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यूटिलिटी

स्टडी में दावा- कोरोना से एक बार अस्पताल में भर्ती, 7 महीने की सैलरी खर्च!

आम आदमी पर कोरोना की आर्थिक चोट
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कोरोना महामारी ने आम आदमी को आर्थिक तौर पर गंभीर चोट पहुंचाई है. दूसरी लहर के दौरान देश में बड़े पैमाने पर लोग इस महामारी की चपेट में आए. कुछ लोगों को कोरोना संक्रमण के दौरान अस्पताल में भर्ती होना पड़ गया. अब एक स्टडी  रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें कहा जा रहा है कि कोरोना से जो अस्पताल में भर्ती हो गए, उन्हें कैसी आर्थिक तबाही झेलनी पड़ी. (Photo: File)

एक स्टडी में दावा
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दरअसल, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया और अमेरिकी बेस्ड Duke Global Health Institute ने एक स्टडी की है, जिसमें दावा किया गया है कि एक आम आदमी के लिए ICU में कोरोना के इलाज का खर्च 7 महीने की सैलरी के बराबर है. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक यह स्टडी अभी प्री-प्रिंट स्टेज में है. ये आंकलन एक औसत खर्च के आधार पर निकाला गया है. (Photo: File)

कैजुअल वर्कर्स के लिए ICU का खर्च 15 महीने की सैलरी के बराबर
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इस स्टडी की मानें तो कैजुअल वर्कर्स के लिए कोरोना से अस्पताल खर्च 15 महीने की इनकम के बराबर है. इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने सरकार द्वारा कोरोना इलाज के निर्धारित कीमतों का इस्तेमाल किया है. (Photo: File)

औसतन 64,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च
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स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2020 से जून 2021 तक कोरोना की टेस्टिंग और इलाज पर औसतन 64,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए हैं. हालांकि देश में बड़े पैमाने पर लोग इस इलाज का खर्च उठाने में सक्षम नहीं है. (Photo: File)

हर वर्ग को आर्थिक नुकसान
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रिपोर्ट के अनुसार कोरोना से अस्पताल में आईसीयू का खर्च 86 फीसदी कैजुअल वर्कर्स की सालाना आय से अधिक है. इसी तरह यह 50 फीसदी वेतनभोगियों की सालाना आय और स्वरोजगार में लगे दो-तिहाई लोगों की सालाना आय से अधिक है. (Photo: File)

आइसोलेशन का खर्च भी ज्यादा
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यही नहीं, कोरोना से अस्पताल में केवल आइसोलेशन का खर्च 43 फीसदी से अधिक कैजुअल वर्कर्स की सालाना आय से अधिक है. यह स्वरोजगार में लगे एक चौथाई लोगों और 15 फीसदी सैलरीड क्लास की सालाना आय से अधिक है. (Photo: File)

 RT-PCR टेस्ट का खर्च
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इस स्टडी में RT-PCR टेस्ट का खर्च 2,200 रुपये जोड़ा गया है, जो निजी अस्पताल टेस्टिंग के दौरान वसूलते हैं. यह रकम किसी कैजुअल वर्कर की एक हफ्ते की कमाई के बराबर है. यही नहीं, संक्रमण के दौरान लोगों को कई बार टेस्ट कराने पड़ते हैं. अगर कोई पॉजीटिव निकलता है तो फिर उस परिवार के बाकी सदस्यों को भी टेस्ट कराना पड़ता है. जिससे खर्च का अनुमान लगाया जा सकता है. 

खर्च का औसत आंकलन
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इस स्टडी के प्रमुख लेखक शक्तिवेल सेल्वराज का कहना है कि कोरोना इलाज के लिए राज्य सरकारों द्वारा तय कीमतों के आधार पर खर्च का औसत आंकलन किया गया है. उनका कहना है कि इस दायरे से कई तरह के खर्च को बाहर रखा गया है. अगर वास्तविक खर्च अनुमान लगाया जाए, तो वो कहीं ज्यादा होगा. (Photo: File)