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Dalit Chief Minister India: छह साल बाद देश को मिला दलित CM, पंजाब में पहली बार

चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब में दलित समुदाय के पहले ऐसे नेता हैं जिन्हें राज्य के मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभालने का मौका मिला. देश में 6 साल बाद किसी राज्य को दलित सीएम मिला है. देश की बात करें तो सबसे पहले बिहार को दलित सीएम मिला था.

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पंजाब में मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब में मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • देश में पहला दलित मुख्यमंत्री बिहार से मिला
  • यूपी में मायावती चार बार मुख्यमंत्री रहीं
  • कांग्रेस ने दिए सबसे ज्यादा दलित मुख्यमंत्री

पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफा देने के बाद कांग्रस हाई कमान ने नए मुख्यमंत्री के रूप में चरणजीत सिंह चन्नी का चुनाव कर सबको चौंका दिया. चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब में दलित समुदाय के पहले ऐसे नेता हैं जिन्हें राज्य के मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभालने का मौका मिला. यही नहीं, देश में छह साल के बाद किसी राज्य को दलित मुख्यमंत्री मिला है.

जीतनराम मांझी के बाद चरणजीत सिंह 

जीतनराम मांझी 2015 में बिहार के मुख्यमंत्री पद से हटे थे. उनके बाद से देश के किसी भी राज्य में दलित मुख्यमंत्री नहीं बना. ऐसे में पंजाब के सियासी झगड़े के बीच कांग्रेस ने अपनी राजनीति को नए सामाजिक समीकरण का स्वरूप देने का यह फार्मूला निकाला है. पंजाब में दलित समुदाय बड़ा वोट बैंक है और अकाली दल, आम आदमी पार्टी व भाजपा सभी इस वर्ग को साधने के लिए चुनावी वादे कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस ने एक कदम बढ़ते हुए चुनाव से पहले ही दलित सीएम बना  दिया है.

कांग्रेस ने पंजाब में दलित कार्ड के जरिए देश के दूसरे राज्यों के भी समीकरण साधने का दांव चला है. कांग्रेस के इस पैंतरे के पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि चरणजीत सिंह चन्नी मौजूदा समय में पूरे देश में दलित समुदाय के इकलौते मुख्यमंत्री हैं. हालांकि, पहले यूपी, बिहार सहित कई राज्यों में दलित सीएम रहे हैं, लेकिन पंजाब के सियासी इतिहास में पहली बार ऐसा मौका आया है. 

बीजेपी के पास कोई दलित सीएम नहीं

झारखंड और पूर्वोत्तर के साथ आंध्र प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में आदिवासी और ईसाई समुदाय के मुख्यमंत्री हैं, लेकिन देश के 28 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों में कहीं भी कोई दलित मुख्यमंत्री नहीं है. बीजेपी मौजूदा समय में 17 राज्यों में अकेले या फिर गठबंधन के साथ सरकार में है, लेकिन उसका एक भी दलित सीएम नहीं है. ऐसे में कांग्रेस ने अपने परंपरागत दलित वोटों को साधने का बड़ा दांव चला है. 

देश में दलित आबादी वाले राज्य

भारत की कुल आबादी का 16.6 फीसद दलित समुदाय है. इन्हें सरकारी आंकड़ों में अनुसूचित जातियों के नाम से जाना जाता है. देश में कुल 543 लोकसभा सीट हैं. इनमें से 84 सीटें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. 

दलित आबादी वाला सबसे बड़ा राज्य पंजाब है. यहां की 32 फीसदी आबादी दलित है और 34 विधानसभा सीटें दलितों के लिए आरक्षित हैं. उत्तर प्रदेश में करीब 20.7 फीसदी दलित हैं. राज्य की 17 लोकसभा और 86 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं. बीजेपी ने यहां 2017 के विधानसभा चुनाव में 76 आरक्षित विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी.

हिमाचल प्रदेश में 25.2 फीसदी, हरियाणा में 20.2 दलित आबादी है. मध्य प्रदेश में दलित समुदाय की आबादी 6 फीसदी है जबकि यहां आदिवासियों की आबादी करीब 15 फीसदी है. पश्चिम बंगाल में 10.7, बिहार में 8.2, तमिलनाडु में 7.2, आंध्र प्रदेश में 6.7, महाराष्ट्र में 6.6, कर्नाटक में 5.6, राजस्थान में 6.1 फीसदी आबादी दलित समुदाय की है. 

