रियल एस्टेट सेक्टर इस बार बजट 2026 में सरकार से रेंटल हाउसिंग के लिए विशेष प्रावधानों की मांग कर रहा है. पिछले चार सालों से मार्केट में लग्जरी घरों का बोलबाला था, लेकिन अब इस सेगमेंट की मांग धीरे-धीरे स्थिर हो रही है, ऐसे में इंडस्ट्री का ध्यान अब अफोर्डेबल हाउसिंग की ओर मुड़ गया है, जो आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है जिसे अब तक पूरा नहीं किया जा सका है.
इंडस्ट्री के जानकारों का तर्क है कि जब सरकारें बड़े स्तर पर 'स्लम फ्री सिटी' बनाने की घोषणा करती हैं, तो इसके लिए एक ठोस व्यवस्था होनी चाहिए. हर कोई प्रीमियम घर नहीं खरीद सकता, इसलिए उन लोगों के लिए संस्थागत रेंटल हाउसिंग की व्यवस्था करना जरूरी है, जो कम दरों पर किराये के घरों में रह सकें.
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क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
रियल एस्टेट संस्था Naredco के अध्यक्ष परवीन जैन का कहना है कि वर्तमान में कोई भी विशेष रूप से किराये के लिए घर नहीं बनाता, क्योंकि इससे मिलने वाला रिटर्न बहुत कम (करीब 3%) है. वे सुझाव देते हैं कि सरकार को ऐसी पॉलिसी लानी चाहिए, जहां डेवलपर्स और निवेशकों को प्रोत्साहन मिले. इसे PPP मॉडल पर शुरू किया जा सकता है, जिसमें सरकार जमीन दे या टैक्स में भारी कटौती करे, ताकि निवेशकों को बेहतर मुनाफा हो सके.
इसके लिए मुंबई का उदाहरण दिया गया है. कोरोना काल के दौरान दीपक पारेख कमेटी की सलाह पर महाराष्ट्र सरकार ने स्टैम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन चार्ज घटा दिए थे. इस एक कदम ने सुस्त पड़े हाउसिंग सेक्टर में जान फूंक दी थी और लोगों ने फिर से घर खरीदना शुरू कर दिया था. विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से 2030 तक भारतीय शहरों में होने वाली 3 करोड़ घरों की कमी को पूरा करने में मदद मिलेगी. बिल्डरों की संस्था Credai ने सुझाव दिया है कि सरकार को टियर-1 और टियर-2 शहरों में बड़े पैमाने पर 'रेंटल हाउसिंग स्टॉक' बनाने का मिशन शुरू करना चाहिए, जहां जमीन सस्ती है.
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किराए की आय पर छूट
रियल एस्टेट कंसल्टेंसी Knight Frank ने मांग की है कि ₹50 लाख या उससे कम कीमत वाले घरों से होने वाली ₹3 लाख तक की किराये की आय पर 3 साल तक 100% टैक्स छूट दी जाए. इससे कम मुनाफे की भरपाई हो सकेगी और लोग किराये के घर बनाने में निवेश करेंगे. रियल एस्टेट सेक्टर का मानना है कि अगर इस सेगमेंट में मुनाफा बेहतर होता है, तो छोटे और स्थिर मुनाफे की तलाश करने वाले निवेशक इसकी ओर आकर्षित होंगे. इससे मार्केट में डिमांड बढ़ेगी और प्राइवेट सेक्टर फिर से ₹50 लाख से कम वाली कैटेगरी में घर लॉन्च करना शुरू कर देगा.
जानकारों का कहना है कि यदि सरकार GST की दरें कम कर दे या इसे पूरी तरह हटा दे, तो इससे मिलने वाला रिटर्न इतना आकर्षक हो जाएगा कि निवेशक, राज्य सरकारें और नगर निगम भी इसमें रुचि दिखाएंगे. अफोर्डेबल हाउसिंग की स्थिति अभी काफी नाजुक है. साल 2018 में इस कैटेगरी की हिस्सेदारी 54% थी, जो 2025 में घटकर मात्र 21% रह गई है. इस 17% की बड़ी गिरावट को अब केवल बजट के जरिए मिलने वाली सरकारी मदद ही सुधार सकती है.
अफोर्डेबल हाउसिंग की चुनौती
दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में किफायती घर लाने का एकमात्र रास्ता 'संस्थागत अफोर्डेबल हाउसिंग' (Institutional Affordable Housing) ही है. अगर हर कैटेगरी के लिए पर्याप्त मात्रा में किराये के घर उपलब्ध नहीं कराए गए, तो शहरों में झुग्गी-झोपड़ियां और अव्यवस्थित शहरी गांव ही भविष्य की पहचान बन जाएंगे.
