों के लिए प्लास्टिक काम्प्लेक्स बनवाया था. मालवीय ने यहां प्लास्टिक के कच्चे माल के लिए आईपीसीएल का डिपो व इंडियन आयल का डिपो स्थापित करवाकर बस्ती को मुख्य धारा में ला दिया था. एक अंतराल में नेतृत्वविहीन जिले से दोनों प्रमुख डिपो उखड़कर चले गए. औद्योगिक संस्थान भी बीमार हो गए. नतीजा रहा कि यूपीएफसी और यूपीएसआईडीसी ने भू भाग और मशीनें औने पौने दामों में नीलाम कर दीं, जिसमें आज व्यवसायिक और आवासीय काम हो रहे हैं.
2017 का जनादेश
2012 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के जितेंद्र कुमार उर्फ नंदू चौधरी ने 19003 वोटों से जीत हासिल की थी. ये लगभग 58.29 प्रतिशत था, जबकि 34008 वोट पाकर अभिषेक पाल दूसरे स्थान पर रहे. वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में दयाराम चौधरी भारतीय जनता पार्टी से 92697 वोट पाकर विजयी घोषित हुए. महेंद्र नाथ यादव समाजवादी पार्टी से 50103 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे. तीसरे स्थान पर रहे बसपा के जीतेन्द्र कुमार उर्फ नन्दू चौधरी को 49538 वोट मिले थे.
सामाजिक ताना-बाना
निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, बस्ती सदर में 369150 मतदाता हैं, जिसमें महिला मतदाताओं की संख्या 171616 है और पुरुष 197506 हैं. बस्ती सदर विधानसभा में मुस्लिम मतदाता भी अहम रोल अदा करते हैं. हालांकि यहां पर ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य, कायस्थ, मुस्लिम, यादव, कुर्मी, भूमिहार और सोनकर मतदाताओं की मिली-जुली आबादी है. जातीय आंकड़ों के अनुसार, ब्राह्मण मतदाता 51 हजार से अधिक, वैश्य 15 हजार, ठाकुर 24 हजार से अधिक, कायस्थ 12 हजार, मुस्लिम 42 हजार से अधिक, यादव 27 हजार, कुर्मी 36 हजार, भूमिहार मतदाता 6 हजार हैं.
बस्ती और वाल्टरगंज की दो चीनी मिलें बंद होने के बाद गन्ना किसान निराश रहे, लेकिन मुख्यमंत्री योगी ने मुंडेरवा की बंद चीनी मिल को चालू करवाकर किसानों की आस जगा दी. मुंडेरवा वह जगह है, जहां महेन्द्र सिंह टिकैत के नेतृत्व मे किसान आंदोलन हुआ था. आंदोलन के दौरान प्रशासनिक कार्यवाही में तीन किसानों की मौत हो गई थी. यहीं उनके स्मारक बने हैं. जहां साल में एक बार भारतीय किसान यूनियन के राकेश सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसान स्मरण करते हैं.
विधायक का रिपोर्ट कार्ड
बस्ती सदर की विधानसभा में यहां से भाजपा के टिकट पर दयाराम चौधरी 2017 में विधायक निर्वाचित हुए. उनकी उम्र 66 वर्ष है. योग्यता 12वीं है. आर्थिक रूप से 3.68 करोड़ की उद्घोषित संपत्ति के मालिक हैं. इनके एक पुत्र और 3 बेटियां हैं. एक अपराधिक मुकदमा विचाराधीन है. मौजूदा विधायक दयाराम चौधरी स्वयं अल्पशिक्षित होते हुए एक बड़ा पब्लिक स्कूल चलाते हैं. विधायक निधि में 5 वर्षों के कार्यकाल में 11 करोड़ रुपये की राशि आई, जिसमें से एक भी पैसा शेष नहीं है.
दयाराम चौधरी की लोकप्रियता क्षेत्र के वोटर्स में अच्छी है. 2017 की विधानसभा में इस सीट से भाजपा के टिकट पर दयाराम चौधरी 92697 वोट पाकर विजयी हुए थे. निकटतम प्रतिद्वंद्वी सपा के महेंद्र नाथ यादव को 50103 मत मिले थे. भाजपा के दयाराम चौधरी 42594 मतों से जीते थे. तीसरे नंबर पर बसपा के जीतेन्द्र कुमार उर्फ नन्दू चौधरी को 49538 वोट मिले थे. चुनाव में 50 % वोटिंग हुई थी.
(इनपुट: मिस्बा उस्मानी)