अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने अगले वित्त वर्ष यानी 2019-20 के लिये देश की आर्थिक वृद्धि दर का पूर्वानुमान घटाकर 6.80 फीसदी कर दिया है. इसके पहले फिच ने 7 फीसदी बढ़त का अनुमान जारी किया था.
रेटिंग एजेंसी ने अपने वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में कहा, ‘हालांकि हमने अर्थव्यवस्था में उम्मीद से कमतर तेजी के कारण अगले वित्त वर्ष के लिये आर्थिक वृद्धि दर का पूर्वानुमान कम किया है, इसके बाद भी देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वित्त वर्ष 2019-20 में 6.8 फीसदी और वित्त वर्ष 2020-21 में 7.10 फीसदी की दर से बढ़ेगा.' फिच ने पिछले साल दिसंबर में चालू वित्त वर्ष के लिये आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान 7.8 फीसदी से घटाकर 7.2 फीसदी कर दिया था.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक फिच ने कहा, ‘हमने आधार दर के बारे में अपना परिदृश्य बदला है और हमें पहले की आशंका के अपेक्षाकृत आसान वैश्विक मौद्रिक परिस्थितियां तथा मुद्रास्फीति के दायरे में रहने के कारण आधार दर में 0.25 प्रतिशत की एक और कटौती का अनुमान है.' फिच के मुताबिक रिजर्व बैंक ने ज्यादा उदार मौद्रिक नीति अपनाई है और फरवरी महीने में ब्याज दरों में 0.25 फीसदी की कटौती की है. महंगाई लगातार नरम बने रहने की वजह से रिजर्व बैंक को इसमें सहूलियत हुई है. वित्तीय मोर्चे की बात करें तो नए बजट में किसानों को कैश ट्रांसफर बढ़ाने पर जोर दिया गया है.' फिच ने कहा कि तेल की कीमतें अनुकूल रहने और अगले महीनों में खाद्य कीमतों में बढ़त की उम्मीद से ग्रामीण परिवारों की आय और खपत बढ़ सकती है.
गौरतलब है कि इसे पहले भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त पड़ने को लेकर कई प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने रिजर्व बैंक के प्रमुख से मिलकर चिंता जताई थी. इकोनॉमिस्ट ने रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास से मुलाकात कर कहा था कि ऐसी मौद्रिक नीति लानी होगी जिससे अर्थव्यवस्था की रफ्तार में फिर से तेजी आए.
4 अप्रैल को रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति कमिटी की बैठक होगी, जिसमें नए वित्त वर्ष के लिए मौद्रिक नीति को अंतिम रूप दिया जाएगा. अक्टूबर से दिसंबर की तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था सिर्फ 6.6 फीसदी की दर से बढ़ी है, जो पिछली पांच तिमाहियों में सबसे कम वृद्धि दर है. कमजोर उपभोक्ता मांग और कम निवेश को इसकी वजह माना जा रहा है.
पीएम मोदी चुनाव अभियान में जोरशोर से लगे हैं और एक बार फिर से सत्ता में लौटने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं, ऐसे में अर्थव्यवस्था की रफ्तार घटने को चिंता का बिंदु माना जा रहा है. अर्थव्यवस्था की रफ्तार घटने से टैक्स कलेक्शन लक्ष्य से कम हो सकता है और सरकारी खर्च में कटौती आ सकती है.