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महंगा पड़ रहा है बासमती चावल का निर्यात, जलस्तर में आ रही है भारी गिरावट

पंजाब में खेती के तकरीबन 85 फीसदी रकबे में गेहूं और धान उगाया जाता है. धान ज्यादा पानी में पैदा होने वाली फसल है जिसके चलते राज्य भूजल स्तर में खतरनाक गिरावट का सामना कर रहा है.

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कृषि क्षेत्र में व्यापक सुधारों की जरूरत है
कृषि क्षेत्र में व्यापक सुधारों की जरूरत है
स्टोरी हाइलाइट्स
  • भारत में पेय जल की समस्या पहले से ही गंभीर
  • अल्प जल वाली फसलों पर फोकस करना होगा
  • हरित क्रांति वाले प्रदेशों के जलस्तर में गिरावट

क्या आपने कभी सोचा है कि अगर बासमती चावल के निर्यात की लागत पानी के संदर्भ में मापी जाए तो इसकी असल कीमत क्या होगी? अगर हम पानी के अप्रत्यक्ष निर्यात पर विचार करें तो 2014-15 में, जब भारत ने 37.1 लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया तो इसके साथ 10 ट्रिलियन लीटर पानी का भी निर्यात किया. ये वह पानी है जो इस 37.1 लाख टन चावल की खेती में भूमि तैयार करने से लेकर चावल तैयार करने तक इस्तेमाल हुआ. पानी की उपलब्धता तेजी से कम होती जा रही है और पानी का यह अप्रत्यक्ष निर्यात घरेलू स्तर पर बोझ बढ़ा रहा है. अब पैदावार स्थिर होने के साथ चावल और गेहूं उत्पादन के तेजी से अव्यवहारिक होने का खतरा पैदा हो रहा है, खास कर हाइड्रोलॉजिकल और किफायती संदर्भ में. क्योंकि बार-बार एक ही फसल उगाने से मिट्टी का क्षरण होता है, वायुमंडलीय प्रदूषण (पराली से) होता है और सबसे महत्वपूर्ण बात, खेती के लिए पानी और ऊर्जा का बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है. 

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इसके अलावा पानी का अकुशल उपयोग होता है. चावल और गेहूं की खेती में लगभग 11,650 क्यूबिक मीटर प्रति हेक्टेयर (m3/ha) पानी की जरूरत होती है, जिसमें से सिर्फ चावल में लगभग 7,650 m3/ha पानी खर्च होता है. इसकी कीमत और खामियाजा पंजाब और हरियाणा के किसानों और राज्य सरकारों को उठाना पड़ रहा है जो हरित क्रांति के अगुआ रहे लोगों के वारिस हैं. वे अब भूजल स्तर में खतरनाक गिरावट, सिंचाई के पंपिंग सेट के लिए बिजली की हाई सब्सिडी और इस सबके बावजूद कम उपज की स्थितियों का सामना कर रहे हैं.

पंजाब में भूजल का अति-दोहन

पंजाब में खेती का कुल रकबा लगभग 7.8 मिलियन हेक्टेयर (MHA) है. इसमें से लगभग 45 प्रतिशत में गेहूं और 40 प्रतिशत में चावल की खेती होती है. इस तरह कुल 85 प्रतिशत खेती योग्य जमीन में सिर्फ दो फसलें धान और गेहूं पैदा किया जाता है. चावल की खेती में ज्यादा पानी लगता है और उच्च वाष्पीकरण (मिट्टी से  वाष्पीकरण और जलवायु परिस्थितियों से प्रभावित वाष्पोत्सर्जन के माध्यम से खर्च होने वाले पानी) के कारण भूजल संसाधनों पर अत्यधिक दबाव है.

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सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड (CGWB) के आंकड़ों के अनुसार, पूरे पंजाब में लगभग 80 प्रतिशत भूजल ब्लॉक का ‘अति-दोहन’ हो रहा है. इसमें से लगभग 96 प्रतिशत अकेले मध्य पंजाब क्षेत्र में है.

