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बिहार चुनाव: लालू की जन्मस्थली से कैसे गायब होता गया RJD का करिश्मा?

लालू यादव ने भले ही बिहार की सारण लोकसभा सीट को अपनी सियासी कर्मभूमि बनाई हो लेकिन उनके जन्मस्थान गोपालगंज जिले की सीटों पर भी लालू का लंबे समय तक दबदबा रहा है. लेकिन अब पिछले कुछ चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि जमीन पर कहानी बदल चुकी है.

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव
स्टोरी हाइलाइट्स
  • गोपालगंज के फुलवरिया में हुआ था लालू का जन्म
  • 3 लोकसभा चुनाव हारी, 6 में एक विधानसभा सीट जीती आरजेडी
  • लालू के साले साधु यादव यहां से रह चुके हैं सांसद

बिहार में बढ़ती चुनावी सरगर्मी के बीच लालू की जन्मस्थली गोपालगंज जिले की सीटों पर सभी दलों की निगाह है. पिछले कुछ चुनाव से यहां बीजेपी और जेडीयू ने अपना गढ़ मजबूत किया है. आरजेडी यहां से पिछले 3 लोकसभा चुनाव हारी है जबकि 6 में से सिर्फ एक विधानसभा सीट पर आरजेडी का अभी कब्जा है.

पिछले चार दशकों से बिहार की सियासत में सबसे बड़े मास लीडर के रूप में स्थापित रहे लालू यादव का जन्म गोपालगंज के फुलवरिया गांव में हुआ था. बहुत ही साधारण परिवार में जन्मे लालू यादव पढ़ाई के लिए अपने भाई के साथ पटना में रहते थे जो पशुपालन विभाग में चौथी श्रेणी की नौकरी कर रहे थे. पटना यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान लालू यादव जेपी मूवमेंट में शामिल हुए और सियासत में आए. 1977 में महज 29 साल की उम्र में लालू यादव ने छपरा सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा. 1990 में लालू बिहार के सीएम बने. इसके बाद 15 साल तक बिहार में लालू-राबड़ी राज रहा.

चारा घोटाले में सजा सुनाए जाने के बाद लालू यादव के चुनाव लड़ने पर 2012 में रोक लग गई. 2015 के चुनाव में नीतीश की जेडीयू के साथ मिलकर लालू की पार्टी आरजेडी ने विधानसभा चुनाव लड़ा और भारी जीत के साथ महागठबंधन की सरकार बनी. लालू के बेटे तेजस्वी यादव डिप्टी सीएम बने और दूसरे बेटे तेजप्रताप स्वास्थ्य मंत्री. हालांकि, जुलाई 2017 में रिश्ते खराब हुए और नीतीश कुमार के बीजेपी के साथ जाने के साथ ही आरजेडी फिर विपक्ष में आ गई.

गोपालगंज जिला लालू का पैतृक इलाका है. हालांकि, लालू यादव बगल की सारण सीट से चुनाव लड़ते रहे हैं. पहली बार जनता दल ने गोपालगंज लोकसभा सीट पर 1989 में खाता खोला. जब राज मंगल मिश्रा को जीत मिली. लालू ने अपनी पार्टी आरजेडी बनाई तो 1991 में अब्दुल गर्फूर जीते. 1996 में आरजेडी के लाल बाबू प्रसाद यादव जीते. इसके बाद दो बार ये सीट समता पार्टी के खाते में गई. लेकिन 2004 में लालू यादव के साले साधु यादव ने यहां से आरजेडी के टिकट पर चुनाव जीता. इसके बाद लालू की इस परंपरागत सीट पर आरजेडी को फिर जीत हासिल नहीं हुई.

पिछले तीन चुनाव से यहां या तो जेडीयू या फिर बीजेपी जीती है. वर्तमान में यहां के सांसद हैं जेडीयू के डॉ. आलोक कुमार सुमन. 2019 के लोकसभा चुनाव में आरजेडी के सुरेन्द्र राम दूसरे नंबर पर रहे थे. उन्हें 2 लाख 87 हजार वोटों की शिकस्त मिली थी.

लालू का गृह क्षेत्र है गोपालगंज

क्या है विधानसभा सीटों का गणित?
गोपालगंज जिले में विधानसभा की 6 सीटे हैं. बैकुंठपुर, बरौली, गोपालगंज, कुचायकोट, भोरे और हथुआ.

बैकुंठपुर विधानसभा सीट- इस सीट पर 2015 के चुनाव में बीजेपी के मिथिलेश तिवारी जीते थे. महागठबंधन से जेडीयू इस सीट पर लड़ी थी और दूसरे नंबर पर रही थी.

बरौली विधानसभा सीट: बरौली से 2015 के चुनाव में आरजेडी के मोहम्मद नेमातुल्ला जीते थे. उन्होंने बीजेपी के राम प्रवेश राय को हराया था.

गोपालगंज विधानसभा सीट: गोपालगंज सीट पर 2015 में बीजेपी के सुभाष सिंह जीते थे जबकि आरजेडी के रेयाजुल हक को शिकस्त मिली थी.

कुचायकोट विधानसभा सीट- 2015 में कुचायकोट सीट से जेडीयू के अमरेंद्र कुमार पांडे जीते थे.

भोरे विधानसभा सीट- 2015 में इस सीट से कांग्रेस के अनिल कुमार जीते थे.

हथुआ विधानसभा सीट: हथुआ सीट से 2015 में जेडीयू के रामसेवक सिंह जीते थे.

क्या है इस बार गोपालगंज की जनता के लिए मुद्दे?
पश्चिमी बिहार के गोपालगंज जिले में कई चुनावी मुद्दों पर लोगों का फोकस है. पिछले कई चुनावों से यहां गंडक की बाढ़, अपराध और गन्ना किसानों के नुकसान और बकाये का मुद्दा चुनावी मुद्दा बनता रहा है. इस बार भी ये तीनों मुद्दे हावी हैं. बाढ़ के हालात कई इलाकों में हैं. कोरोना का संकट और लॉकडाउन में घर लौटे प्रवासी मजदूरों का मुद्दा अलग से है. बाढ़ के कारण गन्ना किसानों के फसल को हुए नुकसान का मामला भी चर्चा का विषय बना हुआ है.

 

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