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ममता बनर्जी के लिए मुश्किल क्यों हो रहे हैं मुस्लिमों और मतुआ से जुड़े सवाल?

ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव में अब तक की सबसे ज्यादा 221 सीटें जीतने का दावा भी किया, लेकिन मतुआ समुदाय और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के चुनाव लड़ने से मुस्लिम वोटबैंक के छिटकने के सवाल पर वो जरूर असहज नजर आईं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है कि मतुआ समुदाय पर ममता बनर्जी बात करने से बच रही हैं और असदुद्दीन ओवैसी को खास तवज्जो नहीं दे रही हैं. 

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बंगाल की सीएम ममता बनर्जी
बंगाल की सीएम ममता बनर्जी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • ममता ने बंगाल में ओवैसी फैक्टर को किया नजरअंदाज
  • मतुआ समुदाय पर ममता बनर्जी क्यों कॉन्फिडेंस नहीं है
  • बंगाल की सियासत में मुस्लिम और मतुआ काफी अहम हैं

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 के ठीक पहले 'इंडिया टुडे कनक्लेव' के मंच पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और बीजेपी पर जमकर हमला बोला. साथ ही उन्होंने विधानसभा चुनाव में अब तक की सबसे ज्यादा 221 सीटें जीतने का दावा भी किया, लेकिन मतुआ समुदाय और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के चुनाव लड़ने से मुस्लिम वोटबैंक के छिटकने के सवाल पर वो जरूर असहज नजर आईं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है कि मतुआ समुदाय पर ममता बनर्जी बात करने से बच रही हैं और असदुद्दीन ओवैसी को खास तवज्जो नहीं दे रही हैं. 

बंगाल की सियासत में लेफ्ट को सत्ता से बाहर करने और ममता बनर्जी की सरकार बनवाने में मतुआ समुदाय और मुस्लिमों की अहम भूमिका रही है. बंगाल के नदिया और उत्तर व दक्षिण 24 परगना जिले की 70 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर मतुआ समुदाय की जबरदस्त पकड़ मानी जाती है. वहीं, बंगाल में 28 फीसदी के करीब मुस्लिम मतदाता हैं. इससे समझा जा सकता है कि विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटर कितने महत्वपूर्ण हैं, यहां की 294 में से 125 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका में हैं. हालांकि, इस बार के चुनाव में मतुआ समुदाय को बीजेपी साधने में जुटी है तो मुस्लिम वोटों पर असदुद्दीन ओवैसी की नजर है.

मतुआ समुदाय के सवाल पर ममता असहज

टीवी टुडे ग्रुप के न्यूज डायरेक्टर राहुल कंवल ने 'इंडिया टुडे कनक्लेव' में मतुआ समुदाय को लेकर ममता बनर्जी से सवाल किया तो वह असहज दिखीं. हालांकि, ममता बनर्जी ने कहा कि मतुआ समुदाय ही नहीं बंगाल में बहुत सारी जाति के लोग रहते हैं और तमाम जातियों के नाम गिना डाले. साथ ही कहा कि मतुआ समुदाय के लिए हमने बहुत काम किया है, लेकिन अब बीजेपी आकर उनके बीच जाति की राजनीति कर रही है. ममता यह संदेश देने की कोशिश करती नजर आईं कि अगर बीजेपी मतुआ समुदाय को अपने साथ जोड़ रही है तो बंगाल की दूसरी जाति के लोग उनके साथ हैं. इसीलिए उन्होंने बनर्जी से लेकर मुखर्जी तक का नाम गिना डाला. 

दरअसल, बंगाल में अभी तक जितने चुनाव हुए हैं, वो वर्ग (क्लास) आधिरित हुआ करते थे, लेकिन पहली बार जाति के पैटर्न पर भी चुनाव होने की संभावना है. बीजेपी बंगाल की तमाम जातियों को साधने के कवायद में है. इसी कड़ी में मतुआ समुदाय जो बंगाल में अनुसूचित जनजाति की आबादी का दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा है, जिसे जोड़ने के लिए बीजेपी हरसंभव कोशिश में जुटी है. बीजेपी नेता मतुआ समुदाय के लोगों के घरों में जाकर भोजन कर रहे हैं और उन्हें सीएए कानून के तहत भारत की नागरिकता दिलाने का वादा भी कर रहे हैं. 

