असम में चुनाव से पहले गुवाहाटी में आयोजित पंचायत आजतक असम 2026 में राज्य के बेसिक मुद्दों पर चर्चा जारी है. इस कार्यक्रम में असम के राजनीतिक, सामाजिक मुद्दों और चुनावी रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है और मंच पर सत्ता पक्ष बीजेपी सहित, कांग्रेस और क्षेत्रीय दलो के नेता भी शिरकत कर रहे हैं.
इसी दौरान कार्यक्रम में खास सेशन 'असमिया पहचान... चुनावी घमासान!' में असम इलेक्शन में किस तरह का रुख देखने को मिल सकता है, इस पर चर्चा हुआ. मंच पर भाजपा, कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के नेताओं ने अपने-अपने तर्क रखे और एक-दूसरे पर आरोप भी लगाए.
असमिया पहचान का मुद्दा
इस चर्चा में भाजपा विधायक सिद्धार्थ भट्टाचार्य, कांग्रेस नेता अब्दुल खालिक, असम गण परिषद के नेता अपूर्ब कुमार भट्टाचार्य, और असम जातीय परिषद के नेता जगदीश भुइयां शामिल हुए. इस दौरान एक सवाल के जवाब में भाजपा विधायक सिद्धार्थ भट्टाचार्य ने कहा कि असमिया पहचान का मुद्दा नया नहीं है.
उन्होंने कहा कि 1931 की जनगणना रिपोर्ट में भी यह बात कही गई थी कि बाहरी लोगों के आने से असम के मूल निवासियों की पहचान पर खतरा पैदा हो सकता है. उन्होंने कहा कि अवैध घुसपैठ लंबे समय से राज्य की समस्या रही है और इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने Illegal Migrants (Determination by Tribunals) Act को निरस्त किया था. उनके मुताबिक सरकार सीमा सुरक्षा और अवैध प्रवास को रोकने के लिए लगातार कदम उठा रही है.
कांग्रेस ने उठाया असम समझौते का मुद्दा
कांग्रेस नेता अब्दुल खालिक ने कहा कि असम में पहचान के संकट को सुलझाने के लिए 1979 से 1985 तक चले आंदोलन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में Assam Accord हुआ था. उन्होंने कहा कि इस समझौते के तहत 1971 के बाद आए सभी विदेशियों को बाहर भेजने की बात कही गई थी, चाहे वे किसी भी धर्म के हों. खालिक ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार ने CAA लाकर इस समझौते की मूल भावना को बदल दिया. खालिक ने कहा कि असमिया पहचान धर्म से नहीं बल्कि भाषा, संस्कृति और साझा परंपराओं से बनती है.
वहीं, असम जातीय परिषद के नेता जगदीश भुइयां ने कहा कि असम का पहचान संकट मूल रूप से भाषाई और सांस्कृतिक है, न कि धार्मिक. उन्होंने कहा कि असम समझौते के तहत असमिया लोगों को संवैधानिक सुरक्षा देने के लिए क्लॉज-6 लागू किया जाना था, लेकिन अब तक इसका पूरा क्रियान्वयन नहीं हुआ है. उन्होंने आरोप लगाया कि सीमा सुरक्षा और घुसपैठ रोकने के मुद्दे पर सरकार अपेक्षित कदम नहीं उठा पाई है.
‘असम की सुरक्षा हमारी प्राथमिकता’
असम गण परिषद के नेता अपूर्व कुमार भट्टाचार्य ने कहा कि असम आंदोलन में 800 से अधिक लोगों ने बलिदान दिया था और उनकी भावना राज्य की सुरक्षा से जुड़ी हुई थी. उन्होंने कहा कि असम में रहने वाले सभी समुदायों और मूल निवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है. उन्होंने कहा कि असम की सुरक्षा और असमिया पहचान को बचाने के लिए राज्य सरकार लगातार प्रयास कर रही है. चर्चा के दौरान नेताओं के बीच बेरोजगारी, विकास, उद्योग और राजनीतिक रणनीति जैसे मुद्दों पर भी तीखी नोकझोंक हुई.
कांग्रेस ने राज्य सरकार पर उद्योगपतियों को जमीन देने और बेरोजगारी बढ़ने का आरोप लगाया, जबकि भाजपा नेताओं ने राज्य में विकास परियोजनाओं और निवेश को अपनी उपलब्धि बताया. ‘पंचायत आजतक’ के इस सेशन से ये तो साफ नजर आया कि असम विधानसभा चुनाव से में किस तरह के मुद्दे माहौल बनाने वाले हैं.असमिया पहचान, घुसपैठ और सांस्कृतिक अस्मिता जैसे मुद्दे पॉलिटिकल बहस का हिस्सा बनेंगे.