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रतन टाटा बोले- ये ऑनरश‍िप की लड़ाई नहीं, मेरी नियुक्ति कुछ ही वक्त के लिए

इस बीच चेयरमैन पद से हटाए जाने से नाराज साइरस मिस्‍त्री ने इस फैसले के खिलाफ कोर्ट जाने का फैसला किया है. टाटा संस ने मिस्त्री को हटाने का कारण नहीं बताया है.

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साइरस मिस्त्री
साइरस मिस्त्री

टाटा संस ने साइरस मिस्त्री को चेयरमैन पद से हटा दिया है. चयन समिति ने चार महीनों के लिए रतन टाटा को अंतरिम चेयरमैन नियुक्त किया है. अब नया चेयरमैन कौन होगा, इसका फैसला करने के लिए एक समिति बना दी गई है. ग्रुप के चेयरमैन पद से हटने के बाद साइरस मिस्त्री को टाटा की प्रमुख कंपनियों टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टीसीएस, इंडियन होटल्स, टाटा ग्लोबल बेवरेजेज और टाटा पावर का चेयरमैन पद भी छोड़ना होगा. इस बीच रतन टाटा ने कहा, 'मेरी नियुक्ति सीमित अवधि के लिए, जल्द नया नेतृत्व पदभार संभालेगा. ' उन्होंने ये भी कहा कि टाटा में ऑनरश‍िप की लड़ाई नहीं है.

परंपरागत रूप से, टाटा संस का सभी प्रमुख समूह की कंपनियों का प्रमुख होता है. हालांकि ये अभी स्पष्ट नहीं है कि कैसे उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा, लेकिन मिस्त्री परिवार के लिए ये एक झटका है. मिस्त्री परिवार का टाटा में करीब 16-18 फीसदी हिस्सेदारी है, जो कि उन्हें सबसे बड़ा व्यक्तिगत शेयरधारक बनाता है और ये गैर-टाटा शेयरधारक भी है.

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इस बीच चेयरमैन पद से हटाए जाने से नाराज साइरस मिस्‍त्री ने इस फैसले के खिलाफ कोर्ट जाने का फैसला किया है. टाटा संस ने मिस्त्री को हटाने का कारण नहीं बताया है.

मिस्त्री को वर्ष 2011 में कंपनी में चेयरमैन रतन टाटा का उत्तराधिकारी चुना गया था और उन्हें पहले डिप्टी चेयरमैन बनाया गया. टाटा संस के चेयरमैन पर दर मिस्त्री का चुनाव पांच सदस्यीय एक समिति ने किया था. के 75 वर्ष की आयु पूरी करने पर उनकी सेवानिवृत्त के बाद 29 दिसंबर 2012 को चेयरमैन का पद भार संभाला था. मिस्त्री वर्ष 2006 से कंपनी के निदेशक मंडल में शामिल रहे हैं. कंपनी के सबसे बड़े हिस्सेदार शापूरजी पालोनजी ने कंपनी के चेयरमैन पद के लिए उनके नाम की सिफारिश की थी.

मिस्त्री टाटा समूह के छठे अध्यक्ष थे और नोरोजी सक्लात्वाला के बाद दूसरे ऐसे अध्यक्ष, जिनके नाम में टाटा नहीं था. अर्थशास्त्रियों ने एक समय में उन्हें भारत तथा ब्रिटेन का सबसे महत्वपूर्ण उद्योगपति करार दिया था. मिस्त्री ने रतन टाटा से अध्यक्ष पद की कमान ऐसे वक्त में ली थी, जब टाटा समूह की कई कंपनियों का हाल बुरा था और उनकी सबसे बड़ी चुनौती अंतर्राष्ट्रीय इस्पात कारोबार को तंगहाली से निकालना और अन्य कारोबारों को एकजुट रखना था. 100 अरब डॉलर की कंपनी में लगभग सात लाख कर्मी कार्यरत हैं.

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