पिछले चार सालों में खरीदे गए 53% लग्जरी घरों को निवेश के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन इस निवेश पर बेहतर रिटर्न तभी मिल सकता है, जब सरकार एक मजबूत रेंटल हाउसिंग पॉलिसी लेकर आए. हाउसिंग फाइनेंस के क्षेत्र में भारी उछाल आया है और पिछले एक साल में करीब ₹45 ट्रिलियन का कर्ज बांटा गया है, जिसमें अकेले SBI का योगदान ₹9.23 ट्रिलियन है.
रियल एस्टेट संस्था Naredco चाहती है कि इस बजट में कॉर्पोरेट हाउसिंग को भी टैक्स लाभ मिले, जैसे पिछले बजट में औद्योगिक श्रमिकों के आवास के लिए दिया गया थ. साथ ही, दिग्गज बिल्डर निरंजन हिरानी ने सुझाव दिया है कि 1950 के दशक के मॉडल पर आधारित चैरिटेबल ट्रस्टों और CSR फंड को बजटीय प्रोत्साहन मिलना चाहिए, ताकि वे गरीबों के लिए पक्के रेंटल घर बना सकें. टैक्स के मोर्चे पर भी इंडस्ट्री बड़ी राहत की उम्मीद कर रही है. वर्तमान में, डेवलपर्स को सेक्शन 23(5) के तहत उन खाली घरों पर भी टैक्स देना पड़ता है जिन्हें वे रेंटल स्टॉक के रूप में रखते हैं.
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बिल्डरों की मांग है कि इस टैक्स को हटाया जाए और सर्कल रेट को बाजार की वास्तविक कीमतों के बराबर लाया जाए, ताकि वे नुकसान उठाए बिना घर बेच सकें. इसके अलावा, आयकर अधिनियम के सेक्शन 71 में बदलाव की मांग की जा रही है ताकि डेवलपर्स रेंटल हाउसिंग बेचने पर होने वाले घाटे की भरपाई कर सकें. कुल मिलाकर, इंडस्ट्री चाहती है कि बजट में ऐसे प्रावधान हों जो घरों को खाली रखने के बजाय उन्हें किराए पर चढ़ाने या बेचने के लिए आर्थिक रूप से व्यावहारिक बनाएं.
टैक्स में कटौती और व्यक्तिगत राहत
दिग्गज बिल्डर निरंजन हिरानी का कहना है कि प्रीमियम हाउसिंग की कुल लागत का आधा हिस्सा केवल टैक्स में चला जाता है. यदि सरकार अफोर्डेबल हाउसिंग के लिए इन टैक्सों को हटा देती है, तो निजी क्षेत्र के लिए इस सेगमेंट में घर बनाना आर्थिक रूप से फायदेमंद हो जाएगा. इसके अलावा, रियल एस्टेट इंडस्ट्री चाहती है कि होम लोन के ब्याज पर मिलने वाली छूट (80C के तहत) को ₹2 लाख से बढ़ाकर ₹5 लाख किया जाए और यह लाभ सभी व्यक्तियों को मिले. साथ ही, 2021 में खत्म किए गए 'आयकर निपटान आयोग' (Income-tax Settlement Commission) को दोबारा शुरू करने की मांग की जा रही है, ताकि अदालतों पर बोझ कम हो सके.
इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स में बड़े सुधार
इंडस्ट्री 'बिज़नेस पॉलिसी' में निरंतरता और इंफ्रास्ट्रक्चर को पूरा करने के लिए ₹11 लाख करोड़ के भारी निवेश की उम्मीद कर रही है. Prozo के संस्थापक और CEO डॉ. अश्वनी जाखड़ के अनुसार, ' आज के दौर में 'हाइपरलोकल वेयरहाउसिंग' की मांग बढ़ गई है. इसके लिए वे राज्यों और नगर निगमों के बीच एकसमान नियमों और डिजिटल अप्रूवल की मांग कर रहे हैं. जिस तरह 'फ्रेट कॉरिडोर' (माल ढुलाई के लिए विशेष रास्ते) बनाए गए हैं, उसी तर्ज पर एक समान नीति वाले 'लॉजिस्टिक्स ज़ोन' बनाने के लिए बजट में हस्तक्षेप की जरूरत है.
सप्लाई चेन की मजबूती
डॉ. जाखड़ का मानना है कि भारत की सप्लाई चेन पर तेजी से डिलीवरी और बड़े वितरण नेटवर्क का भारी दबाव है. इस स्थिति में सबसे बड़ा समाधान केवल क्षमता बढ़ाना नहीं, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर का बेहतर अमल करना है. लॉजिस्टिक्स की लागत तभी कम होगी जब माल की आवाजाही भरोसेमंद होगी, ट्रांजिट समय में स्थिरता आएगी और संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा. इससे न केवल समय की बचत होगी बल्कि पूरी प्रक्रिया और भी पारदर्शी और तेज हो जाएगी.
(यह रिपोर्ट ई. जयश्री कुरुप ने लिखी है, जो रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन सेक्टर की प्रतिष्ठित रिसर्चर, एनालिस्ट और वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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