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बांग्लादेश की तेज आर्थ‍िक तरक्की से भारत ले सकता है ये सबक

बांग्लादेश की चमत्कारिक तरक्की में लघु वित्त संस्थाओं (MFI) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. उसने न केवल GDP और रोजगार में वृद्धि‍ के साथ संरचनात्मक बदलाव किए हैं, बल्कि उसने सामाजिक संकेतकों, आय स्तर और ग्रामीण इलाकों में उद्यमिता के स्तर में भी उल्लेखनीय बढ़त हासिल की है.

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महिला सशक्तीकरण रहा बांग्लादेश की तरक्की का प्रमुख आधार (फाइल फोटो: रॉयटर्स)
महिला सशक्तीकरण रहा बांग्लादेश की तरक्की का प्रमुख आधार (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

बांग्लादेश ने न केवल मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट पर आधारित उत्पादन (GDP) और रोजगार में वृद्धि‍ के साथ संरचनात्मक बदलाव किए हैं, बल्कि उसने सामाजिक संकेतकों, आय स्तर और ग्रामीण इलाकों में उद्यमिता के स्तर में भी उल्लेखनीय बढ़त हासिल की है. इनमें लघु वित्त संस्थाओं (MFI) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

विश्व बैंक के साल 2014 के एक अध्ययन में, जिसमें माइक्रो क्रेडिट कार्यक्रमों के लांग टर्म असर को देखा गया है, यह नि‍ष्कर्ष सामने आया कि इन कार्यक्रमों से ग्रामीण परिवारों को ज्यादा कमाने और ज्यादा खपत में मदद मिली है. यही नहीं, 2000 से 2010 के दशक में कुल गरीबी में 10 फीसदी से ज्यादा कमी करने में इसका योगदान रहा है. इससे बांग्लादेश को आय असमानता को बढ़ने से रोकने में मदद मिली है जो कि कई विकासशील देशों में देखा जा रहा है.

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बांग्लादेश ने कैसे किया कमाल

बांग्लादेश में माइक्रोफाइनेंस यानी लघु वित्त की संस्थाएं 1970 के दशक में शुरू हुईं जिनमें ग्रामीण बैंक और BRAC (पूर्व नाम बांग्लादेश रूरल एडवांस कमिटी) ने प्रभावी भूमिका निभाई. लघु कर्ज कार्यक्रमों के द्वारा निचले स्तर के लोगों के आर्थिक और सामाजिक विकास की दिशा में प्रयास के लिए 2006 में ग्रामीण बैंक और उसके संस्थापक मोहम्मद युनूस को नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था. बाद में इस अभि‍यान में एसोसिएशन ऑफ सोशल एडवांसमेंट (ASA) जैसी अन्य संस्थाएं भी शामिल हो गईं और ग्रामीण सामाजिक एवं आर्थिक परिदृश्य पूरी तरह से बदल गया.

सिंगापुर मैनेजमेंट यूनि‍वर्सिटी के साल 2008 के एक पेपर में इस बात पर रोशनी डाली गई है कि ग्रामीण बैंक और BRAC जैसी संस्थाओं ने यह कमाल कैसे कर दिखाया.

इसके मुताबिक यूनुस ने बिना कुछ जमानत लिए और कम से कम डिफाल्ट में कर्ज और उधारी देने का एक स्वत: टिकाऊ सिस्टम विकसित किया, जिसमें औसतन 97 फीसदी का कर्ज भुगतान यानी रीपेमेंट रेट था. उन्होंने ग्रामीण महिलाओं पर खास जोर दिया और उन्हें इस बात के लिए संगठित किया कि वे कारोबार के लिए सामूहिक जिम्मेदारी लें. इसमें अच्छी बात यह थी कि जरूरी नहीं कि जुड़ने वाला हर सदस्य कर्ज ही ले, कई अपने अतिरिक्त धन को जमा भी करते थे. 

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युनूस अहमद की महत्वपूर्ण भूमिका

युनूस ने ऐसे फंड के दम पर कई तरह के कारोबारी उद्यम खड़े किए, मुनाफा या बिना मुनाफे वाले सामाजिक अभि‍यान के साथ, निटवेअर (कपड़ों की बुनाई) से लेकर सॉफ्टवेयर तक.

उनके प्रयासों से, ‘बांग्लादेश के ग्रामीण इलाकों में उद्यमिता की लहर चल पड़ी, जिसने बांग्लादेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के ढांचे को बदलने में प्रभावी तरीके से मदद की.’ यही नहीं, युनूस द्वारा शुरू की गई दिग्गज टेलीकॉम कंपनी ग्रामीणफोन ने ग्रामीण बांग्लादेश में संचार क्रांति ला दी.