ताजा अनुमानों के अनुसार, पंजाब में उपलब्ध जल संसाधनों का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा कृषि में खर्च हो जाता है और बाकी बचा 10 प्रतिशत राज्य की घरेलू, औद्योगिक और पर्यावरणीय जरूरतों को पूरा करता है. पंजाब में सालाना 60 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) पानी की मांग है और सिर्फ 46 बीसीएम पानी उपलब्ध है. लगातार 14 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी का यह वार्षिक घाटा 23 प्रतिशत से ज्यादा नकारात्मक जल संतुलन पैदा करता है.

हालांकि, पानी के संतुलन में कमी के कारण खपत कम नहीं हो सकती. इसलिए राज्य भूजल घाटे की इस जरूरत को पूरा करने के लिए जमीन से और ज्यादा पानी का दोहन करता है, जिसकी वजह से लंबे समय में जलस्तर में गिरावट आती है. भूजल स्तर में ये गिरावट सबसे ज्यादा मध्य पंजाब के जिलों में है. सीजीडब्ल्यूबी की रिपोर्ट 2017 के अनुसार, इन इलाकों में प्रति वर्ष 0.74 मीटर से एक मीटर तक की दर से जलस्तर में गिरावट आई है. संगरूर, जालंधर, मोगा, कपूरथला, पटियाला, बरनाला और फतेहगढ़ साहिब के जिलों में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं.

बिजली सब्सिडी का बढ़ता बजट

पिछले लगभग छह दशकों (1960 और 2018 के बीच) में, धान का रकबा 150 गुना बढ़कर 20,000 हेक्टेयर से 30.65 लाख हेक्टेयर हो गया है. इसके साथ ही राज्य में इलेक्ट्रिक पंपिंग सेटों की संख्या में भी 16 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. इसी अवधि में, खरीफ की उन फसलों के रकबे में भारी गिरावट आई है जिन्हें कम पानी की जरूरत होती है. उदाहरण के लिए, मक्के की खेती के रकबे में 65 प्रतिशत, मूंगफली के रकबे में 97 प्रतिशत और बाजरे के रकबे में 98 प्रतिशत की गिरावट आई है.

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इसके अलावा, राज्य सरकार पिछले 25 वर्षों से किसानों को भूजल निकालने के लिए मुफ्त बिजली मुहैया करा रही है. ये बिजली सब्सिडी 1997-98 में मोटे तौर पर 693 करोड़ रुपये की रकम के साथ शुरू हुई थी. 2019-20 राज्य में बिजली सब्सिडी के लिए 8,969 करोड़ रुपये आवंटित किए गए. यह राज्य के कुल कृषि बजट का 62 प्रतिशत है. यानी कुल कृषि बजट का 62 प्रतिशत सिर्फ बिजली सब्सिडी पर खर्च होता है और अन्य विकास और कल्याणकारी गतिविधियों के लिए बहुत कम बजट बचता है.

धान की खेती के सा​थ एक संकट ये जुड़ गया है कि हर साल 20,000 से ज्यादा खेतों में पराली जलाने की घटनाएं होती हैं जिससे पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए एक और खतरा पैदा होता है. धान की खेती में आ रहे संकट जैसे- भारी संसाधन खर्च, सरकार से सब्सिडी में अस्थिरता, पैदावार और आय में गिरावट, पर्यावरणीय क्षति- क्या इनका कोई समाधान है. जवाब है हां.

फसल विविधीकरण है समाधान

फसल विविधीकरण (crop diversification) एक ऐसा समाधान है जो किसानों, राज्य, पर्यावरण और सरकार सभी के लिए राहत पहुंचा सकता है. पंजाब में कृषि की हाइड्रोलॉजिकल और आर्थिक स्थिरता की मांग है कि अगले छह से सात वर्षों में धान के क्षेत्र को लगभग 10 लाख हेक्टेयर (वर्तमान में कुल 31 लाख हेक्टेयर) घटाया जाना चाहिए. एक कुशल और स्वीकार्य विविधीकरण योजना के विकास और कार्यान्वयन के लिए इतना समय पर्याप्त होगा.

