दक्षिणी-पश्चमी दिल्ली में आने वाला द्वारका विधानसभा क्षेत्र पश्चिमी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के तहत आता है. द्वारका विधानसभा क्षेत्र में कुल मतदाताओं में अनुसूचित जाति के वोटरों की संख्या 12.64 फीसदी है. 2019 की मतदाता सूची के मुताबिक 193 मतदान केंद्रों पर 212583 वोटर मतदान करेंगे. 2019 के लोकसभा चुनाव में यहां 59.87% मतदान हुए जबकि 2015 के विधानसभा चुनावों में 67.76% मतदान हुए थे. बीजेपी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को क्रमशः 29.91%, 9.29% और 59.08% वोट मिल थे और आम आदमी पार्टी के आदर्श शास्त्री विधानसभा के लिए चुने गए थे.
बता दें कि 2002 में गठित परिसीमन आयोग ने इस क्षेत्र को 2008 में विधानसभा सीट बनाने की सिफारिश की. इस सीट के लिए पहली बार 2008 में हुए चुनाव में कांग्रेस के महाबल मिश्रा ने जीत हासिल की. उन्होंने बीजेपी के प्रद्युम्न राजपूत को शिकस्त दी. हालांकि, 2008 में ही हुए उपचुनाव में प्रद्युम्न ने पिछली हार का बदला लेते हुए चुनाव में जीत दर्ज की. अभी यहां से आम आदमी पार्टी के आदर्श शास्त्री विधायक हैं.
विधानसभा चुनाव 2015
आम आदमी पार्टी-आदर्श शास्त्री- 79,729(59.07%)
भारतीय जनता पार्टी- प्रद्युम्न राजपूत- 40,363(29.90%)
कांग्रेस-महाबल मिश्रा- 12,532 (9.28%)
विधानसभा चुनाव 2013
भारतीय जनता पार्टी- प्रद्युम्न राजपूत- 42,734 (37.30)
आम आदमी पार्टी-रवि कुमार सूर्यान- 37,537 (32.77%)
कांग्रेस-तस्वीर सोलंकी- 23,487 (20.50)
आम आदमी पार्टी के लिए चुनौती
फिलहाल, फरवरी 2020 में होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक एवं मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के समक्ष अपना सबसे मजबूत किला बचाने की प्रबल चुनौती है. द्वारका सीट पर आम आदमी पार्टी के लिए इसलिए भी चुनौती है क्योंकि उसके विधायक आदर्श शास्त्री ने कांग्रेस का हाथ लिया है और यहां त्रिकोणीय मुकाबला होने की संभावना है.
पिछले विधानसभा चुनाव में दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीतने वाले केजरीवाल का जादू इस बार चलेगा या नहीं इस पर पूरे देश की निगाहें हैं. केजरीवाल अपने पांच वर्ष के कार्यकाल के दौरान विशेषकर स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्यों को गिनाते हुए इस बार भी पूरे आत्मविश्वास में हैं.
वर्ष 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले ही ‘AAP’ का गठन हुआ था और उस चुनाव में दिल्ली में पहली बार त्रिकोणीय संघर्ष हुआ जिसमें 15 वर्ष से सत्ता पर काबिज कांग्रेस 70 में से केवल आठ सीटें जीत पाई जबकि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार बनाने से केवल चार कदम दूर अर्थात 32 सीटों पर अटक गई. आम आदमी पार्टी को 28 सीटें मिलीं और शेष दो अन्य के खाते में रहीं.
बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के प्रयास में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया और केजरीवाल ने सरकार बनाई. लोकपाल को लेकर दोनों पार्टियों के बीच ठन गई और केजरीवाल ने 49 दिन पुरानी सरकार से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगा और फरवरी 2015 में आम आदमी पार्टी ने सभी राजनीतिक विश्लेषकों के अनुमानों को झुठलाते हुए 70 में से 67 सीटें जीतीं. भाजपा तीन पर सिमट गई जबकि कांग्रेस की झोली पूरी तरह खाली रह गई.