देश की राजधानी दिल्ली, जहां देश के कोने-कोने से युवा अपने सपनों को पूरा करने क लिए आते हैं. खासकर UPSC सिविल सर्विस की तैयारी के लिए. करोल बाग, पटेल नगर और मुखर्जी नगर जैसे इलाकों में हर गली, हर मकान में आपको ऐसे ही सपनों से भरे चेहरे मिल जाएंगे. लेकिन इन सपनों की कीमत बहुत भारी होती है... इतनी भारी कि कई बार जिंदगी ही बोझ लगने लगती है. दिल्ली में UPSC की तैयारी करना मिडिल क्लास युवाओं के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है. सीमित आय वाले परिवारों से आने वाले ये छात्र बड़े सपनों के साथ राजधानी आते हैं, लेकिन यहां का महंगा जीवन उनकी उम्मीदों पर भारी पड़ता है.
इन छात्रों को हर महीने घर से मुश्किल से 10,000 रुपये आते हैं. इसी में उन्हें किराया, लाइब्रेरी, खाना, बिजली-पानी सब कुछ संभालना होता है. पटेल नगर में रहने वाले UPSC के उम्मीदवार अरुण मिरी बताते हैं कि 7,000 रुपये तो सिर्फ कमरे के किराए में चले जाते हैं. 2,000 रुपये लाइब्रेरी की फीस में खर्च हो जाते हैं, क्योंकि पढ़ाई के लिए एक शांत जगह जरूरी है. अब पूरे महीने के लिए उनके पास सिर्फ 1,000 रुपये बचते हैं जिसमें खाना, किताबों और बाकी जरूरतों को भी पूरा करना होता है. अरुण बताते हैं कि उन्हें दिन में सिर्फ एक या दो बार ही खाना पड़ता है, ताकि खर्च कंट्रोल में रहे.
सोचिए, 1,000 रुपये में एक महीने का गुजारा… यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि रोज की जंग है. कई बार उन्हें दिन में एक या दो बार ही खाना पड़ता है, ताकि पैसे खत्म न हो जाएं. फल, दूध या प्रोटीन जैसी चीजें उनके लिए किसी लग्जरी से कम नहीं.
कुछ छात्र बताते हैं कि वे भंडारों पर निर्भर रहते हैं, जहां कहीं खाना मिल जाए, वहीं पेट भर लेते हैं. कई अपने पास चने रखते हैं, ताकि कम से कम कुछ पोषण मिल सके. यह मजबूरी है, आदत नहीं.
लेकिन संघर्ष सिर्फ पैसों का नहीं है
घर से दूर रहना, परिवार की याद, और उन उम्मीदों का बोझ जो मां-बाप ने कर्ज लेकर या अपनी बचत तोड़कर बच्चों को पढ़ाया है. यह सब मिलकर एक अलग ही दबाव बनाते हैं. कई बार जब घर से फोन आता है, तो ये छात्र सच नहीं बता पाते. वे झूठ बोलते हैं कि हां, हमने खाना खा लिया… जबकि हकीकत कुछ और होती है. परिवार से दूर रहना भी एक बड़ी चुनौती होती है. कई बार आर्थिक तंगी के कारण छात्र घर भी नहीं जा पाते. त्योहारों और खास मौकों पर भी वे अकेले ही अपने कमरे में पढ़ाई करते रहते हैं. अरुण मिरी के पिता मजदूर हैं. वहीं, अनिकेत के पिता व्यापारी हैं. वे बताते हैं कि परिवार से दूर रहना थोड़ा कठिन है.

रहने की स्थिति भी किसी परीक्षा से कम नहीं. छोटे-छोटे कमरे, जहां गर्मियों में रहना मुश्किल हो जाता है. न ठीक से पानी मिलता है, न बिजली की स्थिर व्यवस्था. शेयरिंग रूम में रहना और भी कठिन हो जाता है, किसी की पढ़ाई का समय रात में, तो किसी का दिन में. एक की लाइट दूसरे की नींद खराब कर देती है.
नहीं मिल रहा सही पोषण
बातचीत के दौरान कई छात्र बताते हैं कि मेस का खाना न तो पौष्टिक होता है और न ही स्वादिष्ट. मजबूरी में उन्हें वही खाना पड़ता है, जिससे उनकी सेहत पर असर पड़ता है. कम बजट के कारण फल, दूध या प्रोटीन युक्त चीजें खरीद पाना उनके लिए मुश्किल हो जाता है. वहीं, कई कहते हैं कि महीनों तक वे धार्मिक आयोजनों के दौरान जैसे भंडारा पर निर्भर रहते हैं. वह बताते हैं कि यहां पर अलग-अलग जगहों पर हर रोज भंडारों का आयोजन किया जाता है, जिससे वह खाना खा लेते हैं या कभी अगर कोई घर से आता है, तो उनके लिए राशन लेकर आता है. जब उनसे पूछा गया कि पोषण के लिए वे क्या करते हैं, तो छात्रों ने बताया कि वह चने रखते हैं क्योंकि महंगाई और घर से आ रहे सीमित पैसों के चलते उनके लिए फल खरीद पाना मुमकिन नहीं है.
