अगर कॉलेज की बात करें तो यह सिर्फ लेक्चर और एग्जाम की जगह नहीं है. वहां बिताए तीन या चार साल आपके अपने कैरेक्टर, पर्सनैलिटी, नजरिए और प्रोफेशनल फ्यूचर को निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाते हैं. विभिन्न सोशल स्कीम्स या प्रोग्राम्स में वॉलंटियर बनना क्लासरूम से बाहर अपने सीखने के मौकों को विस्तार देने का बेहतरीन तरीका है.
श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) में कम्युनिटी आउटरीच प्रोग्राम को इनैक्टस संचालित करता है जिसकी शुरुआत 2007 में हुई थी. अभी तक हमने पूरे एनसीआर में 10 प्रोजेक्ट चलाए हैं और दो अन्य पर काम चल रहा है. इनैक्टस के इंचार्ज टीचर होने के नाते मुझे यह देखने का पर्याप्त मौका मिला है कि प्रोजेक्ट्स किस तरह से हमारे स्टुडेंट्स के जीवन पर असर डालते हैं.
फिलहाल चल रहा ऐसा ही एक प्रोजेक्ट ‘‘प्रोजेक्ट अजमत’’ है. इसका उद्देश्य हाथ से मैला ढोने वाले लोगों को जीविका के वैकल्पिक साधन मुहैया कराकर उनका पुनर्वास करना है. हम फिलहाल गाजियाबाद के बाहरी इलाके में स्थित नेकपुर गांव में 20 मैला ढोने वाली महिलाओं के साथ काम कर रहे हैं. जिनको केमिसिंथ ग्रुप ने डिटर्जेंट बनाने की प्रोफेशनल ट्रेनिंग दी गई है और अब वह नेकी ब्रांड नाम से खुद ही डिटर्जेंट का उत्पादन कर रही हैं. इसके अलावा इन महिलाओं को संगठित कर एक सहकारी समिति भी बनाई गई है ताकि उनका कारोबार सुचारू ढंग से चलता रहे और वे संसाधनों का बेहतर प्रबंधन कर सकें.
हमारा दूसरा प्रोजेक्ट ‘‘कायाकल्प’’ है जिसका उद्देश्य परंपरागत तौर से कठपुतली नृत्य दिखाने वालों को सशक्त बनाना और उनकी आमदनी की संभावनाएं बढ़ाना है. यह कार्य उनकी कला को कंटेम्पररी ऑडिएंस तक पहुंचाकर और अनछुए बाजार का फायदा उठाकर किया जाता है.
यह प्रोजेक्ट पश्चिमी दिल्ली के शादीपुर डिपो के पास स्थित झुग्गी बस्ती कठपुतली कॉलोनी में केंद्रित है. फरवरी, 2012 में कायाकल्प चार कठपुतली वालों के साथ शुरू हुआ था जिन्हें इंटरनेशनल स्तर पर प्रख्यात कठपुतली थिएटर संगठन कटकथा में एक महीने की इंटर्नशिप करने का मौका मिला. अप्रैल, 2013 में हमने यूएनआइएमए से कोलैबोरेशन किया और दिल्ली के कई स्कूलों में ‘‘सूत्रधार’’ नाम से एक हफ्ते तक कठपुतली फेस्टिवल का आयोजन किया गया.
ऐसी रचनात्मक गतिविधियों का हिस्सा बनने से स्टुडेंट को विभिन्न समुदायों के लोगों से इंटरैक्ट करने का मौका मिलता है और लांग टर्म के लिहाज से देखें तो इससे उनके लिए रोजगार के मौके बढ़ते हैं. इसके अलावा आपके रेज्यूमे में वॉलंटियरिंग का एक्सपीरिएंस होने से यह पता चलता है कि आप मल्टी-टास्किंग, नेटवर्किंग और ब्रेनस्टॉर्मिंग में अच्छे हैं.
कॉलेजों में ज्यादातर सोशल रीच प्रोग्राम की योजना बनाने और उसे लागू करने का काम स्टुडेंट्स ही करते हैं, इसलिए इससे संभावित एम्प्लॉयर को यह अंदाजा हो जाता है कि आपके अंदर लीडरशिप और टीम बिल्डिंग स्किल है.
इसलिए मैं जोर देकर यह सुझाव देना चाहता हूं कि आप ऐसे किसी कार्य में वॉलंटियर के रूप में अपना थोड़ा समय जरूर लगाएं, जिसके बारे में आपकी प्रबल भावना हो, इसका रिवॉर्ड आपको जरूर मिलेगा.
(लेखक श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में प्रोफेसर हैं.)