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थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को HIV संक्रमित खून चढ़ाने के मामले में 6 महीने बाद एक्शन, सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल

झारखंड के पश्चिम सिंहभूम में थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को एचआईवी संक्रमित खून चढ़ाने के मामले में 6 महीने बाद आरोपी की गिरफ्तारी हुई है. लेकिन इस मैामले में कार्रवाई किए जाने में हुई देरी ने सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. जानें पूरी कहानी.

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इस लापरवाही ने कई बच्चों की जिंदगी खतरे में डाल दी (फोटो-ITG)
इस लापरवाही ने कई बच्चों की जिंदगी खतरे में डाल दी (फोटो-ITG)

झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले से एक बेहद चिंताजनक और झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जहां थैलेसीमिया से पीड़ित मासूम बच्चों को एचआईवी संक्रमित खून चढ़ा दिया गया. इस गंभीर लापरवाही के मामले में 6 महीने तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई और अब जाकर पुलिस ने आरोपी लैब तकनीशियन को गिरफ्तार किया है. इस देरी ने न सिर्फ स्वास्थ्य व्यवस्था बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.

यह पूरा मामला 17 अक्टूबर 2025 का है, जब पश्चिम सिंहभूम जिले के सदर अस्पताल में इलाज के दौरान पांच थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को संक्रमित रक्त चढ़ा दिया गया था. कुछ समय बाद जब बच्चों की तबीयत बिगड़ी और जांच हुई, तो एचआईवी संक्रमण का खुलासा हुआ. इस घटना ने पूरे स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मचा दिया. मासूम बच्चों की जिंदगी के साथ हुई इस गंभीर लापरवाही ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया था. लेकिन शुरुआती शोर-शराबे के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया.

घटना सामने आने के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई बेहद धीमी रही. पूरे 6 महीने तक आरोपी लैब तकनीशियन मनोज कुमार खुलेआम घूमता रहा. इस दौरान पीड़ित परिवार लगातार न्याय की गुहार लगाते रहे, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हुई. स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे. परिजनों का कहना है कि अगर समय रहते कार्रवाई होती, तो शायद उन्हें इतनी लंबी लड़ाई नहीं लड़नी पड़ती.

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जब प्रशासन से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो पीड़ित परिवारों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया. झारखंड हाईकोर्ट में मामला पहुंचने के बाद कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया और गिरफ्तारी वारंट जारी किया. इसके बाद ही पुलिस हरकत में आई और आरोपी लैब तकनीशियन मनोज कुमार को गिरफ्तार किया गया. यह गिरफ्तारी सीधे तौर पर न्यायिक हस्तक्षेप का परिणाम मानी जा रही है, जिसने प्रशासन को मजबूर किया.

प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि रक्त की जांच और स्क्रीनिंग प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही बरती गई. अस्पताल में खून चढ़ाने से पहले आवश्यक जांच नहीं की गई, जो कि एक अनिवार्य प्रक्रिया होती है. अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह चूक सिर्फ एक व्यक्ति की थी या फिर इसमें और लोग भी शामिल थे. इतने लंबे समय तक कार्रवाई न होना भी किसी बड़ी गड़बड़ी की ओर इशारा करता है.

पीड़ित बच्चों के परिवारों में भारी आक्रोश है. उनका कहना है कि उन्हें 6 महीने तक न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ा. इस दौरान न तो प्रशासन ने उनकी सुध ली और न ही स्वास्थ्य विभाग ने कोई ठोस कदम उठाया. अब जब गिरफ्तारी हुई है, तब भी परिवारों के मन में यह सवाल है कि आखिर इस देरी का जिम्मेदार कौन है. उनका मानना है कि दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए.

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फिलहाल पुलिस मामले की गहराई से जांच कर रही है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस लापरवाही में और कौन-कौन शामिल था. स्वास्थ्य विभाग भी अपने स्तर पर समीक्षा कर रहा है, लेकिन इस पूरे मामले ने उसकी कार्यप्रणाली और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. पश्चिम सिंहभूम के सिविल सर्जन जुझारू मांझी ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद ही गिरफ्तारी की गई. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर कोर्ट का हस्तक्षेप नहीं होता, तो क्या कार्रवाई होती?

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