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एयरलाइंस के लो फेयर ऑफर्स से मुनाफा नहीं तो नुकसान भी नहीं

देश में लो कॉस्ट एयरलाइन्स पिछले कुछ समय में एक से बढ़कर एक लुभावने फेयर ऑफर लेकर आ रही है. स्पाइसजेट, जेट एयरवेज, इंडिगो जैसी निजी क्षेत्र की घरेलू विमान कंपनियों के इन ऑफर से पब्लिक सेक्टर की इंडियन एयरलाइन्स भी दबाव महसूस करते हुए अपना ऑफर पेश करने पर मजबूर हो जाती हैं.

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देश में लो कॉस्ट एयरलाइन्स पिछले कुछ समय में एक से बढ़कर एक लुभावने फेयर ऑफर लेकर आ रही है. स्पाइसजेट, जेट एयरवेज, इंडिगो जैसी निजी क्षेत्र की घरेलू विमान कंपनियों के इन ऑफर से पब्लिक सेक्टर की इंडियन एयरलाइन्स भी दबाव महसूस करते हुए अपना ऑफर पेश करने पर मजबूर हो जाती हैं. वहीं दूसरा पहलू यह भी है कि देश में घरेलू विमानन कंपनियां कम कारोबार, महंगे मेंट्नेन्स और बढ़ी हुई प्लाइंग कॉस्ट के चलते घाटा उठा रही हैं.

ऐसे में यह कंपनियां कैसे 1 रुपये से लेकर 999 रुपये में हवाई सफर का ऑफर दे सकती हैं? जानकारों का मानना है कि इन ऑफर्स से कंपनियों की बैलेंसशीट पर असर नहीं पड़ता और वह इन्हें महज अपना प्रमोशन एक्टिविटी मान कर चलते हैं. लिहाजा, इन ऑफर्स का मतलब समझने के लिए देश के एविएशन सेक्टर की इन 4 बातों को समझना जरूरी है.

ऑफ सीजन के लिए दिए जाते हैं यह फेयर ऑफर्स

एविएशन सेक्टर के जानकारों के मुताबिक देश में साल के कई महीने ऑफ सीजन के रहते हैं. ऐसे वक्त में ज्यादातर घरेलू उड़ानों में पैसेंजर ट्रैफिक बहुत कम रहता है. जहां मई-जून जैसे पीक सीजन महीनों में घरेलू उड़ानों का लोड फैक्टर (कितने पैसेंजर्स के साथ उड़ान भरी जा रही है) 75 से 90 फीसदी रहता है वहीं ऑफ सीजन में यह गिरकर 40 से 50 फीसदी पर आ जाता है.

कुछ डोमेस्टिक रूट पर पैसेंजर संख्या इतनी गिर जाती है कि उनपर ऑपरेट करने का समस्या खड़ी हो जाती है. लिहाजा, एयरलाइन अपनी सभी ऑफर्स इन ऑफ सीजन महीनों के लिए लाते है जिससे कुछ नया ट्रैफिक जोड़ा जा सके.

कम ट्रैफिक रूट पर दिए जाते हैं ज्यादातर ऑफर

आमतौर पर घरेलू एयरलाइन्स उन सेलेक्ट रूट पर ही यह लो कॉस्ट ऑफर्स देती हैं जिनपर ट्रैफिक बहुत कम रहता है. इंडस्ट्री के जानकारों के मुताबिक एयरलाइन्स को किसी भी रूट पर ऑपरेट करने के लिए जहाज का किराया, एयरपोर्ट पर पार्किंग चार्जेस, एविएशन फ्यूल का भुगतान जैसे खर्चों को साल भर वहन करना पड़ता है और इन खर्चों पर ट्रैफिक होने और न होने का असर नहीं पड़ता. लिहाजा, ऑफ सीजन में भी ऐसे रूट्स पर उड़ान भरना एयरलाइन्स की मजबूरी रहती है.

अमेरिका और यूरोप से अलग है भारत की इंडस्ट्री

अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में घरेलू उड़ाने अच्छे मुनाफे पर ऑपरेट करती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि वहां का रेलवे नेटवर्क भरत जैसा वृहद नहीं है. अमेरिका में एक राज्य से दूसरे राज्य की यात्रा करने में हवाई सफर करना रेल सफर से सस्ता रहता है. साथ ही इन देशों का ट्रैफिक कई दशकों से यात्रा में समय बचाने की मानसिकता बना चुका है.

वहीं भारत में अभी भी सस्ती रेल सेवा के सामने महंगे हवाई सफर को लग्जरी माना जाता है. ऐसे में एयरलाइन्स इन ऑफर्स के जरिए रेलवे के शीर्ष सेग्मेंट (एसी फर्स्ट और एसी सेकेंड) के यात्रियों को लुभाकर अपना नया ट्रैफिक बेस तैयार करने की कोशिश करती हैं.

लो कॉस्ट ऑफर में यात्रियों से वसूल लिया जाता है टैक्स
ऑफ सीजन और कम ट्रैफिक वाले रूट पर एयरलाइन्स 1 रुपये, 755 रुपये, 999 रुपये जैसे ऑफर्स पेश करती है. इन ऑफर्स के जरिए जहां मुफ्त में एयरलाइन्स की पब्लिसिटी हो रही है वहीं उसे नया ट्रैफिक बेस भी मिल रहा है. इसके अलावा, इन ऑफर्स के जरिए टिकट बुकिंग कराने वालों से वास्तव में यह लो कॉस्ट टिकट का पैसा टैक्स जोड़कर वसूला जाता है.

इस टैक्स में एयरपोर्ट पर पार्किंग चार्जेस और एविएशन फ्यूल जैसे खर्च शामिल रहते हैं. लिहाजा एयरलाइन्स के लिए इन कम ट्रैफिक वाले रूट्स पर ऑफ सीजन के दौरान बस ऑपरेटिंग कॉस्ट निकालने का दबाव रहता है जिसे वह टैक्स के रूप में निकाल लेते हैं.

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