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घर की रसोई में मां की जगह पिता बना रहे खाना...केरल की किताब में छपी ऐसी तस्वीर, खूब हो रही तारीफ

सोशल मीडिया पर केरल के एक किताब पर छपी तस्वीर तेजी से वायरल हो रही है. तस्वीर लैंगिक समानता को दर्शाती है, जिसे देखने के बाद हर कोई केरल सरकार की तारीफ कर रहा है.

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Kerela Textbook
Kerela Textbook

जब घर में रसोई की बात आती है तो मां और घर के बाहर नौकरी करके कमाने की बात आती है पिता याद आते हैं. सालों से देश में यही माना जा रहा है की घर की रसोई को संभालने का काम लड़कियों का ही है लेकिन केरल के शिक्षा विभाग ने इस बात को अलग नजरिये से देखा है. केरल की किताब में छपा एक दृश्य सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें रसोई में मां की जगह पिता खाना पका रहे हैं. एक और तस्वीर में मां रसोई में खाना बना रही है तो पिता सब्जी काट रहे हैं. इसके पीछे केरल सरकार का उद्देश्य बचपन में ही बच्चों को लैंगिक समानता (Gender Equality) का पाठ पढ़ाना है.

सोशल मीडिया पर हो रही केरल शिक्षा विभाग की तारीख

सोशल मीडिया पर किताब के इस पन्ने की तस्वीर वायरल हो रही है. हर कोई केरल सरकार की इस पहल की काफी सराहना कर रहा है. एक शख्स ने लिखा कि खाना पकाना और सफाई करना बेसिक लाइफ स्किल हैं, किसी एक जेंडर का काम नहीं है. एक अन्य यूजर ने लिखा कि यह बिल्कुल भी बुरा नहीं है. कम से कम यह समानता का प्रतीक है. एक अन्य उपयोगकर्ता ने टिप्पणी की कि हां, आखिरकार लंबे समय के बाद राज्य सरकार द्वारा एक अच्छा कदम उठाया गया है. एक और अन्य यूजर ने लिखा कि अच्छी पहल... इससे भारत में लैंगिक पूर्वाग्रह के मुद्दों का समाधान हो सकता है.

NCERT से जो टॉपिक हटे वो केरल की किताबों में जुड़े

माता-पिता और छात्र केरल शिक्षा विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर जेंडर समानता वाली इन पाठ्यपुस्तकों को चेक कर सकते हैं. ये पाठ्यपुस्तकें अलग-अलग कक्षा के पाठ्यक्रमों का हिस्सा हैं लेकिन कक्षा 3 में जेंडर समानता पर काफी जोर दिया गया है. पिछले साल, केरल सरकार ने उच्चतर माध्यमिक छात्रों के लिए पूरक पाठ्यपुस्तकें शुरू कीं, जिसमें महात्मा गांधी की हत्या और मुगल साम्राज्य जैसे विषयों को फिर से शामिल किया गया, जिन्हें एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों से हटा दिया गया था. 

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बता दें कि राज्य में जेंडर समानता की पहल सीपीआई (एम) सरकार ने की है. सरकार द्वारा राज्य के कुछ स्कूलों में जेंडर समानता के बारे में पढ़ाया जा रहा है, इसके लिए अलावा स्कूलों में भी जेंडर के हिसाब से किसी भी फर्क नहीं किया जा रहा है. 

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