यूपी में जाटव तो बिहार में पासवान केंद्रित 

उत्तर प्रदेश में जाटव केंद्रित दलित राजनीति है तो बिहार में पासी या मुसहर केंद्रित. पंजाब में सर्वाधिक 32 फीसद दलित हैं, लेकिन पहली बार दलित मुख्यमंत्री मिला है. आजादी के दौरान ही बाबा साहब अंबेडकर और फिर बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम ने अस्सी के दशक में देश की सियासत में दलित राजनीति की व्यूह रचना शुरू की थी, लेकिन बिहार में दलित मुख्यमंत्री के तौर पर भोला पासवान की ताजपोशी 1968 में हो गई थी. 

बिहार को देश में पहला दलित सीएम मिला

बिहार की सत्ता की कमान संभालने वाले भोला पासवान देश में पहले दलित मुख्यमंत्री थे. उन्होंने एक बार नहीं बल्कि तीन बार मुख्यमंत्री के तौर पर सत्ता की बागडोर संभाली थी. भोला पासवान के बाद बिहार को जनता दल के शासन के दौर में राम सुंदर दास के तौर पर दलित मुख्यमंत्री मिला. रामसुंदर दास ने 1979 से 1980 तक एक साल सत्ता की कमान संभाली और उनके बाद जीतनराम मांझी दलित सीएम बने थे. 

यूपी में मायावती पहली दलित सीएम बनीं

वहीं, कांशीराम ने दलित राजनीति का ऐसा सियासी प्रयोग किया कि बसपा ने उत्तर प्रदेश में मजबूती के साथ दस्तक दी और मायावती ने एक−दो बार नहीं बल्कि चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली. यूपी में दलित सीएम के तौर पर मायावती 1995 में पहली बार बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं तो फिर सूबे में दलित वोटों पर लंबे समय तक उनका एकछत्र राज कायम रहा. 2007 में बसपा ने अपने दम पर पूर्णबहुमत के साथ सरकार बनाई, लेकिन यहीं से उसका सियासी ग्राफ डाउन होने लगा. 2012 में मायावती के सत्ता से हटने के बाद यूपी में कोई दलित सीएम नहीं बन सका.

महाराष्ट्र और राजस्थान में दलित सीएम

महाराष्ट्र में कांग्रेस ने सुशील कुमार शिंदे के रूप में दलित मुख्यमंत्री दिया था जबकि राजस्थान में 1980 में जगन्नाथ पहड़िया के रूप में कांग्रेस ने दलित मुख्यमंत्री दिया था. इसके अलावा तमिलनाडु में के. कामराज को कांग्रेस ने तीन बार मुख्यमंत्री बनाया. 

बसपा संस्थापक कांशीराम पंजाब के होशियारपुर से थे, फिर भी वह पंजाब में दलितों में पैठ नहीं बना सके? कारण स्पष्ट है कि वहां दलित समाज वाल्मिकी, रविदासी, कबीरपंथी, मजहबी सिख आदि में बंटे हुए हैं, जिनमें रोटी-बेटी का संबंध भी नहीं होता. इसीलिए मायावती को पंजाब में आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अकाली दल के साथ गठबंधन करना पड़ा. 

पंजाब में कांग्रेस ने किया सियासी प्रयोग

पंजाब के जरिए उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस अपने सियासी आधार को वापस हासिल करने के लिए बीजेपी के अलावा सबसे बड़ा सियासी निशाना बसपा पर ही साध रही है. बसपा को सवालों के कठघरे में खड़ा करना प्रियंका गांधी वाड्रा की सियासी रणनीति का हिस्सा है. स्वाभाविक रूप से पंजाब में किया गया कांग्रेस का यह प्रयोग उत्तर प्रदेश में पार्टी के लिए अनुसूचित जाति के बीच फिर से पैठ बनाने का मौका दे सकता है. ऐसे में देखना है कि कांग्रेस का दलित कार्ड देश में अब क्या सियासी करिश्मा दिखाता है. 

 

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