इसी तरह, BRAC ने भी ग्रामीण बांग्लादेश को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. मैगसेसे पुरस्कार विजेता फजल हसन आबिद द्वारा स्थापित इस संस्था ने उन सुदूर से सुदूर गांवों का भी पुनर्निमाण कर दिया, जहां स्वास्थ्य के मामले में भी सरकारी सहायता नहीं मिल पाती थी. इसकी वजह से शि‍शु मृ‍त्यु दर में काफी कमी आई. आबिद ने कई उद्यमों की फंडिंग और स्थापना भी की, जिनके द्वारा रेशम उत्पादन, डेयरी, हैचरी और अन्य कारोबार किए जा रहे हैं. इनसे ग्रामीण गरीबों के लिए रोजगार तथा आय का सृजन हो रहा है.

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ढाका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सलीम रेहान ने कहा कि 75 फीसदी से ज्यादा माइक्रोफाइनेंस संस्थाएं सामाजिक विकास कार्यक्रमों में लगी हैं, जिनका मुख्य जोर शि‍क्षा, स्वास्थ्य, जल एवं स्वच्छता, महिला सशक्तीकरण और आर्थिक विकास पर है.

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भारत में क्यों नहीं हो पाया बदलाव

तो सवाल उठता है कि भारत में बड़े पैमाने पर माइक्रोफाइनेंस संस्थाओं की मौजूदगी के बावजूद यहां ऐसा बदलाव क्यों नहीं हो पाया?

यह जिज्ञासा एक अध्ययन की मांग करती है. ICRIER की प्रोफेसर निशा तनेजा कहती हैं कि बांग्लादेश में ये संस्थाएं जिस तरह से जमीनी स्तर पर जुड़ी हुई हैं, लोगों का भरोसा जीता है और डिफाल्ट को हतोत्साहित किया है, वह असाधारण है. इसे भारत में भी लागू किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए काफी दृष्टि और प्रतिबद्धता की जरूरत है.

महिला सशक्तीकरण और सामाजिक बदलाव

बांग्लादेश के माइक्रो-फाइनेंस संस्थाओं के काम में महिलाएं केंद्र बिंदु रही हैं. बांग्लादेश की आर्थिक तरक्की की व्याख्या करते हुए प्रोफेसर कौशि‍क बसु ने इस पहलू को रेखांकित किया. वह लिखते हैं कि ग्रामीण बैंक और BRAC जैसी माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं की शुरुआत से और हाल में सरकार द्वारा शुरू किए गए काम की वजह से बांग्लादेश ने लड़कियों को शि‍क्षि‍त करने में महत्वपूर्ण प्रगति की है, इसकी वजह से महिलाओं को परिवारों और जनता में बेहतर आवाज मिली है.

वर्ल्ड बैंक की साल 2019 की एक स्टडी में कहा गया है कि बांग्लादेश ने लैंगिक समानता के कई पहलुओं में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है, जिससे महिलाओं और लड़कियों के लिए जीवन के हर क्षेत्र में अवसर तैयार हुए हैं-प्रजनन दर में कमी आई है, स्कूलों में लैंगिक समानता बढ़ी है और पिछले एक दशक में कपड़ा क्षेत्र में लाखों महिलाओं के काम करने का रास्ता खुला है. इन सबका असर यह है कि आज वहां लड़कियों के लिए स्कूली शि‍क्षा पूरी करने और 60 साल तक जीने का लड़कों से बेहतर मौका दिख रहा है.

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इसमें आगे कहा गया है कि 15 साल और उससे ऊपर की महिलाओं के लिए श्रम भागीदारी दर (FLFP) साल 2003 के 26 फीसदी से बढ़कर 2016 में 36 फीसदी हो गई है. इसके विपरीत दक्षिण एशि‍या के ज्यादातर अन्य देशों में इस दर में गिरावट आई है. उदाहरण के लिए यूएनडीपी के 2018 के अपडेटेड ह्यूमन डेवलपमेंट इंडिसेज ऐंड इंडिकेटर्स के अनुसार, साल 2017 में भारत में FLFP दर 27.2 फीसदी ही था, जबकि बांग्लादेश में यह 33 फीसदी था.

बांग्लादेश की राष्ट्रीय संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी भी बढ़ी है (वहां 50 सीट महिलाओं के लिए आरक्षित है) और यह साल 2017 के 19.4 फीसदी के क्षेत्रीय औसत के मुकाबले 20.3 फीसदी थी. उस साल भारतीय संसद में महिलाओं का प्रतिनिधि‍त्व 11.6 फीसदी ही था.

अब बांग्लादेश में ज्यादा महिलाएं जमीन की मालिक हैं और उनका खेतों, पशुओं, मकानों, गैर कृषि‍ भूमि पर ज्यादा आर्थिक नियंत्रण हासिल है. वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है, 'अब महिलाओं के संपत्ति‍ के स्वामी होने के मामले में समाज का रवैया बदला है, जो कि महिलाओं के आगे बढ़ने के लिए शुभ लक्षण है.' इसके पीछे तर्क यह है कि महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण से गरीबी घटती है, क्योंकि वे बच्चों और समुदायों पर ज्यादा खर्च करती हैं.

