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एसी की हवा और विटामिन-डी की गोलियां, क्या घर का वास्तु ठीक न होने से होती हैं बीमारियां

आज के इस दौर में हम बड़ी-बड़ी इमारतों और छोटे-छोटे फ्लैट्स में सिमट कर रह गए हैं. ऐसे में 'वास्तु' शब्द को लेकर अक्सर दो तरह की बातें होती हैं. कुछ लोग इसे सिर्फ अंधविश्वास या दिशाओं का भ्रम मानते हैं, तो कुछ इसे जीवन के लिए बहुत जरूरी समझते हैं.

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कैसे घर की बनावट बदल सकती है आपकी मनोदशा और सेहत (Photo-Pexels)
कैसे घर की बनावट बदल सकती है आपकी मनोदशा और सेहत (Photo-Pexels)

क्या आपके घर की बनावट आपको बीमार कर रही है? आधुनिक दौर में हम जिन आलीशान फ्लैट्स और लग्जरी अपार्टमेंट्स में रह रहे हैं, क्या वे वास्तव में हमारी सेहत के लिए सुरक्षित हैं. आजतक रेडियो के शो 'प्रॉपर्टी से फायदा' में आर्किटेक्ट हाशिम अहमद खान ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है. उनके अनुसार, वास्तु केवल दिशाओं का अंधविश्वास नहीं, बल्कि एक गहरा 'आर्किटेक्चरल साइंस' है, जिसका सीधा संबंध हमारी सांसों और मानसिक शांति से है. 

एक बड़ा प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि क्या खराब वास्तु से कैंसर या अन्य गंभीर बीमारियां हो सकती हैं. इस सवाल के जवाब में हाशिम कहते हैं- 'वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो 'कैंसर' जैसे शब्द का सीधा संबंध वास्तु से जोड़ना भले ही कठिन लगे, लेकिन घर के भीतर की 'सिकलिंग' (Sick Building Syndrome) इसका एक बड़ा कारण है.

यदि किसी घर में क्रॉस वेंटिलेशन की व्यवस्था नहीं है, तो वहां रहने वाले लोग लगातार वही हवा छोड़ते और ग्रहण करते हैं. बंद कमरों में ऑक्सीजन की कमी और कार्बन मोनोऑक्साइड व अन्य टॉक्सिन्स का स्तर बढ़ जाता है. जब आप बार-बार दूषित हवा को ही फेफड़ों में भरते हैं, तो इससे सुस्ती, सांस की बीमारियां और लंबे समय में कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि की संभावना बढ़ जाती है. वास्तु शास्त्र इसी 'प्राण ऊर्जा' या ताजी हवा के मुक्त प्रवाह पर जोर देता है.

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लोगों को होती है विडामिन डी की कंपनी

हाशिम आगे कहते हैं कि वास्तु शास्त्र में सूर्य की रोशनी और वायु के संचार को सबसे अधिक महत्व दिया गया है. आज के दौर में हम विटामिन-डी की कमी से जूझ रहे हैं और सप्लीमेंट्स पर निर्भर हैं. इसका कारण हमारे पूर्वजों के घरों की तुलना में आधुनिक घरों का डिजाइन है. पुराने समय में घरों में 'आला', 'रोशनदान' और 'आंगन' अनिवार्य होते थे. ये केवल सुंदरता के लिए नहीं थे, बल्कि इनसे घर में प्राकृतिक रोशनी और हवा का संतुलन बना रहता था.

हाशिम का मानना है कि मॉडर्न लाइफस्टाइल में हम घरों से निकलकर सीधे एसी वाली कारों और फिर एसी वाले दफ्तरों में चले जाते हैं. सूरज के साथ हमारा संवाद पूरी तरह टूट चुका है. वास्तु कहता है कि यदि आपके घर में सूर्य की किरणें प्रवेश नहीं कर रही हैं, तो वह स्थान 'मृत' के समान है. जब शरीर का संपर्क प्रकृति से टूटता है, तो हार्मोनल असंतुलन और मानसिक बीमारियां जन्म लेती हैं.

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वास्तु के अनुसार घर का मध्य भाग 'ब्रह्मस्थान' कहलाता है. प्राचीन भारतीय वास्तुकला में इस स्थान को खाली या आंगन के रूप में छोड़ा जाता था.  यहां अक्सर तुलसी का पौधा लगाया जाता था. यह स्थान गैदरिंग स्पेस के रूप में काम करता था, जहां घर के बच्चे खेलते थे और बुजुर्ग बैठते थे.

हाशिम कहते हैं- 'वास्तु में किचन के लिए दक्षिण-पूर्व कोना निर्धारित है. इसके पीछे का वैज्ञानिक तर्क अत्यंत व्यावहारिक है. प्राचीन काल में बिजली नहीं होती थी. दक्षिण-पूर्व वह दिशा है जहां से सुबह की पहली और सबसे शुद्ध सूर्य की किरणें प्रवेश करती हैं. '

रसोई वह स्थान है जहां घर की ऊर्जा  तैयार होती है. वहां सुबह-सुबह धूप आने से कीटाणुओं का नाश होता है और खाना बनाने वाले व्यक्ति को पर्याप्त रोशनी मिलती है. आज भले ही हमारे पास एलईडी लाइट्स हैं, लेकिन प्राकृतिक रोशनी की शुद्धता और उसके द्वारा मिलने वाले स्वास्थ्य लाभों का कोई विकल्प नहीं है.

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