scorecardresearch
 

चुनाव जीत गया गौरी लंकेश मर्डर केस का आरोपी श्रीकांत पांगारकर, जानिए साजिश में क्या थी उसकी भूमिका

गौरी लंकेश हत्याकांड के आरोपी श्रीकांत पांगारकर का नाम अचानक सुर्खियों में आ गया है. वजह है उसका निकाय चुनाव जीतना. पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या की साजिश में उसकी भूमिका, SIT जांच, गिरफ्तारी, जमानत और राजनीतिक एंट्री से जुड़ी पूरी कहानी.

Advertisement
X
चुनावी जीत से श्रीकांत पांगारकर का नाम फिर चर्चाओं में आ गया (फोटो-ITG)
चुनावी जीत से श्रीकांत पांगारकर का नाम फिर चर्चाओं में आ गया (फोटो-ITG)

महाराष्ट्र के जालना नगर निगम चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल करने वाले श्रीकांत पांगारकर का नाम एक बार फिर चर्चाओं में है. ये वही पांगारकर है, जो पत्रकार गौरी लंकेश हत्याकांड में आरोपी रहा है. चुनाव जीतने के बाद उसने समर्थकों के साथ सार्वजनिक रूप से जश्न मनाया, जिसकी तस्वीरें और वीडियो सामने आते ही तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं. विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे न्यायिक प्रक्रिया का मज़ाक बताया है. खास बात यह है कि पांगारकर का नाम एक ऐसे हत्याकांड से जुड़ा रहा है, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था. 

कौन है श्रीकांत पांगारकर?
श्रीकांत पांगारकर महाराष्ट्र के जालना जिले का निवासी है और उसका नाम कट्टरपंथी नेटवर्क से जुड़े मामलों में सामने आता रहा है. अगस्त 2018 में महाराष्ट्र एटीएस ने उसे कच्चे बम और हथियार बरामदगी के मामले में गिरफ्तार किया था. उस पर विस्फोटक अधिनियम, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और यूएपीए जैसी गंभीर धाराओं में केस दर्ज हुआ. जांच एजेंसियों के मुताबिक, पांगारकर वैचारिक रूप से उन लोगों के संपर्क में था, जिन पर गौरी लंकेश की हत्या की साजिश रचने का आरोप है. इसी नेटवर्क के कारण उसका नाम गौरी लंकेश हत्याकांड की चार्जशीट में आया.

गौरी लंकेश मर्डर केस में पांगारकर की भूमिका
एसआईटी की जांच में सामने आया कि गौरी लंकेश की हत्या किसी एक व्यक्ति का फैसला नहीं थी, बल्कि एक संगठित साजिश का हिस्सा थी. श्रीकांत पांगारकर पर आरोप है कि वह उन वैचारिक और लॉजिस्टिक सपोर्ट देने वालों में शामिल था, जिन्होंने हत्यारों को सुरक्षित ठिकाने, संसाधन और संपर्क उपलब्ध कराए. जांच में यह भी सामने आया कि हत्या से पहले और बाद में नेटवर्क के लोग लगातार संपर्क में थे. हालांकि पांगारकर पर सीधे गोली चलाने का आरोप नहीं है, लेकिन साजिश का हिस्सा होने के कारण उसे आरोपी बनाया गया.

Advertisement

5 सितंबर 2017: गौरी की हत्या
उसी शाम बेंगलुरु के राजराजेश्वरी नगर इलाके में गौरी लंकेश की उनके घर के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. हमलावरों ने बेहद नजदीक से फायरिंग की, जिसमें उनके सीने में दो और सिर में एक गोली लगी. मौके पर ही उनकी मौत हो गई थी. यह हत्या सिर्फ एक पत्रकार की नहीं थी, बल्कि असहमति और स्वतंत्र विचार की आवाज़ को दबाने की कोशिश मानी गई. देशभर में इस हत्याकांड के खिलाफ आक्रोश फैल गया था.

जांच के लिए SIT का गठन
हत्या के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए और एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया. अतिरिक्त पुलिस आयुक्त बी.के. सिंह और डीसीपी एम.एन. अनुचेत को जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई. शुरुआती महीनों में SIT को कोई ठोस सुराग नहीं मिला. लाखों कॉल डिटेल्स खंगाली गईं, हजारों संदिग्धों से पूछताछ हुई, लेकिन मामला अंधेरे में भटकता रहा. यह जांच एजेंसियों के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण दौर था.

फरवरी 2018 में मिला था पहला सुराग
उस वक्त नवीन कुमार उर्फ हॉटी मंजा की गिरफ्तारी के बाद केस ने रफ्तार पकड़ी. पूछताछ में उसने हत्यारों को मदद देने की बात कबूल की. इसके बाद SIT तीन महीने की कड़ी मेहनत के बाद मुख्य शूटर परशुराम वाघमारे तक पहुंची. वाघमारे की गिरफ्तारी ने पूरे नेटवर्क की परतें खोल दीं और यहीं से पांगारकर जैसे नाम जांच के दायरे में आए.