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धान के विकल्प के रूप में खरीफ की अन्य फसलें हो सकती हैं. धान की फसल के लिए 160 सेमी सिंचाई के पानी की जरूरत होती है. इसकी तुलना में मक्का और कपास को सिर्फ 40 सेमी, मूंगफली, दालों और पशुओं के चारे की फसल के लिए सिर्फ 25 सेमी पानी की जरूरत होती है. आर्थिक उपज में किसी किस्म की गिरावट के बिना वैकल्पिक फसल प्रणाली अपनाकर चावल-गेहूं सिस्टम को बदलने के लिए पर्याप्त गुंजाइश है. मक्का, आलू और प्याज जैसी फसलें अच्छी आय दे सकती हैं और इनमें पानी भी काफी कम लगता है.

पंजाब सरकार के जल संसाधन विभाग के तहत आने वाले स्टेट हाइड्रोलॉजी सेल के शुरुआती अनुमानों के अनुसार, मक्का और कपास में विविधता लाने के प्रयासों के परिणामस्वरूप दो अरब घन मीटर सिंचाई पानी की बचत हुई.

विविधता केवल अन्य खाद्य फसलों तक सीमित नहीं होनी चाहिए. एक अन्य संभावित क्षेत्र डेयरी उत्पादन है. डेयरी उद्योग को लेकर प्रयास किया जाए तो कृषि भूमि के उपयोग को पशुओं के लिए चारे की खेती की तरफ मोड़ा जा सकता है. धान की खेती के मुकाबले डेयरी व्यवसाय भी काफी फायदा देने वाला विकल्प है.

महंगी फसलों को बढ़ावा देना

फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए राज्य स्ट्राबेरी, ड्रैगन फ्रूट, अंजीर, आलू बुखारा, आड़ू और अन्य सब्जियों की खेती को प्रोत्साहित कर सकती है जिनका काफी अच्छा दाम मिलता है. हालांकि, ये उपाय रातोंरात नहीं हो सकते. इसके लिए पूरे कृषि बाजार में बुनियादी परिवर्तन की जरूरत है.

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सिंचाई व्यवस्था, पर्याप्त सड़कें और एयर कनेक्टीविटी, अच्छे बाजार, अच्छा मोबाइल नेटवर्क कवरेज, क्रेडिट और नॉलेज सेंटर की उपलब्धता, और मेहनती इनोवेटिव किसानों के साथ राज्य खुद को और देश को एक रैनबों रिवोल्यूशन की ओर ले जाने की मुफीद स्थिति में है. ये ऐसी कृषि क्रांति होगी जहां उत्पादन की लागत कम से कम और उपज ज्यादा होगी. पर्यावरण पर सकारात्मक असर होगा, उपभोक्ताओं और मिट्टी के स्वास्थ्य पर उर्वरकों का असर भी कम होगा और कृषि टिकाऊ होगी. आखिरकार, पंजाब बहुत पहले ही हरित क्रांति का अग्रदूत रह चुका है.

ज्यादा पानी में पैदा होने वाले बासमती चावल के उत्पादन और निर्यात पर वापस आते हुए, अंतिम शब्द ये हैं कि भारत अपनी जल स्थिरता को और ज्यादा जोखिम में डालने की स्थिति में नहीं है. भारत के पास पानी इतना ही है कि घरेलू मांग को पूरा किया जा सके, इसलिए चावल के रूप में पानी निर्यात को रोकना होगा.

(ये लेख भारत शर्मा ने लिखा है, भारत शर्मा अवकाश प्राप्त वैज्ञानिकअंतर्राष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान और ICRIER में सीनियर विजिटिंग फेलो हैं.)

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