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यह सब वहां स्वास्थ्य और अन्य सूचकांकों में सुधार से साफ दिख रहा है.

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यूएनडीपी की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार बांग्लादेश में जीवन प्रत्याशा दर 72.8 है जो कि भारत के 68.8 से बेहतर (साल 2017 में) है. इसी प्रकार बांग्लादेश में नवजात मृत्य दर (5 साल से कम, प्रति हजार, साल 2016) 34.2 है, जबकि भारत में यह 43 है.

यहां तक कि शि‍क्षा के प्रमुख सूचकांकों में भी भारत से बांग्लादेश आगे है.

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अक्टूबर में जब ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) की तीव्रता रिपोर्ट जारी की गई थी, तब से बांग्लादेश लगातार भारत से बेहतर स्थिति में है. इस रिपोर्ट में बांग्लादेश को 25.8 अंक हासिल हुए हैं (117 देशों में से उसे 88वीं रैंकिंग हासिल हुई है), जबकि भारत का अंक 30.3 रहा (102वीं रैंकिंग) है.

GHI के द्वारा 0 से 100 के पैमाने पर किसी देश में भूख और कुपोषण के स्तर को मापा जाता है. किसी देश को इसमें जितना कम अंक मिलता है, उसका मतलब है कि वहां भूख और कुपोषण की तीव्रता उतनी ही कम होती है. हालांकि बांग्लादेश और भारत, दोनों इसमें लगारतार ‘गंभीर’ वाली श्रेणी में बने हुए हैं.

नीचे दिए गए ग्राफ से पता चलता है कि साल 2000 से अब तक GHI अंक में भारत और बांग्लादेश की स्थति क्या रही है.

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एक और महत्वपूर्ण रिपोर्ट गत अक्टूबर महीने में ही आई है- वर्ल्ड बैंक की पहली ह्यूमन कैपिटल इंडेक्स (HCI) और इसमें भी भारत से आगे निकल गया है बांग्लादेश. 

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इस इंडेक्स के द्वारा अगली पीढ़ी के कामगारों की उत्पादकता को पूर्ण शि‍क्षा और पूर्ण स्वास्थ्य के बेंचमार्क की तुलना में देखा जाता है. ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें किसी औसत कामगार को पूर्ण स्वास्थ्य और पूर्ण शिक्षा हासिल होती है, उसे 1 अंक हासिल होता है.

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हालांकि, यह कोई चकित करने वाली बात नहीं है, क्योंकि बांग्लादेश ने अपने सामाजिक क्षेत्र के विकास (शि‍क्षा, स्वास्थ्य, खेल और महिला कल्याण आदि) के लिए काफी संसाधन झोंक दिए हैं. उसका खर्च वित्त वर्ष 2010 में जीडीपी के 4.4 फीसदी से बढ़कर वित्त वर्ष 2019 में 9.8 फीसदी हो गया है.

प्रवासियों द्वारा भेजे जाने वाला धन बना विकास का मुख्य वाहक

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के विकास की एक और मुख्य वाहक है विदेश में कार्यरत बांग्लादेशी प्रवासियों द्वारा भेजा जाने वाला धन. यह वित्त वर्ष 2006 के 4.8 अरब डॉलर के मुकाबले वित्त वर्ष 2018 में 15 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. पिछले कई साल से यह बांग्लादेश की जीडीपी में 5 फीसदी से ऊपर बना हुआ है.

ग्राफ में जो वित्त वर्ष 2019 में थोड़ी कमी दिख रही है, वह इस वजह से क्योंकि आंकड़े मार्च 2019 तक के ही हैं, जबकि वहां का वित्त वर्ष 30 जून, 2019 तक होता है.

प्रोफेसर रैहन कहते हैं कि बांग्लादेश में पिछले चार दशकों में विदेश में कार्यरत बांग्लादेशी प्रवासियों द्वारा भेजे जाने वाले धन (रेमिटेंस) में काफी बढ़ोतरी देखी गई है. अब यह कई दूसरी तरह के विदेशी मुद्रा अंतर्प्रवाह (inflow) से भी ज्यादा हो गया है खासकर आधि‍कारिक विकास सहायता और निर्यात से होने वाली शुद्ध आय से.

विदेश में कार्यरत बांग्लादेशी प्रवासी ये धन भेजते हैं. ये खासकर मध्य पूर्व, अमेरिका, यूके एवं अन्य यूरोपीय देशों और एशियाई देशों में रहते हैं. इससे बांग्लादेश के भुगतान संतुलन में स्थिरता सुनिश्चित हुई है, जिसके बदले में बांग्लादेश को अपना विदेशी मुद्रा भंडार स्वस्थ रखने में मदद मिली है.  

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