कभी भी कुछ फ्री नहीं मिलता है लेकिन अगर वह चीज मिल रही है तो इसकी कीमत चुकानी पड़ती है. ऐसी ही कुछ हो रहा है जर्मनी में. दरअसल, जर्मनी में फ्री में हायर एजुकेशन पाने का सपना हजारों युवाओं का होता है. हर साल हजारों युवा यहां पर पढ़ने जाते हैं. इससे उन्हें ट्यूशन फीस से राहत मिल जाती है. बता दें कि जर्मनी के सरकारी स्कूल में ट्यूशन फीस नहीं लगता है लेकिन अब इसकी कीमत भारतीय छात्रों को चुकानी पड़ रही है क्योंकि भारतीयों के साथ शोषण के मामले सामने आ रहे हैं.
मीडियम पोर्टल की रिपोर्ट के मुताबिक, ज्यादातर वही छात्र शोषण का शिकार बन रहे हैं, जो प्राइवेट या कम फेमस यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे हैं.
भारतीयों के साथ हो रहा है शोषण
इसे लेकर जर्मनी में काम करने वाले टेक वर्कर जैम कामरथ ने मीडियम पोर्टल पर एक आर्टिकल लिखा है जिसमें उन्होंने इस बात का जिक्र किया है. उन्होंने बताया कि जर्मनी में किस तरह से भारतीयों का शोषण किया जा रहा है. उन्होंने आगे बताया कि भारतीय छात्र वैसे तो यहां पर सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग, एआई, डेटा एनालिटिक्स समेत इस तरह के कोर्स करने के लिए आते हैं लेकिन आप उन्हें यहां पर उबर ईट्स, लीफ्रांडो या वोल्ट पर खाना डिलीवर करते हुए देखेंगे. इसलिए नहीं कि उन्हें अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं बल्कि उन यूनिवर्सिटी की भारी-भरकम फीस भरने के लिए इतनी मेहनत करनी होती है.
क्या है वहां पर प्राइवेट यूनिवर्सिटी का हाल?
जैम कामरथ ने इस आर्टिकल के जरिए बताया कि प्राइवेट यूनिवर्सिटीज में फैंसी डिग्रियों की वजह से भारतीय छात्रों पर कर्ज बढ़ता जा रहा है क्योंकि वहां की फीस ज्यादा है. इसके लिए वह डिलीवरी जैसे काम करते हैं. वैसे तो ना ही संदिग्ध यूनिवर्सिटीज और न ही इन शोषणकारी डिलीवरी सर्विसेज को जर्मनी में ऑपरेट करने की अनुमति नहीं है.
डिग्री की नहीं होती है मान्यता
उन्होंने इस आर्टिकल के जरिए ऐसी बात का खुलासा किया है जिसे सुनने के बाद लोग हैरान हैं. उन्होंने यूनिवर्सिटी की प्लानिंग के बारे में खुलकर बात की है. जैम ने बताया कि पहले वो एक संगठन को स्थापित करते हैं फिर विदेशी छात्रों को आर्कषित करने का काम करते हैं. इसके बाद उनसे मोटी फीस वसूलते हैं और कोर्स खत्म होने के बाद एक डिप्लोमा डिग्री पकड़ा देते हैं. उनमें से जो छात्र भाग्यशाली होते हैं उनकी डिग्री को राज्य की मान्यता मिल जाती है वरना अधिकतर मामलों में कई प्राइवेट यूनिवर्सिटीज के डिप्लोमा यूरोपीय संघ के किसी भी देश द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं होते हैं. इस तरह की डिग्री को डिप्लोमा के नाम से जाने जाते हैं जिसकी कोई वैल्यू नहीं होती है.
नहीं बोलते हैं यूनिवर्सिटी शब्द
जैम ने बताया कि जर्मनी में अगर कोई संस्थान यूनिवर्सिटी शब्द का इस्तेमाल करती है तो उसे राज्य लेवल से मंजूरी लेना अनिवार्य है. यहीं कारण हैं कि प्राइवेट संस्थान बिजनेस स्कूल नाम का यूज करते हैं या किसी ऐसी जगह से ऑपरेट करते हैं, जहां उन्हें मंजूरी मिल जाए.
कमीशन के आधार पर होता है काम
जैम ने आगे बताया कि ये यूनिवर्सिटीज भारतीय छात्रों को फंसाने के लिए विदेशी एजेंसियों के साथ कमीशन पर काम करते हैं. वह एड करते हैं कि उन्हें अच्छी सैलरी और जॉब के वादे किए जाते हैं. यहां की आर्थिक हालात ठीक नहीं है.
बढ़ चुकी है महंगाई
जर्मनी में प्राइवेट यूनिवर्सिटी की फीस बहुत ज्यादा है. इसके साथ ही यहां पर महंगाई भी बढ़ गई है. रहने और खाने की कीमतें आसमान छू रही हैं जिसकी वजह से छात्रों को एक्ट्रा पैसों के काम करना पड़ रहा है.