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कॉलेज की पढ़ाई बीच में छूटी तो क्या मेहनत बेकार जाएगी? जानिए NEP का नया रूल कैसे काम कर रहा

नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP 2020) में मल्टीपल एंट्री एंड एग्ज‍िट स‍िस्टम (MEES) लाया गया. दावा किया गया कि अब पढ़ाई बीच में छोड़ने पर भी छात्रों को खाली हाथ नहीं लौटाया जाएगा. लेकिन इसकी असली जमीनी हकीकत क्या है? क्या छात्रों को वाकई सर्टिफिकेट-डिप्लोमा मिल रहे हैं या वे अब भी असमंजस में हैं? आइए बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं.

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मान लीजिए आपने कॉलेज में एडमिशन लिया, एक या दो साल पढ़ाई की, लेकिन फिर किसी मजबूरी या पारिवारिक संकट के चलते आपको कॉलेज छोड़ना पड़ा. पुराने सिस्टम में इसका एक ही सीधा मतलब था, कि तब आप 'कॉलेज ड्रॉपआउट' कहलाते और आपकी पुरानी मेहनत पूरी तरह जीरो हो जाती.

इसी दर्द को दूर करने के लिए नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP 2020)यानी नई श‍िक्षा नीति  में मल्टीपल एंट्री एंड एग्ज‍िट स‍िस्टम (MEES) लाया गया. दावा किया गया कि अब पढ़ाई बीच में छोड़ने पर भी छात्रों को खाली हाथ नहीं लौटाया जाएगा. लेकिन इसकी असली जमीनी हकीकत क्या है? क्या छात्रों को वाकई सर्टिफिकेट-डिप्लोमा मिल रहे हैं या वे अब भी असमंजस में हैं? आइए बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं.

नियम क्या है: कब, क्या मिलने का है वादा?
नए 4-Year Undergraduate (FYUGP) सिस्टम के तहत आपकी पढ़ाई के हर साल का एक आउटपुट तय किया गया है. इसके अनुसार ये व्यवस्था की गई है. 

1 साल बाद कॉलेज छोड़ा तो आपको उस विषय का अंडरग्रेजुएट सर्ट‍िफ‍िकेट मिलेगा.
2 साल बाद कॉलेज छोड़ा तो आपको अंडरग्रेजुएट ड‍िप्लोमा दिया जाएगा.
3 साल बाद कॉलेज छोड़ा: आपको पारंपरिक स्नातक डिग्री मिलेगी.
4 साल पूरा किया तो आपको रीसर्च या ऑनर्स के साथ डिग्री मिलेगी.

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इन सारे सालों की पढ़ाई के अंक (Credits) आपके Academic Bank of Credits (ABC) यानी एक तरह के डिजिटल लॉकर में जमा होते रहते हैं, ताकि आप भविष्य में जब चाहें वहीं से पढ़ाई दोबारा शुरू कर सकें.

लेकिन... क्या है इस मॉडल की जमीनी हकीकत?
कागजों पर यह सिस्टम जितना क्रांतिकारी दिखता है, ग्राउंड पर इसकी राह उतनी ही पथरीली है. आज भी देश के कोने-कोने से आ रही रिपोर्ट्स तीन बड़े सवाल खड़े करती हैं. 

क्या सचमुच मिल रहे हैं सर्टिफिकेट?
कई यूनिवर्सिटीज में एडमिनिस्ट्रेटिव देरी और सिस्टम अपडेट न होने के कारण, पहले या दूसरे साल में पढ़ाई छोड़ने वाले छात्रों को समय पर 'सर्टिफिकेट' या 'डिप्लोमा' लेने के लिए कॉलेजों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं.

री-एंट्री का सिरदर्द
मान लीजिए आपने एक कॉलेज से 2 साल पढ़कर 'डिप्लोमा' ले लिया. अब दो साल बाद आप किसी दूसरे शहर या दूसरी यूनिवर्सिटी में सीधे तीसरे साल में एडमिशन (Multiple Entry) लेना चाहते हैं, तो वहां सीटों की उपलब्धता और क्रेडिट मैचिंग का इतना झंझट है कि छात्र परेशान हो रहे हैं.

जागरूकता का भारी अभाव
सबसे कड़वा सच यह है कि टियर-2 और टियर-3 शहरों के कॉलेजों में पढ़ने वाले लाखों छात्रों को आज भी यह नहीं पता कि उनकी एक 'ABC ID' बननी है और वे बीच में सम्मानजनक तरीके से एग्जिट भी ले सकते हैं.

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देखा जाए तो नीति और नीयत के स्तर पर यह बदलाव ऐतिहासिक है, इसमें कोई शक नहीं. लेकिन जब तक हमारे देश की यूनिवर्सिटीज का ढर्रा और एडमिनिस्ट्रेशन एक्ट‍िव नहीं होता तब तक छात्र इसी उलझन में रहेंगे कि 'डिग्री बीच में छोड़ने पर कुछ मिलेगा भी या नहीं.' सिस्टम को सिर्फ कागजों पर डिजिटल करने से काम नहीं चलेगा, उसे ग्राउंड पर भी उतना ही एक्टिव और स्टूडेंट-फ्रेंडली बनाना होगा.

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