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बीजेपी के 'साइलेंट वोटरों' को लुभाने में 'साइलेंट' ही बना रहा महागठबंधन

बिहार चुनाव में महिला वोटरों ने निर्णायक भूमिका अदा की है, जिन्हें साधने के लिए महागठबंधन की ओर से न तो प्रियंका गांधी मैदान में उतरीं, न ही राबड़ी देवी और मीसा भारती नजर आईं. वहीं, एनडीए की ओर से केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी अकेले मोर्चा संभाले रखा था. ऐसे में अगर महागठबंधन की ओर से कोई महिला प्रचार अभियान के रण में उतरता तो हो सकता है कि तेजस्वी यादव के अरमानों पर पानी न फिरता. 

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बिहार में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं ने वोट दिए
  • एनडीए की जीत में महिला वोटरों की अहम भूमिका
  • महागठबंधन से महिलाओं को साधने कोई नहीं उतरा

बिहार चुनाव में एनडीए को जीत मिली तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका श्रेय बीजेपी के साइलेंट वोटरों का दिया. पीएम मोदी ने खुद बताया कि ये साइलेंट वोटर कोई और नहीं बल्कि वो महिलाएं थीं जिन्होंने पुरुषों की तुलना में न सिर्फ बढ़-चढ़कर वोट किया बल्कि बीजेपी के पक्ष में वोट किया. बिहार को लेकर तमाम एक्जिट पोल गलत निकलने के पीछे भी एक वजह इन महिला वोटरों को बताया जा रहा है. महत्वपूर्ण बात ये है कि बिहार चुनाव के इन निर्णायक वोटरों से उन्हीं की भाषा में संवाद करने के लिए महागठबंधन के पास न कोई चेहरा था और न ही कोई नारा.


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ये हाल तब है जब महागठबंधन का नेतृत्व कर रहे तेजस्वी यादव की मां राबड़ी देवी खुद राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, वहीं बहन मीसा भारती राज्यसभा से सांसद हैं. दूसरी ओर कांग्रेस में भी सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी जैसी स्टार प्रचारक हैं, जो वोटरों पर असर छोड़ने का माद्दा रखती हैं लेकिन चुनाव प्रचार के नाम पर ये चेहरे 'साइलेंट' ही बने रहे और 'साइलेंट वोटर' एनडीए के खेमे में चला गया.

 महिला वोटरों ने दिलाई एनडीए को जीत

बिहार चुनाव में इस बार 59.9 फीसदी महिलाओं ने वोट किया जबकि 54.7 फीसदी पुरुष मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया. आंकड़े देखें तो 243 में से 119 विधानसभा क्षेत्रों में महिला वोटर भारी संख्या में वोट डालने घरों से निकलीं. बिहार में महिला वोटरों को नीतीश कुमार का पक्का मतदाता माना जाता रहा है. इस बार नीतीश बीजेपी के साथ थे तो ये वोटर और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया. महिलाओं का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी कई योजनाओं पर विश्वास 2019 के लोकसभा चुनाव में भी दिखा था. केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजना, शौचालयों का निर्माण, पक्का घर, मुफ्त राशन, महिलाओं को आर्थिक मदद जैसी कई ऐसी योजनाएं हैं जिनका सीधा लाभ महिलाओं को हुआ. बिहार सरकार द्वारा की गई शराबबंदी के पक्ष में भी बिहार की महिलाएं खड़ी रहीं. 
2010 से ही बिहार में एनडीए ने महिलाओं को लेकर अहम योजनाएं बनाईं. चाहे स्कूली बालिकाओं को मुफ्त साइकिल देने की योजना रही हो या फिर पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण की या फिर स्वसहायता संबंधी योजना के रूप में नीतीश सरकार की चर्चित 'जीविका दीदी' स्कीम. 

शराबबंदी से बदली सियासी तस्वीर

यह भी एक सच्चाई है कि राज्य में महिलाएं नहीं चाहतीं कि शराबबंदी का फैसला सरकारी स्तर पर पलट दिया जाए. वहीं, महागठबंधन नेताओं की ओर दूसरे चरण के चुनाव प्रचार में शराबबंदी को लेकर खूब सवाल खड़े किए गए. नीतीश कुमार ने भी कहा था कि शराब माफिया उन्हें सत्ता से हटाना चाहते हैं कि ताकि शराबबंदी को खत्म किया जाए. इससे महिलाओं में  संदेश गया कि नीतीश सरकार हटते ही यह पाबंदी हटा दी जाएगी. 

