महानगरों की चकाचौंध और भागदौड़ अब लोगों को सुकून के बजाय थकान का एहसास करा रही है. कभी 'सपनों के शहर' कहे जाने वाले मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे मेट्रो सिटीज अब प्रदूषण, ट्रैफिक जाम और आसमान छूती महंगाई की गिरफ्त में हैं.
मिडिल क्लास और रिटायर होने वाले लोगों के लिए इन शहरों में एक स्वस्थ और शांतिपूर्ण जीवन जीना वित्तीय और शारीरिक, दोनों मोर्चों पर बड़ी चुनौती बन गया है. यही वजह है कि 'क्वालिटी ऑफ लाइफ' की तलाश में अब लोगों का रुझान इन बड़े शहरों से हटकर छोटे और शहरों की ओर तेजी से बढ़ रहा है.
छोटे शहर अब आधुनिक सुविधाओं के साथ कम लागत में बेहतर आवास, ताजी हवा और सामुदायिक जुड़ाव जैसी खूबियां इन्हें रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी के लिए आदर्श बनाती हैं. इसके अलावा, बेहतर होती कनेक्टिविटी और डिजिटल सुविधाओं ने इन शहरों को आत्मनिर्भर बना दिया है, जिससे लोग अपनी बचत का बड़ा हिस्सा खर्च करने के बजाय भविष्य के लिए सुरक्षित रख पा रहे हैं.
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छोटे शहरों में लोग घरीद रहे हैं घर
यह बदलाव रियल एस्टेट और शहरी विकास के पैटर्न में साफ दिखाई दे रहा है. Anarock जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट्स बताती हैं कि टियर-2 शहरों में घर खरीदने की मांग में पिछले कुछ वर्षों में 20-25% तक का उछाल आया है. साथ ही, Housing.com के 'कंज्यूमर सेंटीमेंट सर्वे' जैसे विश्वसनीय स्रोत भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि लोग अब भीड़भाड़ वाले मेट्रो के मुकाबले देहरादून, मैसूर, चंडीगढ़ और इंदौर जैसे शहरों को अपनी पहली पसंद बना रहे हैं.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, भुवनेश्वर, वाराणसी, इंदौर और चंडीगढ़ जैसे शहरों में बुनियादी ढांचे के विकास जैसे नए एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट और औद्योगिक गलियारों ने जमीन की कीमतों में भारी उछाल पैदा किया है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले दो से चार वर्षों में इन उभरते शहरी केंद्रों में भूमि के मूल्य में 25% से लेकर 100% तक की वृद्धि हो सकती है. यह वृद्धि केवल अटकलों पर आधारित नहीं है, बल्कि सरकार द्वारा 'सिटी इकोनॉमिक रीजन्स' (CERs) के लिए आवंटित भारी बजट और बढ़ती कनेक्टिविटी का सीधा परिणाम है.
रिटायरमेंट के लिए इन शहरों को चुनने का एक मुख्य कारण अफोर्डेबिलिटीऔर जीवन की गुणवत्ता का संतुलन है.छोटे शहरों में 30 लाख से 1.5 करोड़ रुपये के बीच आधुनिक सुविधाओं वाले घर आसानी से उपलब्ध हैं, वहीं बड़े शहरों में एक करोड़ में मुश्किल से 3 Bhk मिल रहा है. छोटे शहरों में न केवल रहने की लागत कम है, बल्कि प्रदूषण और भीड़भाड़ से मुक्ति भी मिलती है. इसके अलावा, मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स सेक्टर में बढ़ते रोजगार के अवसरों ने इन शहरों की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है, जिससे यहां किया गया निवेश लंबी अवधि में सुरक्षित और अधिक लाभदायक साबित हो रहा है.
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