असम में चुनाव से पहले पंचायत आजतक का आगाज हो गया है. इस कार्यक्रम में असम के राजनीतिक, सामाजिक मुद्दों और चुनावी रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है. इस दौरान खास सेशन 'असम से ऑस्कर' तक में फिल्म निर्माता रीमा दास ने शिरकत की.
रीमा दास ने कहा- असल में भारत में मुझे शहर समझ नहीं आता है. बड़ी गाड़ी-बिल्डिंग में भी वही लोग हैं जो भारत को भारत बनाते हैं , वो गांव के सीधे-सादे लोग ही होती हैं. हम सब कहीं न कहीं गांव से जुड़े हैं.
मैं भी ऐसी ही एक गांव से आती हूं जहां फिल्में देखना ही बड़ी बात थी और फिल्म बनाना तो ऐसा सपना, जो कोई देख भी नहीं सकता था. मेरे पिता-दादाजी का भी ऐसा सपना था कि मैं पढ़-लिखकर नाम करूं लेकिन फिल्म बनाऊंगी ऐसा तो किसी ने नहीं सोचा था.
जब मैं मुंबई ऑडिशन के लिए गई तो लोग पूछते थे कि आप नेपाल से हो कि चीन से हो. तो इन सवालों का भी सामना किया. ऐसा जिक्र करते हुए उन्होंने दिल्ली में हाल में ही हुई घटना की ओर भी इशारा किया कि हमें भी बताना पड़ा कि हम भारत से ही हैं और नॉर्थ ईस्ट से हैं.हम जब मुंबई की एक्टिंग कर रहे थे तो वहां हमें कई फिल्में देखने को मिली. फॉरेन की फिल्में देखीं तो मुझे इस तरह का आर्ट और क्लास का सिनेमा बहुत प्रभावित कर गया.
मेरे पास कोई टेक्निकल नॉलेज नहीं थी, लेकिन जो भी फिल्में देखती थी वो बारीकी से देखती थी. तो मैं कैमरा लेकर गांव चली आई और यहीं अपने लोगों के बीच से शुरू हुई विलेज रॉकस्टॉर्स की कहानी. फिर एक बार जो सिलसिला शुरू हुआ तो चीजें आसानी से होती गईं.इनके अंदर जो इनोसेंस हैं, जो ईमानदारी है, उसकी वजह से यह फिल्म बन पाई और आज इस मुकाम तक पहुंची, कई पुरस्कारों से होते हुए ऑस्कर तक का सफर तय किया और भारत की ओर से ऑफिशियल एंट्री के तौर पर चुनी गई.
फिल्म बनाने को लेकर आने वाली मुश्किलों को लेकर उन्होंने कहा - मैं फिल्मों को पेंटिंग की तरह देखती हूं. सबसे बड़ी समस्या तो क्रू और लाइटिंग की आती थी. रौशनी के लिए मैं सिर्फ सनलाइट पर ही डिपेंड रही. कोई सेट या स्टूडियो न होना भी चैलैंज रहता है. कई बार शॉट के लिए नेचुरल लाइट का वेट करना होता है, कई बार 10-10 दिन लग जाते हैं. मेरी मुश्किलों में नेचर ने ही मेरा साथ दिया.
फिल्मों का समाज पर पड़ने वाले असर पर रीमा दास ने कहा कि, कोई भी अच्छा काम समाज बदलने की शक्ति तो रखता ही. फिल्मों से लोग रिलेट कर पाते हैं. जब लोग रिलेट करते हैं तो उसका मैसेज भी समझते हैं. फिर कहीं न कहीं जीवन में उसे उतारते ही हैं.