इसका सियासी असर यह हुआ कि बिहार चुनाव के दूसरे और तीसरे चरण की वोटिंग में महिलाओं की पुरुषों से ज्यादा वोटिंग रही. इन दोनों चरण में एनडीए को लीड मिली जबकि पहले चरण में महागठबंधन का पलड़ा भारी रहा. पीएम मोदी ने बिहार चुनाव के नतीजों के बाद महिला वोटरों को खास तौर पर धन्यवाद किया. पीएम मोदी ने ट्वीट कर लिखा था, 'बिहार की बहनों-बेटियों ने इस बार रिकॉर्ड संख्या में वोटिंग कर दिखा दिया है कि आत्मनिर्भर बिहार में उनकी भूमिका कितनी बड़ी है. बिहार की मातृशक्ति को नया आत्मविश्वास देने का NDA को अवसर मिला.' पीएम ने कहा कि नारी शक्ति हमारे लिए साइलेंट वोटर हैं, जिन्होंने बिहार में हमारी जीत का आधार बनी. 


पहले चरण में महिला वोटर कम निकलीं

दरअसल, बिहार में जब पहले चरण का मतदान हुआ था, तब 54.4 फीसदी महिलाओं ने वोटिंग की थी. इस आंकड़े को देखकर एनडीए ने और आक्रामक रणनीति बनाई. मोदी से लेकर नीतीश कुमार तक महिलाओं पर ही ज्यादा फोकस रखा. इसके अलावा एनडीए की ओर से केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने प्रचार का मोर्चा संभाल रखा. वे एक दिन में तीन से चार रैलियां संबोधित कर रही थी. अंजाम यह हुआ कि दूसरे चरण के मतदान में 58.8 और तीसरे में 65.5 फीसदी महिलाएं वोट करने के लिए निकलीं. इसका सीधा फायदा एनडीए के पक्ष में गया, क्योंकि महागठबंधन की ओर से महिलाओं को साधने की कोई रणनीति ही नहीं अपनाई गई. 

राबड़ी-मीसा भारती नजर नहीं आईं

आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव जेल में रहने की वजह से तेजस्वी यादव अकेले चुनाव प्रचार की कमान कमान संभाले हुए थे. लालू यादव की पत्नी और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी न तो चुनाव प्रचार नहीं उतरीं और न हीं उनकी बेटी मीसा भारती कहीं नजर आईं. ये हाल तब है जब राबड़ी देवी और मीसा भारती का नाम आरजेडी के स्टार प्रचारकों की लिस्ट में शामिल था. यानी आरजेडी की बात करें तो महिला वोटरों को लुभाने या उनतक पहुंचने के लिए उनके पास कोई चेहरा नहीं था. 

दूसरी ओर कांग्रेस भी इस मामले में फिसड्डी रही. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने 8 रैलियां कीं, लेकिन कांग्रेस के स्टार प्रचारकों में शामिल रहीं महासचिव प्रियंका गांधी बिहार चुनाव में नजर नहीं आईं, जबकि राज्य के कांग्रेस उम्मीदवार प्रियंका गांधी की रैली के लिए लगातार डिमांड कर रहे थे.

लेफ्ट से कविता कृष्णन और वृंदा करात उतरीं

महागठबंधन में शामिल वामपंथी दलों की ओर से पोलितब्यूरो सदस्य कविता कृष्ण. ने चुनाव प्रचार अभियान की कमान संभाल रखी थी. बिहार के सीपीआई (माले) के प्रत्याशी के पक्ष में उन्होंने प्रचार कर महिलाओं को साधने की कवायद की है. इसके अलावा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के वृंदा करात भी बिहार की कई चुनावी सभाओं में नजर आईं. इसके अलावा भी वामपंथी दलों की ओर से कई महिलाएं चुनावी प्रचार में उतरी थी.इसका सियासी फायदा भी वामपंथी दलों को मिला. लेफ्ट ने 29 में से 16 सीटें जीतने में कामयाब रही है. 

वहीं, कांग्रेस की स्टार प्रचारकों में शामिल पूर्व केंद्रीय मंत्री मीरा कुमार भी पूरे चुनाव से गायब रही हैं, हालांकि शुरू में कुछ वर्चुअल रैली में जरूरी दिखीं. इसके अलावा महागठबंधन से कोई भी महिला प्रचार नहीं किया. इसकी असर यह रहा कि महागठबंधन में सबसे कमजोर कड़ी कांग्रेस साबित हुई. वहीं, बीजेपी ने स्मृति ईरानी से एक तरफ प्रचार कराया जबकि केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के जरिए घोषणा जारी कराकर एक बड़ा सियासी संदेश देने की कोशिश की.

 

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