बंगाल में मतुआ समुदाय क्यों अहम

मतुआ समुदाय के लोग बंगलादेश से आकर पश्चिम बंगाल में बसे हैं. सीएए के तहत नागरिकता की मांग मतुआ समुदाय का सबसे अहम मुद्दा है. यही वजह है कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में मुतआ समुदाय की पहली पंसद बीजेपी बनी थी और इन्हीं वोटों के दम पर ही बीजेपी ने 24 परगना इलाके में जबरदस्त जीत हासिल की थी. यही नहीं, मतुआ समुदाय के मंजुल कृष्ण ठाकुर बीजेपी के साथ हैं. 2019 में मंजुल कृष्ण ठाकुर के बेटे शांतनु ठाकुर बीजेपी से सांसद बन गए हैं, जो मतुआ समुदाय का चेहरा माने जाते हैं. 

मतुआ समुदाय का बंगाल की 70 विधानसभा सीटों पर असर हैं, जिनमें नदिया इलाके की 17 विधानसभा हैं और उत्तर व दक्षिण 24 परगना में 64 सीटें हैं. उत्तर 24 परगना इलाके में बीजेपी का चेहरा टीएमसी से आए दिग्गज नेता मुकुल रॉय हैं तो दक्षिण 24 परगना में  शांतनु ठाकुर और टीएमसी से आए शुभेंदु अधिकारी कमान संभाले हुए हैं. साल 2016 के चुनाव में इन दोनों इलाके में टीएमसी ने क्लीन स्वीप किया था, लेकिन इस बार बीजेपी एक बड़ी चुनौती बन गई है. यही वजह है कि ममता बनर्जी मतुआ समुदाय के वोटों को लेकर इस बार पहले की तरह कॉन्फिडेंस नहीं दिख रही हैं. हालांकि, ममता बनर्जी भी मतुआ समुदाय को अपने साथ जोड़े रखने के लिए तमाम जतन कर रही हैं. 

ओवैसी को नजर अंदाज कर रही ममता
वहीं, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का दूसरा सबसे बड़ा वोटबैंक मुस्लिम है, जिस पर हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की नजर है. ओवैसी ने बंगाल की सियासत में अपनी जगह बनाने के लिए फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी के साथ हाथ मिलाया है ताकि मुस्लिम वोटों को एकमुश्त अपने पाले में लाया जा सके. हालांकि, अब्बास सिद्दीकी एक दौर में ममता बनर्जी के समर्थक माने जाते थे, लेकिन अब उन्हीं के खिलाफ चुनावी ताल ठोक रहे हैं. बंगाल की सियासत में 28 फीसदी मुस्लिम काफी अहम माने जा रहे हैं. 

राहुल कंवल ने 'इंडिया टुडे कनक्लेव' में ममता बनर्जी से असदुद्दीन ओवैसी के चुनाव लड़ने पर सवाल किया तो उन्होंने उसे नजर अंदाज कर दिया. ममता ने कहा कि उसका कोई असर नहीं है वो आएं, रहें, खाएं और जाएं. इतना ही नहीं, ममता ने यह भी कहा कि फुरफुरा शरीफ से जुड़े हुए तमाम लोग हमारे साथ हैं. सिर्फ एक ही लड़का है जो उनके साथ है. पिछली बार से ज्यादा मुस्लिम इस बार उनके साथ है. 

बंगाल में मुस्लिम वोट काफी अहम
ममता बनर्जी बंगाल में असदुद्दीन ओवैसी पर कोई जवाब न देकर यह बताना चाहती हैं कि बंगाल की राजनीति में AIMIM के चुनाव लड़ने से उन पर प्रभाव नहीं पड़ने वाला है. यही नहीं ओवैसी को तव्वजो देकर सियासी तौर पर उनके राजनीतिक कद को भी बंगाल में नहीं बढ़ाना चाहती हैं. इसीलिए वह ओवैसी के सवाल को नजर करती दिखीं. इतना ही नहीं, ममता ने कांग्रेस और लेफ्ट गठबंधन को भी बंगाल में बीजेपी को फायदा पहुंचाने वाला करार दिया है. 

दरअसल 2016 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम प्रभाव वाली बंगाल की 125 सीटों में से ममता बनर्जी ने 90 पर जीत हासिल की थी. इससे जाहिर होता है कि  पश्चिम बंगाल में मुस्लिम समुदाय टीएमसी का मजबूत वोटबैंक है. ममता बनर्जी की सत्ता में वापसी इस वोट पर काफी निर्भर करेगी, लेकिन अब इसी वोटबैंक पर असदुद्दीन ओवैसी की नजर है. मुस्लिम बहुल सीटों में से अगर 15-20 पर भी ओवैसी का जादू चल गया तो ममता बनर्जी के मंसूबों पर पानी फिर सकता है. इसीलिए ममता फिलहाल ओवैसी को खास तवज्जो नहीं दे रही हैं ताकि मुस्लिमों के बीच किसी तरह का कोई सियासी संदेश न जा सके. 


 

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