दिल्ली में एक बड़े और संगठित स्टिकर एक्सटॉर्शन रैकेट का पर्दाफाश हुआ है, जिसने पुलिस विभाग को भी हिला कर रख दिया है. इस मामले में चौंकाने वाली बात यह है कि खुद पुलिस विभाग के दो कर्मचारी ही इस गैंग में शामिल पाए गए. क्राइम ब्रांच की जांच के बाद साउथ दिल्ली में तैनात एएसआई जितेंद्र और नॉर्थ-वेस्ट जिले के आदर्श नगर थाने में तैनात कॉन्स्टेबल प्रवीण को गिरफ्तार किया गया है.
दोनों पुलिसवालों पर आरोप है कि ये गैंग और पुलिसकर्मियों के बीच मिडिलमैन की भूमिका निभा रहे थे. इस खुलासे के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है और कई अन्य पुलिसकर्मी भी जांच के दायरे में आ गए हैं. शुरुआती जांच से संकेत मिले हैं कि यह मामला काफी लंबे समय से चल रहा था. अब इसे लेकर बड़े स्तर पर जांच तेज कर दी गई है.
जांच में सामने आया है कि यह रैकेट बेहद शातिर तरीके से काम करता था. गैंग के सदस्य पहले ट्रैफिक पुलिसकर्मियों को किसी न किसी तरह फंसाते थे. इसके लिए कभी रिश्वत देने की कोशिश की जाती थी तो कभी सामान्य बातचीत को इस तरह रिकॉर्ड किया जाता था कि वह रिश्वत जैसा लगे. कई मामलों में स्पाई कैमरा और छुपे हुए रिकॉर्डिंग डिवाइस का इस्तेमाल किया गया. इन रिकॉर्डिंग्स को बाद में एडिट करके ऐसा दिखाया जाता था कि पुलिसकर्मी भ्रष्टाचार में शामिल हैं. यह पूरी प्रक्रिया सुनियोजित तरीके से की जाती थी ताकि सामने वाले के पास बचने का कोई रास्ता न बचे.
इसके बाद शुरू होता था ब्लैकमेलिंग का असली खेल. गैंग के सदस्य इन एडिटेड वीडियो के जरिए पुलिसकर्मियों को धमकाते थे कि अगर उन्होंने पैसे नहीं दिए तो ये वीडियो सोशल मीडिया या विभाग में वायरल कर दिए जाएंगे. इससे उनकी नौकरी और इज्जत दोनों खतरे में पड़ सकती थी. डर के चलते कई पुलिसकर्मी इस जाल में फंस जाते थे और मोटी रकम देकर मामले को दबाने की कोशिश करते थे. इस तरह यह गैंग लगातार लोगों को निशाना बनाकर उगाही करता रहा. जांच में यह भी पता चला है कि कई मामलों में लाखों रुपये तक की डील की गई थी.
गिरफ्तार किए गए दोनों पुलिसकर्मियों की भूमिका इस पूरे नेटवर्क में बेहद अहम थी. ये आरोपी गैंग को यह जानकारी देते थे कि कौन सा पुलिसकर्मी आसानी से दबाव में आ सकता है और किसे टारगेट बनाना ज्यादा फायदेमंद होगा. इसके अलावा ये यह भी बताते थे कि किसके खिलाफ पहले से कोई शिकायत लंबित है. इतना ही नहीं, ये खुद पीड़ित पुलिसकर्मियों के पास जाकर यह ऑफर देते थे कि वे मामले को सुलझा सकते हैं. इसके बदले में ये मोटी रकम वसूलते थे. इस तरह ये दोनों आरोपी पूरे रैकेट की कड़ी को जोड़ने का काम कर रहे थे.
इस रैकेट का दूसरा बड़ा पहलू ट्रांसपोर्टरों से जुड़ा हुआ था. गैंग अवैध एंट्री स्टिकर बनाकर ट्रकों और अन्य वाहनों को बेचता था. दावा किया जाता था कि इन स्टिकर की मदद से वाहन बिना किसी रोक-टोक के दिल्ली में एंट्री कर सकते हैं. चाहे नो-एंट्री का समय हो या प्रदूषण से जुड़े नियम, इन स्टिकर के जरिए सबकुछ नजरअंदाज किया जा सकता था. इसके बदले ट्रांसपोर्टरों से हर महीने एक तय रकम वसूली जाती थी. इससे न केवल कानून का उल्लंघन हो रहा था, बल्कि सड़क सुरक्षा और प्रदूषण नियंत्रण पर भी गंभीर असर पड़ रहा था.
जांच एजेंसियों के मुताबिक, इस मामले में अब तक 10 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. इनमें तीन बड़े गैंग लीडर राजू मीणा, जीशान अली और रिंकू राणा शामिल हैं. ये तीनों अलग-अलग गैंग चला रहे थे, लेकिन काम करने का तरीका लगभग एक जैसा था. इनके पास एक मजबूत नेटवर्क था जिसमें फील्ड में काम करने वाले लोग, मुखबिर और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए संपर्क बनाए रखने वाले सदस्य शामिल थे. यह नेटवर्क काफी संगठित तरीके से काम करता था और हर सदस्य की भूमिका पहले से तय होती थी.
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह पूरा सिंडिकेट पिछले करीब 10 साल से सक्रिय था. धीरे-धीरे इसने दिल्ली में अपनी जड़ें इतनी मजबूत कर ली थीं कि इसे पकड़ पाना आसान नहीं था. लंबे समय तक यह गैंग पुलिस और ट्रांसपोर्ट सेक्टर दोनों को निशाना बनाता रहा. हालांकि अब क्राइम ब्रांच की सख्त कार्रवाई के बाद इसका खुलासा हो पाया है. इस केस ने यह भी दिखाया है कि कैसे सिस्टम के अंदर ही कुछ लोग इसका फायदा उठाकर गलत कामों को बढ़ावा दे रहे थे.
फिलहाल, पुलिस इस पूरे मामले की गहराई से जांच कर रही है और कम से कम 4 अन्य पुलिसकर्मियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है. अधिकारियों का कहना है कि इस नेटवर्क को पूरी तरह खत्म करने के लिए हर एंगल से जांच की जा रही है. इसमें फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन, डिजिटल चैट्स और गैंग के बीच के कनेक्शन की बारीकी से पड़ताल की जा रही है. आने वाले दिनों में इस मामले में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं. पुलिस का दावा है कि दोषियों को किसी भी हालत में बख्शा नहीं जाएगा और पूरे नेटवर्क को जड़ से खत्म किया जाएगा.