पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) को लेकर सियासी घमासान मचा हुआ है. नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने राज्य में चल रही एसआईआर प्रक्रिया को लेकर गहरी बेचैनी जाहिर की है।.
सेन का कहना है कि एसआईआर की पूरी कवायद अनावश्यक जल्दबाजी में की जा रही है और इससे लोकतांत्रिक भागीदारी को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है, विशेष रूप से ऐसे समय में जब राज्य में कुछ ही महीनों के भीतर विधानसभा चुनाव होने हैं.
उन्होंने कहा कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण अपने आप में लोकतंत्र को मजबूत करने की प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन इसके लिए सावधानी और पर्याप्त समय बेहद जरूरी है. उनके मुताबिक पश्चिम बंगाल में जो हो रहा है, उसमें यही दोनों बातें नजर नहीं आ रही हैं.
सेन ने साफ कहा कि मौजूदा SIR प्रक्रिया इतनी जल्दबाजी में चल रही है कि मताधिकार रखने वाले लोगों को अपने वोट के अधिकार को साबित करने के लिए आवश्यक दस्तावेज जमा करने का पूरा मौका नहीं मिल पा रहा. उन्होंने इसे मतदाताओं के साथ अन्याय और भारतीय लोकतंत्र के लिए अनुचित बताया.
उन्होंने अपने निजी अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि इस प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग के अधिकारियों पर भी समय का भारी दबाव दिखता है. उन्होंने बताया कि जब अधिकारियों ने शांतिनिकेतन स्थित उनके गृह निर्वाचन क्षेत्र से उनके वोट देने के अधिकार पर सवाल उठाया, जहां से वे पहले भी मतदान कर चुके हैं और जहां उनका नाम-पता आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज है. इस दौरान उनसे उनकी दिवंगत मां की उम्र के बारे में पूछताछ की गई, जबकि उनकी मां भी मतदाता थीं और उनकी जानकारी चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में पहले से मौजूद थी.
सेन ने कहा कि दस्तावेजों से जुड़ी ऐसी दिक्कतें असल में उन लाखों भारतीयों की सच्चाई हैं जो ग्रामीण इलाकों में पैदा हुए हैं. उन्होंने बताया कि लाखों ग्रामीणों की तरह उनका जन्म भी गांव में हुआ और इस वजह से उनके पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं था. ऐसे में वोट की पात्रता साबित करने के लिए उन्हें अतिरिक्त कागजात देने पड़े. हालांकि उनका मामला आखिरकार सुलझ गया, लेकिन सेन ने उन नागरिकों को लेकर गहरी चिंता जताई जिनके पास न तो संसाधन हैं और न ही मददगार लोग.
उन्होंने कहा कि वे तो दोस्तों की मदद से इस कठिन प्रक्रिया से निकल पाए, लेकिन बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके पास ऐसे सहायक नहीं होते. जब उनसे पूछा गया कि क्या SIR प्रक्रिया से पश्चिम बंगाल में किसी राजनीतिक दल को फायदा हो सकता है, तो सेन ने कहा कि वे चुनावी गणित के विशेषज्ञ नहीं हैं और निश्चित तौर पर कुछ नहीं कह सकते.
हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि कुछ जानकार लोगों का मानना है कि मतदाताओं की संभावित कटौती से बीजेपी को लाभ मिल सकता है लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि असली सवाल यह नहीं है कि किसे फायदा होगा, बल्कि यह है कि चुनाव आयोग किसी खराब व्यवस्था पर अड़ा न रहे और लोकतंत्र को अनावश्यक गलती करने के लिए मजबूर न करे.
सेन ने एसआईआर से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले तबकों पर बात करते हुए कहा कि गरीब और वंचित वर्ग इस प्रक्रिया में सबसे अधिक नुकसान झेल सकते हैं. उनके मुताबिक जिन दस्तावेजों की मांग की जा रही है, वे समाज के हाशिए पर खड़े लोगों के लिए हासिल करना बेहद मुश्किल होता है और यह दस्तावेज आधारित व्यवस्था स्वभाविक रूप से वर्ग पक्षपाती है.
सेन ने अल्पसंख्यक समुदायों को लेकर भी चिंता जताते हुए कहा कि कई बार अल्पसंख्यकों को अपने बुनियादी अधिकारों, खासकर मतदान अधिकारों को लेकर अतिरिक्त परेशानियों का सामना करना पड़ता है. हाल के वर्षों में मजबूत हुए हिंदुत्ववादी चरमपंथ के कारण भारतीय मुसलमानों को हाशिए पर धकेले जाने की घटनाएं बढ़ी हैं, जबकि कुछ हिंदू समुदाय भी भेदभाव और निशानेबाजी का शिकार हो सकते हैं.
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की यह जिम्मेदारी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि किसी भी वयस्क भारतीय नागरिक को वोट देने के अधिकार से वंचित न किया जाए.