भारत सरकार ने एअर इंडिया के विनिवेश पर निर्णय लेने से पहले अगले तीन-चार महीने तक 'प्रतीक्षा करो और देखो' की रणनीति अपनाने का निर्णय लिया है. इससे पहले 2 बार हिस्सेदारी बेचने की समयसीमा बढ़ाने के बाद भी सरकार को इस संबंध में कोई आवेदन नहीं मिला था.
एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, सरकार का सामान्यतौर पर यह मानना है कि किसी घरेलू निकाय के हाथों में ही रहे. उन्होंने कहा, 'हमने अगले तीन-चार महीने तक प्रतीक्षा करो और देखो ( पर) की रणनीति अपनाने का निर्णय लिया है.'
उन्होने आगे कहा कि अभी ईंधन की कीमतें अधिक हैं और हमें विनिवेश प्रक्रिया के साथ आगे बढ़ने के निर्णय की वहनीयता पर फैसला करना होगा. अधिकारी ने कहा, 'मुख्यत: ईंधन की अधिक कीमतों के कारण अभी पूरा विमानन क्षेत्र संकट का सामना कर रहा है.'
में सरकारी हिस्सेदारी बेचने के प्रस्ताव को निविदा की अंतिम तिथि 31 मई तक कोई प्राथमिक बोली नहीं मिल सकी थी.
सरकार ने राष्ट्रीय विमानन कंपनी में 76 प्रतिशत इक्विटी शेयर पूंजी की बिक्री का फैसला किया है. आरंभिक सूचना ज्ञापन के अनुसार इसके अलावा एअर इंडिया के प्रबंधन का नियंत्रण भी निजी कंपनी को दिया जाएगा. इस सौदे के तहत एअर इंडिया के अलावा उसकी कम लागत वाली इकाई एअर इंडिया एक्सप्रेस और एअर इंडिया एसएटीएस एअरपोर्ट सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड की भी बिक्री की जाएगी.
एअर इंडिया के रणनीतिक विनिवेश के लिए निकाले गए रुचि पत्र (ईओआई) के लिए पहले से तय समयसीमा 14 मई थी. बाद में सरकार ने ईओआई जमा करने की तारीख बढ़ाकर 31 मई कर दिया था, लेकिन तब भी कोई खरीददार नहीं मिला.
सरकार एअरलाइन में 24 प्रतिशत हिस्सेदारी अपने पास रखेगी. 28 मार्च को जारी ज्ञापन के अनुसार बोली जीतने वाली कंपनी को कम से कम 3 साल तक एअरलाइन में अपने निवेश को कायम रखना होगा. मार्च, 2017 के अंत तक एअरलाइन पर कुल 48,000 करोड़ रुपए के कर्ज का बोझ चढ़ चुका था.