फिर आता है कोचिंग का बोझ
UPSC की तैयारी में सही मार्गदर्शन बहुत जरूरी होता है, लेकिन अच्छी कोचिंग की फीस लाखों में होती है. ऐसे में कई छात्र लोन लेते हैं या परिवार की सारी जमा पूंजी लगा देते हैं. फिर भी सफलता की कोई गारंटी नहीं होती. यही अनिश्चितता उनके तनाव को और बढ़ा देती है. इतनी मुश्किलों के बीच भी एक चीज उन्हें टूटने नहीं देता वह है दोस्त और परिवार का साथ. चाय की छोटी-छोटी दुकानों पर बैठकर चर्चा करना, नोट्स शेयर करना, एक-दूसरे को समझाना यह सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि जीने का सहारा है. कभी-कभी यही पल उन्हें हिम्मत देते हैं कि वे हार न मानें.
लगता है हम राजधानी में रहते ही नहीं...
बातचीत के दौरान छात्रों ने कहा कि मानों वे राजधानी में रहते ही नहीं हैं. ऐसे इसलिए क्योंकि दिल्ली के कई इलाकों में जहां छात्र रहते हैं, वहां पानी और बिजली की समस्या भी आम है. कई बार पानी की सप्लाई सीमित होती है, जिससे रोजमर्रा के काम प्रभावित होते हैं. 3-4 दिन तक पानी नहीं आता है. वहीं, बिजली कटौती या ज्यादा बिल भी छात्रों के बजट को बिगाड़ देता है.
छोटे कमरों में गर्मी के मौसम में रहना बेहद मुश्किल हो जाता है, लेकिन एयर कंडीशनर जैसी सुविधाएं उनके बजट से बाहर होती हैं. वे कहते हैं कि इतने छोटे-छोटे रूम के लिए 7 से 8 हजार रुपये रेंट देना होता है जिसमें कोई सुविधा नहीं होती. रूम इतना छोटा होता है कि वे छात्र अपने दोनों हाथ भी नहीं खोल सकते हैं. इस दौरान जब उनसे पूछा गया कि सिंगल रूम या शेयरिंग किसमें रहना ज्यादा बेहतर होता हैं, तो उन्होंने जवाब दिया कि जो छात्र ठीक आय वाले घर से आते हैं वह सिंगल रूम ही लेते हैं.
लेकिन हमारे घर से सीमित पैसों की वजह से शेयरिंग रूम लेना होता है, जिससे पढ़ाई में भी बाधा आती है. अरुण और अनिकेत बताते हैं कि शेयरिंग रूम में सबसे बड़ी दिक्कत होती है टाइमिंग की. मान लेते हैं कि कोई उम्मीदवार रात में पढ़ता है और सुबह सोता है, तो साथ रह रहे रुममेट को दिक्कत होती है. उसी तरह दूसरा दिन में पढ़ता है, तो रात वाले छात्र को परेशानी होती है.
फिर भी हंसते हैं छात्र
अरुण और अनिकेत जैसे हजारों छात्र हर दिन इन परिस्थितियों से जूझते हैं. कई बार उन्हें लगता है कि सब छोड़ दें, लेकिन फिर परिवार की उम्मीदें उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देती है. सच तो यह है कि UPSC की तैयारी सिर्फ किताबों की नहीं होती, यह जिंदगी की भी परीक्षा होती है. यहां हर दिन धैर्य, संघर्ष और आत्मविश्वास का इम्तिहान होता है.
फिर भी, इन तंग कमरों में रहने वाले ये युवा मुस्कुराते हैं… क्योंकि उन्हें पता है कि उनके सपने उनसे बड़े हैं. वे सिर्फ एक नौकरी नहीं चाहते, बल्कि एक ऐसा मुकाम चाहते हैं जहां से वे समाज में बदलाव ला सकें. यह कहानी सिर्फ अरुण और अनिकेत की नहीं है… यह उन हजारों युवाओं की कहानी है, जो अपने आज को कुर्बान कर, एक बेहतर कल की नींव रख रहे हैं.
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