लोकसभा चुनाव 2019 के तहत गुजरात की पाटण लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) अपना परचम लहराने में कामयाब रही है. बीजेपी प्रत्याशी भरत सिंह दाभी ने अपने नजदीकी प्रतिद्वंदी कांग्रेस के जगदीश ठाकोर को 193879 वोटों से शिकस्त दी है. सामान्य वर्ग वाली पाटण सीट पर कुल 12 प्रत्याशी मैदान थे. हालांकि मुख्य मुकाबला बीजेपी व कांग्रेस के बीच ही रहा.
2019 का जनादेश
बीजेपी प्रत्याशी भरत सिंह दाभी को छह लाख 33 हजार 368 वोट मिले, वहीं कांग्रेस प्रत्याशी जगदीश को 439489 वोट मिले. 14327 वोटों के साथ नोटा का वोट प्रतिशत 1.27%रहा. नेशलिस्ट कांग्रेस पार्टी के कीर्तिभाई चौधरी को 9215 वोट मिले. बता दें कि इस सीट पर तीसरे चरण के तहत 23 अप्रैल को मतदान हुआ था. मतदान का प्रतिशत 61.78 रहा है. कांग्रेस व बीजेपी दोनों ही प्रमुख दलों ने पाटण में इस बार नए उम्मीदवार उतारे थे.
2014 का जनादेश
2014 में यहां से बीजेपी के टिकट पर लीलाधर वाघेला ने कांग्रेस भावसिंह राठौड़ को हराया था. इस चुनाव में यहां पर 58.7% मतदान हुआ था जिसमें बीजेपी प्रत्याशी लीलाधर वाघेला को 5,18,538 वोट (54.3%) और कांग्रेस प्रत्याशी भाव सिंह राठौड़ 3,79,819 (39.7%) वोट मिले थे.
पाटन लोकसभा सीट: जानें, बीजेपी और कांग्रेस ने किसको बनाया है उम्मीदवार?
सामाजिक ताना-बाना\
2011 की जनगणना के अनुसार, यहां की आबादी 23,17,424 है. इसमें 84.98% ग्रामीण और 15.02% शहरी आबादी है. पाटण लोकसभा क्षेत्र मेहसाणा, बनासकांठा और पाटन जिले के अंतर्गत आती है. अनुसूचित जाति की संख्या यहां 9.67% और अनुसूचित जनजाति 1.15% है. पाटण जिले की बात की जाए तो यहां करीब 11 फीसदी मुस्लिम आबादी है.
पाटन लोकसभा क्षेत्र के अधीन वडगाम, चाणास्मा, खेरालू, कांकरेज, पाटन, राधनपुर और सिद्धपुर है. 2017 के विधानसभा चुनाव में राधनपुर से कांग्रेस, चाणस्मा से बीजेपी, पाटन से कांग्रेस, सिद्धपुर से कांग्रेस, कांकरेज से बीजेपी, खेरालू से बीजेपी और वडगाम से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जिग्नेश मेवाणी ने जीत दर्ज की थी.
सीट का इतिहास
पाटण लोकसभा सीट पर पहला चुनाव 1957 में हुआ था और बहादुर सिंह ठाकोर के रूप में निर्दलीय उम्मीदवार को जीत मिली थी. इसके बाद 1962 का चुनाव कांग्रेस ने जीता. 1967 में स्वतंत्र पार्टी, 1971 में नेशनल कांग्रेस (O), 1977 में भारतीय लोकदल ने यहां से बाजी मारी. 1980 के चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के उम्मीदवार रंछोड़दास परमार ने चुनाव जीता. 1984 में कांग्रेस को यहां से जीत मिली. 1989 में यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई और इस चुनाव में जनता दल के खेमचंद चावड़ा ने चुनाव जीता.1991 के आम चुनाव में इस सीट पर पहली बार बीजेपी को जीत मिली, जब महेश कनोडिया ने चुनाव जीता. इसके बाद 1996 और 1998 के चुनाव में भी यह सीट बीजेपी के नाम हुई. कांग्रेस ने फिर वापसी की और 1999 के चुनाव में महेश कनोडिया ने चुनाव जीता. 2004 में फिर बीजेपी आई और 2009 में कांग्रेस के जगदीश ठाकोर यहां से सांसद बनें. 2014 में बीजेपी के टिकट पर लीलाधर वाघेला ने बाजी मारी.
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