मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच विदेशी निवेशकों ने भारतीय रियल एस्टेट बाजार से दूरी बनानी शुरू कर दी है. रियल एस्टेट सलाहकार कंपनी कोलियर्स इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2026 की पहली तिमाही (जनवरी-मार्च) में विदेशी निवेश में 75% की भारी गिरावट दर्ज की गई है.
पिछले साल की आखिरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर 2025) में जहां विदेशी निवेश 1.6 बिलियन डॉलर था, वह इस साल की शुरुआत में घटकर महज 400 मिलियन डॉलर रह गया है. कोलियर्स का मानना है कि वैश्विक अस्थिरता के कारण विदेशी निवेशक इस पूरे साल सतर्क रह सकते हैं.
भारतीय रियल एस्टेट में होने वाले कुल संस्थागत निवेश (Institutional Investment) के आंकड़ों में भी जबरदस्त कमी आई है. रिपोर्ट के अनुसार, कुल निवेश पिछली तिमाही के 4.2 बिलियन डॉलर से 61% गिरकर केवल 1.6 बिलियन डॉलर पर आ गया है. इस गिरावट का सबसे बड़ा कारण वैश्विक स्तर पर व्यापार, कच्चे तेल और कमोडिटी मार्केट में चल रही उथल-पुथल को माना जा रहा है. विदेशी संस्थागत निवेशक वर्तमान में 'वेट एंड वॉच की नीति अपना रहे हैं, जिससे आने वाली कुछ तिमाहियों तक निवेश की रफ्तार सुस्त रहने की आशंका है.
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घरेलू निवेशकों ने दिया सहारा
विदेशी निवेश में आई कमी के बीच भारतीय घरेलू निवेशकों ने बाजार को सहारा दिया है. जनवरी-मार्च 2026 की अवधि में हुए कुल 1.6 बिलियन डॉलर के निवेश में से 1.2 बिलियन डॉलर अकेले घरेलू निवेशकों की ओर से आए हैं. यानी बाजार में होने वाले कुल निवेश का तीन-चौथाई हिस्सा अब स्वदेशी पूंजी का है. घरेलू निवेशकों की इस मजबूती ने विदेशी निवेश की कमी के प्रभाव को काफी हद तक कम कर दिया है, जिससे भारतीय बाजार की नींव स्थिर बनी हुई है.
संपत्ति के विभिन्न वर्गों में 'ऑफिस स्पेस' पर निवेश की मंदी का सबसे गहरा असर पड़ा है. संस्थागत निवेशकों का सबसे पसंदीदा क्षेत्र माना जाने वाला ऑफिस सेगमेंट निवेश के मामले में धड़ाम हो गया है. पिछली तिमाही में ऑफिस संपत्तियों में 3,051.8 मिलियन डॉलर का भारी-भरकम निवेश हुआ था, जो इस साल की पहली तिमाही में घटकर केवल 821.1 मिलियन डॉलर रह गया है. यह आंकड़ा दर्शाता है कि बड़ी कंपनियां और निवेशक फिलहाल नए ऑफिस स्पेस या बड़े प्रोजेक्ट्स में पैसा लगाने से हिचक रहे हैं.
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