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UPSC डायरी Part-2: '5 दिन से खाना नहीं मिला, बस पानी पीकर चल रहा हूं...' दिल्ली के तंग कमरों में चस्पा है ये खौफनाक सच

UPSC की तैयारी या जिंदगी की जंग? UPSC की तैयारी सिर्फ लक्ष्मीकांत या स्पेक्ट्रम की किताबों तक सीमित नहीं है. यह हर दिन खाली पेट सोकर, सुबह उठकर फिर से 'नया भारत' बनाने की जिद की परीक्षा है. ये छात्र सिर्फ एक नौकरी नहीं ढूंढ रहे, ये अपने संघर्ष को एक मुकाम देना चाहते हैं. करोल बाग और पटेल नगर के 6/6 के कमरों से निकली वो दास्तां, जिसे पढ़कर आपकी आंखें नम हो जाएंगी.

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राजधानी में रहते हुए UPSC उम्मीदवार इस तरह कर रहे हैं गुजारा. (Photo: ITG)
राजधानी में रहते हुए UPSC उम्मीदवार इस तरह कर रहे हैं गुजारा. (Photo: ITG)

'30 अक्टूबर, सुबह 4:30 बजे... इस टाइम बहुत जोर की भूख लग रही है, क्योंकि पिछले पांच दिन से खाना नहीं मिला. घरवालों को बोल नहीं सकता कि पैसे नहीं हैं और दोस्तों से मदद लेना नहीं चाहता... I Think इस दिवाली मुझे भूखा ही रहना पड़ेगा.' 

ये शब्द किसी काल्पनिक कहानी के नहीं हैं. ये उस दर्द की इबारत हैं जो दिल्ली के एक छोटे से कमरे की दीवार पर 'कागज के टुकड़ों' में चस्पा मिली. ये नोट्स अरुण मिरी जैसे उस यूपीएससी अभ्यर्थी के हैं, जो देश की सबसे कठिन परीक्षा पास करने का सपना लेकर राजधानी आया था, लेकिन उसे क्या पता था कि यहां किताबों से पहले 'भूख' से लड़ना पड़ेगा.

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6/6 का कमरा और 'आसमान' से बड़े सपने

दिल्ली के पटेल नगर या मुखर्जी नगर की गलियों में दाखिल हों, तो आपको ऐसे हजारों कमरे मिलेंगे जहां सूरज की रोशनी भी पहुंचने से कतराती है. अरुण बताते हैं कि कमरा इतना छोटा है कि आप दोनों हाथ भी ठीक से नहीं फैला सकते. इसी घुटन भरी गर्मी और किताबों के ढेर के बीच पलते हैं 'कलेक्टर' बनने के सपने. लेकिन इन सपनों की किराया-वसूली बहुत बेरहम है.

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1000 रुपये और पूरा महीना: गणित जो फेल हो जाता है. मिडिल क्लास घरों से आने वाले इन छात्रों का बजट किसी 'इकोनॉमिक सर्वे' से कम जटिल नहीं है.

घर से आते हैं: 10,000 रुपये.
कमरे का किराया: 7,000 - 8,000 रुपये.
लाइब्रेरी की फीस: 2,000 रुपये.
बचत: मात्र 1,000 रुपये.

यह भी पढ़ें: बात-बात पर छोड़ देते हैं नौकरी, अफसोस भी नहीं... आख‍िर Gen Z कैसा कर‍ियर चाहते हैं 

अब सोचिए, जिस शहर में एक वक्त की थाली 100 रुपये की हो, वहां 1,000 रुपये में पूरा महीना कैसे कटता होगा? यहीं से शुरू होता है 'भूख का उपवास'. छात्र बताते हैं कि वे दिन में सिर्फ एक बार खाते हैं. फल, दूध या पनीर इनके लिए 'लग्जरी' है. जब जेब बिल्कुल खाली हो जाती है, तो ये छात्र शहर में कहीं होने वाले 'भंडारों' की तलाश करते हैं या फिर सिर्फ उबले चने चबाकर रात गुजार देते हैं.

झूठ की चादर और उम्मीदों का बोझ

सबसे ज्यादा तकलीफदेह वो पल होता है जब घर से मां का फोन आता है. 'बेटा खाना खा लिया?' इधर पेट भूख से ऐंठ रहा होता है, आंखों के सामने अंधेरा छा रहा होता है, लेकिन जुबान से सिर्फ एक ही झूठ निकलता है, 'हां मां, पेट भर कर खाया है.. अरुण के पिता मजदूर हैं, किसी के पिता ने कर्ज लिया है तो किसी ने जमीन बेची है. इस उम्मीद के बोझ तले दबा छात्र अपनी 'कमजोरी' नहीं बता पाता. वे दिवाली पर घर नहीं जाते क्योंकि टिकट के पैसे नहीं होते. वे दिवाली के दीयों की रोशनी में नहीं, बल्कि अपने कमरे की उस एक जीरो वाट की लाइट में अपना भविष्य ढूंढते हैं.

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पढ़ें अरुण के ये नोट्स 

28 अप्रैल 04 रात 1.10 बजे 

इस टाइम बहुत जोर से भूख लगी थी, मेरे पास पैसे नहीं हैं और कुछ खाने को भी नहीं है मेरे पास 

30.अक्टूबर, सुबह 4.30 बजे 

इस टाइम बहुत जोर की भूख लग रही है, क्योंकि पिछले पांच दिन से खाना नहीं मिला क्योंकि मेरे पास पैसे नहीं थे. न ही रूम में कुछ ऐसा था कि मैं खा सकूं. इससे मेरे बॉडी में वीकनेस आ गया है. घरवालों को भी बोल नहीं सकता कि पैसे नहीं है और दोस्तों से हेल्प नहीं लेना चाहता, क्योंकि मैं ड‍िपेंड नहीं रहना चाहता. I Think इस दिवाली मुझे भूखा ही रहना पड़ेगा, मॉर्निंग में भूख नहीं लगी थी, लेकिन नाइट में जोरों की भूख लगती है. बस पानी पीकर चल रहा हूं. 

राजधानी में होकर भी 'बेगाने'

इन छात्रों को लगता है कि वे देश की राजधानी में रहते ही नहीं. बिजली की कटौती, पानी की किल्लत और शेयरिंग रूम में रुममेट के साथ तालमेल की जद्दोजहद. अगर एक को रात में पढ़ना है, तो दूसरे की नींद खराब होती है. कोचिंग की लाखों की फीस और फिर भी सफलता की कोई गारंटी नहीं, यह अनिश्चितता मानसिक तनाव को उस स्तर पर ले जाती है जहां से वापसी मुश्किल होती है.

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हार नहीं मानूंगा...

इतनी भीषण गरीबी और संघर्ष के बाद भी ये युवा टूटते नहीं हैं. चाय की थड़ी पर होने वाली चर्चा और दोस्तों का साथ ही इनका 'सपोर्ट सिस्टम' है. अरुण और अनिकेत जैसे हजारों छात्र आज भी उन दीवारों पर चिपके अपने दर्द के साथ जी रहे हैं, इस उम्मीद में कि एक दिन वे इस व्यवस्था को बदलेंगे.

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