Advertisement

कट्टरपंथी नेटवर्क की साजिश
जांच में सामने आया कि वाघमारे के संबंध कट्टरपंथी संगठनों और वैचारिक समूहों से थे. पुलिस के मुताबिक, आरोपियों को ब्रेनवॉश कर हत्या के लिए तैयार किया गया था. उन्हें ऐसे रास्तों से गौरी के घर तक पहुंचाया गया, जहां सीसीटीवी कैमरे नहीं थे. हत्या के बाद सभी आरोपी तुरंत शहर छोड़कर फरार हो गए थे. यह पूरी साजिश बेहद योजनाबद्ध थी, जिसमें सहयोगियों की अहम भूमिका थी.

महाराष्ट्र कनेक्शन और पांगारकर की गिरफ्तारी
जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, हत्याकांड के तार महाराष्ट्र से जुड़ गए. दाभोलकर और पनसारे हत्याकांड से भी समानता सामने आई. इसी कड़ी में अगस्त 2018 में महाराष्ट्र एटीएस ने श्रीकांत पांगारकर को गिरफ्तार किया. उसके पास से कच्चे बम और हथियार मिलने का दावा किया गया. जांच एजेंसियों का मानना था कि वह उस नेटवर्क का हिस्सा था, जो वैचारिक और लॉजिस्टिक सपोर्ट देता था.

पांगारकर को मिली जमानत
4 सितंबर 2024 को कर्नाटक हाई कोर्ट ने श्रीकांत पांगारकर को गौरी लंकेश मर्डर केस में जमानत दे दी. कोर्ट ने यह साफ किया कि जमानत का मतलब दोषमुक्ति नहीं है और ट्रायल जारी रहेगा. जमानत के बाद पांगारकर की सार्वजनिक गतिविधियां बढ़ गईं, जिसने पीड़ित परिवार और नागरिक समाज की चिंताओं को और गहरा कर दिया.

Advertisement

राजनीति में एंट्री
नवंबर 2024 में पांगारकर विधानसभा चुनावों से पहले शिवसेना में शामिल हुआ, लेकिन भारी विरोध के चलते मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने उसके औपचारिक प्रवेश को स्थगित कर दिया. इसके बाद उसने अब जालना नगर निगम चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ा और जीत दर्ज की. यह जीत बताती है कि आपराधिक मामलों के बावजूद राजनीति में रास्ते खुले हुए होते हैं.

चुनावी जीत के बाद उठे सवाल
पांगारकर की जीत के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या न्यायिक प्रक्रिया और राजनीतिक नैतिकता के बीच कोई संतुलन बचा है. एक ओर गौरी लंकेश की हत्या का मामला अभी भी अदालत में है, दूसरी ओर आरोपी लोकतांत्रिक संस्थाओं का हिस्सा बन रहा है. यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय मानी जा रही है.

पत्रकार गौरी लंकेश की कहानी
गौरी लंकेश का जन्म 29 जनवरी 1962 को हुआ था. वे प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार पी. लंकेश की बेटी थीं. उन्होंने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ से करियर शुरू किया और बाद में कन्नड़ पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान बनाई. सत्ता और कट्टरपंथ के खिलाफ बेबाक लेखन के कारण वे लगातार धमकियों का सामना कर रही थीं, लेकिन उन्होंने कभी समझौता नहीं किया.

हत्या से पहले धमकियां
गौरी लंकेश ने अपनी हत्या से पहले पुलिस अधिकारियों को अपनी जान को खतरा होने की बात बताई थी. वे सोशल मीडिया पर भी सक्रिय थीं और फेक न्यूज के खिलाफ लगातार लिखती थीं. हत्या से कुछ घंटे पहले किया गया उनका आखिरी ट्वीट आज भी उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता की याद दिलाता है. यह साफ करता है कि उनकी हत्या किसी अचानक गुस्से का नतीजा नहीं थी. बल्कि एक सोची समझी साजिश थी.

Advertisement

अधूरा इंसाफ
श्रीकांत पांगारकर की चुनावी जीत ने यह सवाल और गहरा कर दिया है कि क्या गौरी लंकेश को अब भी पूरा इंसाफ मिल पाएगा. जांच एजेंसियों ने भले ही साजिश की कई परतें खोली हों, लेकिन ट्रायल और सजा का रास्ता अभी बाकी है. गौरी की हत्या सिर्फ एक अपराध नहीं था, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला था. ऐसे में आरोपी का राजनीतिक रूप से मजबूत होना, इस केस को और भी संवेदनशील बना रहा है.
 

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement